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इस पाकिस्तानी गायक की भारत में बोलती थी तूती, करीब से जानिए

Tue, 13 Oct 2015 12:46 PM IST
Updated Tue, 13 Oct 2015 12:46 PM IST
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death anniversary special: nusrat fateh ali khan life

आज भी नुसरत फतेह अली खान की आवाज कानों में पड़ती हैं, तो बहुत से लोग मंत्रमुग्ध होकर उनकी गायकी में खो जाते हैं। उस आवाज के अनूठेपन और रूहानियत को चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता है।

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उनकी आवाज-उनका अंदाज, उनका हाथों को हिलाना, चेहरे पर संजीदगी का भाव, संगीत का उम्दा प्रयोग। शब्दों की शानदार रवानगी।।। उनकी खनक।।। सब कुछ हमें किसी दूसरी दुनिया में ले जाने पर मजबूर करता है।
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जिस नुसरत फतेह अली खान को हम जानते हैं, वो आवाज। और तान के जादूगर हैं लेकिन बचपन में वो गायकी नहीं बल्कि तबले का अभ्यास किया करते थे। पाकिस्तान बनने के लगभग साल भर बाद नुसरत का जन्म पंजाब के लायलपुर (मौजूदा फैसलाबाद) में हुआ। वो 13 अक्टूबर 1948 को कव्वालों के घराने में जन्मे।

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जो उनकी कव्वाली नहीं समझ पाते वो भी हो जाते दीवाने

death anniversary special: nusrat fateh ali khan life

नुसरत फतेह अली खान की चार बहने थीं और दो छोटे भाई थे। पिता उस्ताद फतेह अली खान साहब खुद भी मशहूर कव्वाल थे। उस्ताद पिता ने नुसरत को पहले तबला सिखाना शुरू किया लेकिन बाद में नुसरत ने गायन को ही अपना मुकाम बना लिया।

हालांकि नुसरत परंपरागत तरीके से कव्वाली तो लंबे अरसे से गा रहे थे, मगर उनके लिए तो अभी दुनिया में शोहरत बटोरने की शुरुआत होनी बाकी थी। वो साल था 1985। लंदन में वर्ल्ड ऑफ म्यूजिक आर्ट एंड डांस फेस्टिवल का आयोजन हुआ।

इसमें उन्होंने पीटर गैब्रिएल के साथ अपना म्यूजिक दुनिया के सामने रखा। इसके बाद तो चमत्कार हो गया, जिसने भी इसे सुना वो इसका दीवाना बन गया। ऐसा निराला अंदाज, दुनिया भर में जो लोग पंजाबी-उर्दू और कव्वाली नहीं भी समझ पाते थे, वो भी उनकी आवाज। और अंदाज के दीवाने हो गए।

कमाल का म्यूजिक सेंस

death anniversary special: nusrat fateh ali khan life

1988 में जब पीटर गैब्रिएल हॉलीवुड फिल्म 'लास्ट टेंपटेशन ऑफ क्राइस्ट' का साउंडट्रैक बना रहे थे तो उन्होंने उस दृश्य के लिए नुसरत के अलाप का इस्तेमाल किया जिसमें ईसा मसीह सूली को लेकर आगे बढ़ते हैं। इस दर्द के लिए शायद नुसरत से बेहतर कोई नहीं हो सकता था।

पीटर गैब्रिएल ने उन्हें ब्रिटेन के स्टूडियो में रिहर्सल के लिए बुलाया लेकिन जब नुसरत ने रिहर्सल शुरू की तो उन्होंने इसे रोक दिया और कहा कि इसकी कोई जरूरत ही नहीं है।

पीटर गैब्रिएल कहते हैं कि उनके साथ काम करना शानदार रहा। वो हमेशा से ही बेहद रचनात्मक हैं, वो कब क्या कुछ नया कर देंगे कोई नहीं जानता। उनके पास टाइंमिंग है, सेंस है और म्यूजिक की बेहतरीन समझ है।

इसके बाद तो नुसरत ने पीटर गैब्रिएल के संग मिलकर दुनिया के सामने पश्चिम और पूरब की जुगलबंदी पेश कर दी। सुरों के ऐसे तार छिड़े कि क्या ब्रिटेन क्या यूरोप, क्या जापान, क्या अमरीका पूरी दुनिया में नुसरत के प्रशंसकों की बाढ़ सी आ गई।

कव्वाली के सरताज

death anniversary special: nusrat fateh ali khan life

हालांकि दुनिया ने उन्हें देर से पहचाना, पर जब पहचाना तो दुनिया भर में उनके दीवानों की कमी भी नहीं रही। जिन जिन देशों में रॉक-कंसर्ट हुआ नुसरत फतेह अली खान ने अपनी कव्वाली का रंग जमाया, लोग झूम उठे-नाच उठे।

हालांकि नुसरत ने ज्यादातर गीत ऊर्दू और पंजाबी में गाए, लेकिन उन्होंने फारसी, हिंदी और ब्रजभाषा में भी गीतों को सुर दिए। पूर्व और पश्चिम के आलौकिक फ्यूजन में भी उन्होंने अपना पंजाबीपन और सूफियाना अंदाज नहीं छोड़ा, न ही खुद से कोई छेड़-छाड़ की और फ्यूजन को एक नई परिभाषा दी।

नुसरत खुद कहते थे, “मैंने नई पीढ़ी को देखकर ही प्रयोग किए और अपनी गायकी में पश्चिमी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया। जो लोग वेस्टर्न म्यूजिक को पसंद करते थे उन्हें अगर क्लासिकल सुनाया जाता तो वो पसंद नहीं करते इसलिए शास्त्रीय गायन में पश्चिमी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया।”

पाकिस्तान के कराची में अबू मोहम्मद कव्वाल कहते हैं, "कव्वाली में नुसरत फतेह अली खान का कोई सानी नहीं है लेकिन दुनिया भर में उनकी पहचान और उनकी लोकप्रियता की वजह पश्चिमी संगीत के साथ उनका मेल मिलाप रहा।"

अबू मोहम्मद बताते हैं कि एक अच्छे कव्वाल के लिए ठुमरी, दादरा और क्लासिकल की तालीम होना बहुत जरूरी है। नुसरत बेहतरीन कव्वाल थे लेकिन दुनिया में उन्हें फ्यूजन से ही शानदार कामयाबी मिली।

भारत से कैसे थे रिश्ते

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नुसरत के जादू ने सरहदें पार कीं। इस पार भारत में भी उनके गीत और कव्वालियां सिर चढ़ कर बोलने लगीं। 'मेरा पिया घर आया।।।', 'पिया रे-पिया रे।।।', 'सानू एक पल चैन।।।', 'तेरे बिन।।।', 'प्यार नहीं करना।।।', 'साया भी जब साथ छोड़ जाये।।।', 'सांसों की माला पे।।।' और न जाने ऐसे कितने गीत और कव्वालियां हैं, जो दुनिया भर का संगीत खुद में समेटे हुए हैं।

अपने पाकिस्तानी अल्बम्स से भारत में धूम मचाने के बाद नुसरत फतेह अली खान को जब बॉलीवुड में फिल्म का न्योता मिला तो उन्होंने शायर के मामले में अपनी पसंद साफ कर दी कि वो काम करेंगें तो सिर्फ जावेद अख्तर साहब के साथ।

दो मुल्कों के दो बड़े फनकारों का संगम हुआ और एलबम निकला 'संगम'। 'संगम' का सबसे हिट गीत था 'आफरीन आफरीन'। जावेद अख्तर के बोलों को नुसरत फतेह अली खान ने इस गीत को ऐसी रवानगी दी है कि गीत खत्म होने का बाद भी इसका नशा नहीं टूटता।

मौसिकी से प्रेम

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जावेद अख्तर बताते हैं, "संगम एलबम पर काम के दौरान तीन चार दिन नुसरत के साथ बिताए, लेकिन उनका फोकस सिर्फ काम पर रहा। किसी एक आदमी की बुराई नुसरत के मुंह से नहीं सुनी।"

"वो या तो मेरे शेर सुनते थे या फिर अपनी ही मौसिकी में ही रमे रहते थे।" नुसरत दुनिया भर में घूमे और अपने संगीत से लोगों का दिल अपने नाम करते रहे। खाने के बेहद शौकीन नुसरत ने जी भरकर खाया और जी भरकर गाया। सिर्फ 48 साल की उम्र में नुसरत फतेह अली खान ने जब 16 अगस्त 1997 को इस दुनिया से विदा ली, तो विश्व-संगीत में एक गहरा शोक छा गया।

जिस समय नुसरत फतेह अली खान का नाम दुनिया में सिर चढ़ कर बोल रहा था उस समय उनके भतीजे राहत फतेह अली खान उनसे गायन की बारीकियां सीख रहे थे। जब भी नुसरत कहीं भी प्रोग्राम पेश करते तो राहत का काम सिर्फ अलाप देना होता था।

राहत फतेह अली खान बताते हैं कि स्टेज पर तो उन्हें डांट पड़ती ही रहती थी। वैसे तो उन्हें गुस्सा नहीं आता था लेकिन अगर कोई गुस्से वाली बात हो तो उन्हें बहुत गुस्सा आता था। लेकिन उन्होंने कभी किसी संगीतकार या फिर गायक की आलोचना नहीं की। आज नुसरत फतेह अली खान के चाहने वालों की कोई कमी नहीं क्योंकि ।।जब ये लम्बी तान ले कर गाते थे तो दुनिया ठहर जाती थी।

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