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जन्मदिन विशेषः कभी बेकरी की दुकान पर काम करते थे बोमन ईरानी
रोहित मिश्र
Updated Mon, 03 Dec 2012 02:37 PM IST
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बोमन जितनी सहजता के साथ फिल्मों में अपने किरदार को निभाते हैं, उतना सहज बोमन का जीवन नहीं रहा है। आज बोमन मुंबई के जिस ताज होटल में ठहरते होंगे इसी होटल में उन्होंने जूठे कप-प्याले उठाए हैं। इस नौकरी के साथ बोमन ने अपनी मां के साथ बेकरी की दुकान पर काम किया।
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बोमन क्रिएटिव थे। एक कैमरा उनके पास हमेशा होता जिससे वह जहां-तहां क्लिक किया करते। बस शौकिया ही। बोमन ने इंटर स्कूल क्रिकेट मैचों में फोटो खींचनी शुरू की जिसके बदले उन्हें थोड़े पैसे भी मिलते। होते करते उन्हें एहसास हुआ कि वह फोटोग्राफी में फुलटाइम कॅरियर बना सकते हैं।
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उन्होंने पहली बार प्रोफेशनल तौर पर पुणे जाकर बाइक रेस की फोटोग्राफी की। इसके बाद उन्हें मुंबई में हुए बॉक्सिंग वर्ल्ड कप को कवर करने का मौका मिला। एक प्रोफेशनल कैमरामन के रूप में बोमन जम गए। जीवन में ज्यादातर व्यक्ति इसी कंफर्ट जोन के मिलते ही ,उसे बनाए रखने के जतन शुरू कर देते हैं।
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बोमन इससे अलग थे। रंगकर्मी श्यामक डावर से मुलाकात के बाद बोमन रंगकर्म में सक्रिय हो गए। उन्हें कॉमेडी भूमिकाएं मिलतीं। ज्यादातर पारसी किरदार। नाक से बोलकर, और अपने भोलेपन से सबको हंसाने वाले किरदार। कुछ गंभीर प्ले भी उनके हिस्से आए।
थिएटर में बोमन की चल निकली। बोमन ने एक बार फिर से छलांग लगाई। थोड़े बहुत संघर्ष के बाद उन्हें 2001 में दो अंग्रेजी फिल्में 'इवरीबडी सेज आई एम फाइन' और 'लेट्स टॉक' फिल्में मिलीं। पहली बार बोमन की पहचान 2003 में रिलीज हुई फिल्म 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' से हुई। बोमन फिल्मों में आए जरूर 40 के बाद, पर उन्होंने आते ही अपने लिए एक अलग किस्म की जरूरत पैदा कर ली।
राजकुमार हिरानी की 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' में डा. जेसी अस्थाना के रोल में बोमन ने बता दिया कि वे पहले के कामेडियन की तरह सिर्फ चेहरे बना-बिगाड़कर या भोंडी हरकत कर दर्शकों को नहीं हंसाएंगे। वे एक पात्र को गढ़ेंगे जिसके व्यक्तिव पर हंसी या गुस्सा आएगा। यह पात्र फिल्म के खत्म होने के बाद भी दिमाग से गुम नहीं होगा। ऐसा हुआ मुन्नाभाई के बाद बोमन लगातार फिल्में करते चले गए। चूंकि पैसा कमाना भी जरूरी थी इसलिए उन्होंने हर तरह की भूमिकाएं की। अच्छी भी और बुरी भी। पर रोल के अनुरूप वह फिट बैठते।
अपनी आवाज और संवाद अदायगी के खास अंदाज ने उन्हें सबसे अलग बना दिया। अपनी कॉमेडी में गंभीरता और सैटेरिकल होने के पुट उन्हें अपने दौर के हास्य कलाकारों और चरित्र अभिनेताओं से अलग करता रहा है।
बदला किरदारों का ट्रेंड
बॉलीवुड रिस्क नहीं लेता। यदि आप कॉमेडी में हिट हो गए तो आपके पास आने वाली हर स्क्रिप्ट आपसे कॉमेडी की मांग ही करेगी। यही चुनौती बोमन के सामने भी थी। उन्हें या तो चरित्र भूमिकाएं मिलतीं या कॉमेडी। बोमन इस ट्रेंड को बदलना चाह रहे थे। 2006 में यह बदलाव हो सका। 'खोसला का घोंसाला' फिल्म में वह एक अलग भूमिका में दिखे। ग्रे शेड की इस भूमिका को पसंद किया गया। रोल में विविधता के रास्ते बोमन के लिए यहीं से खुल गए।
बोमन 50 से अधिक फिल्में कर चुके हैं। उन्होंने हर तरह के रोल गढ़े। 'हनीमून ट्रेवल प्राइवेट लिमिटेड', 'दोस्ताना', 'युवराज', 'सॉरी भाई', 'थ्री इडियट्स', 'तीन पत्ती', 'हम तुम और घोस्ट', 'हाऊसफुल', 'फालतू', 'गेम', 'हाऊसफुल 2', 'तेज', 'फरारी की सवारी' जैसी फिल्मों में बोमन अलग-अलग रंग में दिखे। 'शीरी फरहाद की तो निकल पड़ी' फिल्म में तो बोमन मुख्य नायक के रूप में थे। यह फिल्म तो बहुत नहीं चली पर फिल्मकारों को इतना संकेत जरूर दे गयी कि बोमन पर बड़ा दांव भी लगाया जा सकता है।