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यथार्थवादी होते हुए भी मनोरंजक है प्रकाश झा का सिनेमा
रोहित मिश्र
Updated Wed, 27 Feb 2013 02:26 PM IST
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फिल्म निर्माता और निर्देशक प्रकाश झा 27 फरवरी को 60 बरस के हो गए हैं। सरकारी नौकरी में रिटायरमेंट की इस उम्र में प्रकाश झा बिल्कुल नए विषयों और समस्याओं पर बिल्कुल नए कलेवर का सिनेमा रच रहे हैं। उनकी आने वाली फिल्म 'सत्याग्रह' है जिसमें वह अन्ना आंदोलन और उसके इर्द-गिर्द लिपटी राजनीति को दिखाएंगे। इसके बाद प्रकाश 'राजनीति 2' में आज की मौका परस्त राजनीति की सही तस्वीर खींचते दिखेंगे। विषय के लिहाज से यह दोनों ही फिल्में दर्शकों के लिए बिल्कुल नयी हैं।
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प्रकाश झा एक ऐसे फिल्मकार हैं जिन्होंने सामाजिक विषयों को इस अंदाज में पेश किया कि वह मनोरंजक लग सके। फिल्मों को आलोचकीय प्रशंसा तो मिले ही, फिल्म देखने वाले आम दर्शक भी फिल्म से कुछ लेकर जाएं यानी कि उनका मनोरंजन हो। यह बड़ी चुनौती थी। प्रकाश झा ने न सिर्फ इस चुनौती को स्वीकार्य किया बल्कि वह उसमे सफल भी हुए।
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प्रकाश झा जब फिल्मों में सक्रिय हुए तो उस समय इंडस्ट्री दो तरह की फिल्मों में स्पष्ट रूप से बंटी हुई थी। एक सांचे में गोविंद निहलानी, केतन मेहता, श्याम बेनेगल जैसे फिल्माकारों का काम और फिल्में थीं तो दूसरी तरफ ठेठ मनोरंजक, मसाला और फॉर्मूला वाली फिल्में। राजकुमार संतोषी, डेविड धवन, भट्ट कैंप, सुभाष घई, जौहर और चोपड़ा कैंप में वैसी फिल्में बन रहीं थीं। दोनों ही तरह की फिल्मों का अपना-अपना दायरा था। प्रकाश झा ने इसी माहौल में ऐसी फिल्में बनायीं जो इन दोनों सांचों को तोड़ती दिखीं।
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प्रकाश झा ने ऐसे सामाजिक विषयों और सामाजिक समस्याओं पर फिल्में बनायी जिन पर फिल्में बनती तो थीं पर सिर्फ कलात्मक अंदाज के साथ। उन फिल्मों पर ऑफबीट या पैरलल सिनेमा का बड़ा सा लोगो लगा होता था। आम दर्शक इन विषयों में घुसना ही नहीं चाहता था। प्रकाश झा ने ऐसे ही विषयों पर लोकप्रिय फिल्में रचीं। 1983 में दो डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाने के बाद एक फीचर फिल्म निर्देशक के रूप में प्रकाश की पहली फिल्म 'हिप-हिप हुर्रे' थी।
आने वाले सालों में उन्होंने 'दामुल', 'परिणिती' और 'बंदिश' जैसी फिल्में बनायीं। प्रकाश झा के जिस रूप से हम परिचित हैं वह चेहरा पहली बार फिल्म 'मृत्युदंड' में दिखा। इस फिल्म में प्रकाश ने एक सामाजिक विषय को एक रोचक फिल्म में तब्दील किया। 'मृत्युदंड' के बाद प्रकाश ने 'दिल क्या करे' और 'राहुल' फिल्मों के जरिए एक शुद्घ मनोरंजक सिनेमा बनाने का प्रयास किया। यह फिल्में बहुत तो नहीं चलीं पर दर्शकों ने यह नोटिस किया कि इस फिल्मकार की रेंज कहा तक है।
2003 में रिलीज हुई प्रकाश झा की फिल्म 'गंगाजल' उनके लिए एक बड़ी फिल्म साबित हुई। आने वाले समय में प्रकाश झा ने 'गंगाजल' फिल्म वाला ट्रैक और मिजाज बनाए रखा। उनके ऊपर इस बात का इल्जाम लगाया जा सकता है कि इसके बाद उन्होंने एक जैसी फिल्में बनायीं पर नोटिस करने वाली बात यह थी कि इन फिल्मों की मेकिंग एक जैसी थी पर विषय और उसका ट्रीटमेंट बिल्कुल अलग-अलग।
'अपहरण', 'राजनीति', 'आरक्षण', 'चक्रव्यूह' फिल्मों में प्रकाश झा ने ऐसे मुद्दे उठाए जो किसी भी फिल्मकार के लिए पैसा वसूल विषय नहीं थे। इंडस्ट्री की भाषा में कहें तो प्रकाश ने इन घिसे-पिटे विषयों पर भी शानदार फिल्में बनायीं। यह फिल्में आलोचकों के साथ फिल्म से मनोरंजन की चाह रखने वाले दर्शकों द्वारा भी पसंद की गयीं। अब प्रकाश अन्ना आंदोलन पर आधारित फिल्म 'सत्याग्रह' बना रहे हैं। यह भी अपने तरह की एक अलग फिल्म होगी।
एक निर्देशक के साथ प्रकाश झा का एक निर्माता के रूप में भी गहरी पैठ और रेंज रखते हैं। प्रकाश झा ने 'दिल दोस्ती इटीसी', 'खोया खोया चांद', 'टर्निंग 30' और 'यह साली जिंदगी' जैसी अलग-अलग विषयों वाली फिल्में प्रोड्यूस की हैं। एक निर्माता यदि 'खोया खोया चांद' और 'टर्निंग 30' दोनों ही फिल्मों में समान संभावनाएं देख रहा है तो इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि उस फिल्मकार की रेंज कितनी बड़ी है।