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विश्वास के पुल बनाती सेना

Fri, 05 Aug 2016 09:13 PM IST
Updated Fri, 05 Aug 2016 09:13 PM IST
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confidence building efforts of army
प्रशांत ‌दी‌क्षित
राष्ट्रीय राइफल की एक बटालियन ने जम्मू-कश्मीर पुलिस के विशेष बल के सहयोग के साथ एक मुठभेड़ में जबसे बुरहान वानी को मार गिराया, उसके बाद से जम्मू-कश्मीर अशांत बना हुआ है। इस घटना ने मानो तूफान ला दिया है। इसने आतंकवाद के मुद्दे पर हमारे विरोधाभास को भी रेखांकित किया है, जिसके लिए मीडिया के एक वर्ग को जिम्मेदार माना जा सकता है, जिसने लपटों को भड़काने का काम किया है। ऐसे लोग बुरहान वानी को आतंकी कहने से बच रहे हैं और जो कुछ हुआ, उसके लिए भारतीय सेना को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। वास्तविकता यह है कि बुरहान वानी एक आतंकी था और राज्य सरकार ने उस पर 10 लाख रुपये का इनाम रखा था।
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जम्मू-कश्मीर पुलिस ने अन्य मामलों के साथ ही बुरहान का नाम अवंतिपुरा के गुलाब बाग के सरपंच कुतुबदीन पर हुए आतंकी हमले के सिलसिले में भी एफआईआर में दर्ज किया था। राज्य के एक जनप्रतिनिधि पर हुए हमले को लेकर तो कोई चिंता दिखाई नहीं दी, इसके उलट मारे जाने के बाद से हिज्बुल मुजाहिदीन का कमांडर रहा बुरहान न केवल खबरों में है, बल्कि उसका महिमामंडन करने से भी गुरेज नहीं किया जा रहा है। सोशल मीडिया में उसके बारे में जो कुछ लिखा और प्रसारित किया जा रहा है, उसका यह मतलब नहीं है कि वह कोई नायक था।
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बुरहान वानी कोई कश्मीरी नेता भी नहीं था, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है, बल्कि एक आम अपराधी ही था। इसीलिए राष्ट्रीय राइफल्स और जम्मू-कश्मीर की पुलिस उसे पकड़ने के लिए बाध्य थीं। इन दोनों पर कानून व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी है। अतीत में अनेक आतंकवादी मारे गए हैं, लेकिन सवाल सिर्फ बुरहान वानी की मौत पर किए जा रहे हैं। कथित तौर पर जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री ने मीडिया से कहा था, 'हमसे यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि हमें हर मठभेड़ के बारे में सब कुछ पता हो? जहां तक मैंने पुलिस और सेना से सुना है, उन्हें सिर्फ यह पता था कि घर के भीतर तीन आतंकी छिपे हैं, मगर वे कौन हैं, इसका पता नहीं था। मैं यह मानती हूं कि यदि उन्हें पता होता कि वहां वानी छिपा है, तो वे उसे जरूर एक मौका देते, क्योंकि राज्य की स्थिति तेजी से सुधर रही है।' जम्मू-कश्मीर में भाजपा के साथ गठबंधन सरकार बनाने वाले पीडीपी के एक वरिष्ठ नेता और सांसद ने आरोप लगाया कि वानी पर गोलियां चलाते हुए सुरक्षा बलों ने सर्वोच्च न्यायालय के आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन के संबंध में दिए गए दिशा निर्देश का उल्लंघन किया। उन्होंने कहा, 'सेना और पुलिस के संयुक्त अभियान के दौरान वानी को समर्पण करने का एक मौका भी नहीं दिया गया।' जबकि मुठभेड़ के बाद पुलिस ने घटनास्थल से तीन एके 47 राइफलें और तीन सौ गोलियां बरामद की।
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मुझे वानी के मामले और भारत के एक समय मोस्ट वान्टेड अपराधी रहे चंदन तस्कर वीरप्पन की मौत में काफी समानताएं नजर आती हैं। विशेष कमांडो ने वीरप्पन को जंगल में उसी के ठिकाने पर उसी की रणनीति का इस्तेमाल कर मारा था, जिसके जरिये उसने अपना आपराधिक साम्राज्य खड़ा किया था और दो दशकों तक सुरक्षा बलों को छकाता रहा। वीरप्पन 120 से भी अधिक हत्याओं के लिए जिम्मेदार था। उसी की तरह वानी के मामले में भी विशेष कार्यबल ने उसके शव के पास से हथियार, हथगोले और नकद राशि बरामद की।

भारतीय सेना को कब्जा करने वाले और हिंसक बल के रूप में प्रचारित करने से किसी को भी दुख हो सकता है। सेना के काम पर टिप्पणी करना आसान है, लेकिन यह भी सच है कि सेना के ऑपरेशन सद्भावना (भारतीय सेना का जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में कश्मीरी अवाम और सेना के बीच विश्वास कायम करने के लिए चलाया जा रहा अभियान) की सामाजिक समूहों, विद्वानों और बुद्धिजीवियों ने सराहना की है।

व्यापक रूप में लोगों के बीच जाकर काम करने की इस अवधारणा को काफी प्रशंसा मिली है। मगर मीडिया इस पर बात नहीं करना चाहता। उदाहरण के लिए, संकीर्ण घाटियों में किसी छोटी नदी पर छोटी-सी पुलिया के निर्माण से ग्रामीणों खासतौर से महिलाओं को राहत मिली, वरना इसके बिना उन्हें लंबी दूरी पैदल चलकर तय करनी पड़ती थी। सेना ने कश्मीर में ऐसे 150 से अधिक पुलों का निर्माण किया है। इसी तरह ग्रामीण इलाके में स्वास्थ्य सुरक्षा केंद्र की स्थापना करुणा का प्रदर्शन तो है ही, इससे परस्पर विश्वास भी मजबूत होता है। ऐसे केंद्रों में और बेहतर स्थिति देखी गई है, जहां सैन्य कर्मियों की पत्नियां और उनके बच्चे स्टाफ के रूप में मौजूद थे। सैन्य कर्मचारियों और अधिकारियों की पत्नियों की उपस्थिति से कश्मीर की ग्रामीण महिलाओं में विश्वास मजबूत होता है और वे सैन्य कर्मचारियों को कब्जा करने वाले या हत्यारे बल के रूप में नहीं, बल्कि पारिवारिक व्यक्तियों के रूप में देखती हैं। इसी तरह से सेना द्वारा संचालित स्कूलों में अधिकांश शिक्षिकाएं सैन्य कर्मचारियों की पत्नियां ही हैं और उन्हें काफी सम्मान के साथ देखा जाता है।


जम्मू-कश्मीर में 2014 में आई बाढ़ के दौरान भारतीय सेना ने जो भूमिका निभाई थी, उसे अब भुला दिया जा रहा है। आइए जरा याद करते हैं, मानसून की भारी बारिश और बाढ़ के कारण जम्मू-कश्मीर में चार सौ से अधिक लोग मारे जा चुके थे और हजारों लोग बेघर हो गए थे। दो सितंबर, 2014 को राहत और बचाव कार्य के लिए भारतीय सैन्य बलों की तैनाती की गई। सैन्य बलों ने 18 सितंबर, 2014 तक जम्मू-कश्मीर के विभिन्न हिस्सों से दो लाख लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया था। जम्मू-कश्मीर के इतिहास में आई इस भीषण बाढ़ ने राज्य सरकार को पूरी तरह से पंगु कर दिया था। सेना का यह अभियान ऑपरेशन मेघ राहत 19 सितंबर, 2014 को समाप्त हो गया, लेकिन ऑपरेशन सद्भावना नागरिक प्रशासन और पुलिस के सहयोग से चुपचाप चल रहा है।    

लेखक सामरिक और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं
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