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'मेरी शादी हो जाती तो इतना नहीं लिख पाता'
रस्किन बांड/ मसूरी
Updated Tue, 28 Jan 2014 11:52 AM IST
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मेरी शादी इसलिए नहीं हुई क्योंकि मेरे माता-पिता नहीं थे। जाहिर है कि ऐसे में शादी कौन करवाता? हालांकि, जब 20-30 साल का था तब तीन लड़कियों से प्यार हुआ लेकिन प्रेम शादी में तब्दील नहीं हो पाया।
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मसूरी के पहाड़ व जंगलों ने किया प्रेरित
अब मैं बिना शादी के खुश हूं। शादी होती तो इतना नहीं लिख पाता। किताबें लिखने के लिए मसूरी के पहाड़, गढ़वाल की नदियां, झरने और जंगलों ने प्रेरित किया। राजाजी पार्क को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखे। पचास वर्षों में मसूरी तेजी से बदली है।
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जब यहां आया था, तब शहर में तीन-चार ही कार हुआ करती थीं। अब कारों की भरमार है। तब दिन भर पैदल चलना होता था। सब कुछ सस्ता था। एक लेखक के लिए इससे बेहतर माहौल और कुछ नहीं हो सकता। कैंपटी फॉल तक लोग पैदल जाते थे।
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अस्सी के दशक तक मसूरी में सिनेमा हॉल थे। टेलीफोन और टीवी न होने से उन दिनों यही मनोरंजन के साधन थे और मीटिंग प्वाइंट भी। मसूरी से चंबा कई बार पैदल यात्रा की है। दो दिन में पहुंचता था। इन दौरों ने भी बहुत कुछ लिखने के लिए प्रेरित किया।
मेरे उपन्यासों में गढ़वाल के गांवों के बच्चे ही पात्र होते हैं। मैं हर सप्ताह दो-तीन लेख लिखता हूं। पिछले हफ्ते मैंने ड्रीम पर लेख लिखा और कुछ बचपन के संस्मरण भी। पद्म भूषण मिलने की खबर घर में टीवी पर देखी।
मसूरी में बीता जीवन का सबसे अच्छा वक्त
पहले भी पद्मश्री मिला है। अच्छा लगा। मसूरी में बिताए पचास वर्ष जीवन के अस्सी वर्षों में सबसे बेहतर हैं। मेरा जन्म शिमला में हुआ। तब पिता जी फौज में थे। बाद में मां देहरादून आ गईं।
यहां एस्लेहॉल के पास मैं मां के साथ रहता था। दस साल का था जब पिता जी की मौत बंगाल में हो गई। पिता की मौत ने मुझे बेहद बेचैन कर दिया। कुछ दिनों बाद मां ने दूसरी शादी कर ली।
मुझे सौतेले पिता के पास रहना पड़ा। लेकिन मुझे अपने सौतेले पिता का व्यवहार अच्छा नहीं लगता था। मुझे पढ़ने के लिए शिमला भेज दिया गया। सर्दी की छुट्टियों में देहरादून आता था तो खूब सिनेमा देखता था। एस्लेहॉल से सहस्रधारा साइकिल पर घूमने जाता था। दोस्तों के साथ खूब मौज-मस्ती करता था।
12वीं के बाद इंग्लैंड चला गया। लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने की वजह से ग्रेजुएशन में दाखिला नहीं ले पाया। इसके बाद वहीं छोटा-मोटा काम किया, साथ ही पहली किताब ‘द रूम ऑन द रूफ’ लिखी।
1954 में भारत आया
तब किताब छपने से पहले लेखक को कुछ एडवांस पैसे मिलते थे। मुझे भी 50 पाउंड एडवांस में मिले। उन्हीं पैसों से वर्ष 1954 में पानी के जहाज से भारत आ गया।
इसके बाद दिल्ली में रहकर कई अखबारों के लिए स्वतंत्र लेखन किया। दस साल तक दिल्ली में रहा, लेकिन मौसम नहीं भाया। 1964 में मसूरी आ गया। यहां लेखन के लिए सही माहौल मिला। तब कमरे का साल भर का किराया 500 रुपए था।
मसूरी में वाइनवर्ग ऐलन के पास दस साल रहा। फिर लालटिब्बा और 12 कैंची रोड पर किराए के मकान में रहा। 80 के दशक में प्रेम और प्रकाश के परिवार को गोद ले लिया। आज मेरे परिवार में पूरी क्रिकेट टीम है। लेकिन मैं बारहवां खिलाड़ी हूं। मसूरी में रहकर ही मैंने अधिकतर किताबें लिखीं।