शहर की मेहरबानी..न बिजली, न पानी
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केपी सक्सेना
लखनऊ के प्रसिद्ध व्यंग्य लेखक
आज शहर की पुरानी यादों के गलियारों में घुमाने से पहले ७० साल पहले का घर का आंगन। पिताजी रहे नहीं..मां मायके आ गई। नाना-नानी मामा-मामी ने हाथों-हाथ लिया।
नाना का छोटा सा कमरा .. दीवट (लकड़ी का स्टैंड) पर रखा सरसों के तेल का चिराग। पेंसिल से कुछ लिखते रहते थे। मैंने पूछा, इतनी कम रोशनी में?
बोले, बेटे तेज रोशनी आंखों में चुभती है। आज मोहल्ले के सिर्फ पांच-छह घरों में बिजली है। कल तुम जवान होगे तो सारे घरों में होगी।
जितना सुख देगी, उतनी ही यातना देगी। गंगा तारती भी है, मारती भी है। नाना नारायण दास भजन लेखक का कहा सच साबित हुआ। घुप्प अंधेरे में इन बिजली वालों ने परछाईं भी छीन ली।
घर-घर लालटेन, लैंप, कुप्पी, ढिबरी, चिराग। इन्हीं चिरागों की लौ पर बच्चों की आंखों का काजल पारा जाता था। सड़कों पर दूर-दूर खंभे थे जिनमें शेड तले टिमटिमे बल्ब लगे होते थे।
तब एसी करंट नहीं, डीसी थी। गलियों में नगरपालिका की तरफ से मिट्टी के तेल की कुप्पियां हंडों में। शाम को मशालची जला गया, सुबह ले गया।
परिश्रमी लड़के सड़क पर पोल तले बोरा बिछाकर देर रात तक पढ़ते थे। लाइट भी.. खुली हवा भी। शौकीन लोग घर में बैटरी के रेडियो रखते थे। मैंने भी छोटे स्टेशनों पर बैटरी का रेडियो रखा।
शादी-ब्याह में नौकरों के सिरों पर गैस के हंडे या तेल की मशालें। ठेले वाले अपने सामान पर रखते बैटरी का छोटा सा बल्ब। मैं कहूं, आप यकीन करें, बीएससी करने के बाद हम पहली बार ऐसे घर में गए जहां बिजली थी। तब बिजली न होने का शुक्र था कि मैंने दूरदृष्टि का चश्मा यूज नहीं किया।
आज जितना गुड़ है, उतने ही चींटें है। झुग्गी-झोपड़ी तक में बिजली है। अंधेरे का रोना है, आएगी कम, जाएगी ज्यादा। तार टूट गया, ट्रांसफार्मर दग गया.. पोल उखड़ गया... फेज चला गया। मरने के सौ बहाने। आबादी ४५ लाख.. शहर दस गुना बढ़ गया। बिजली खपत पहाड़ों चढ़ गई।
केबल और ट्रांसफार्मर बूढ़े.. बाबा आदम के जमाने के। क्या नए उपकरणों के तईं पैसा नहीं है? ... है, पर... खैर जाने दीजिए। मुर्दे (भ्रष्टाचार) का मुंह जितनी बार खोलेंगे, रुलाई आएगी। सब स्टेशन पर फोन उतारकर रखा हुआ ... बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो। शहर में रोज हड़कंप.. रास्ता जाम.. तोड़फोड़ ।
१३ घंटे से नहीं आ रही है अब मैं काह करूं.. कित जाऊं? यह लखनऊ राजधानी है। छोटे शहरों में? चोप्प ..... कुप्पी जलाओ। ..फिर मेरे नाना का तेल का चिराग। बांस की पंखिया क्या बुरी थी?
शहर की आंख का पानी मर गया है, फिर पानी का क्या रोना। बिजली और पानी का चोली दामन जैसा साथ.. जैसे पाकिस्तान और आतंकवाद। .. यह गई, उसे भी ले गई। हैंडपंपों पर लंबी कतारें। गाली-गलौज। बच्चे तक प्लास्टिक के डिब्बे, बोतलें संभाले। हलक तो सींचना ही है।
शहर के लाखों मल्टी स्टोरी मकान.. मोटरें लगी हैं। सारा पानी खींच लिया। जिसके पास मोटर नहीं है, बूंद-बूंद से गिलास भर रहा है। जल संस्थान वालों का रोना.. मोटर जल गई है, लेवल नीचे उतर गया है। झील से पानी नहीं आ रहा है। हंगामा, घेराव, सड़क जाम।
पानी आ गया (किस झील से ?) शहर को अंडरग्राउंड मुंबई से जोड़ो। अरब सागर से पानी लो... यहां तक आते-आते खारापन दूर। मुंबई की आबादी अपने से कई गुनी ज्यादा है न बिजली की प्रॉब्लम न पानी की। क्यों? खुदा जाने या अधिकारी जानें। अब जरा यही कोई ७० बरस पीछे झांको आप।
घर-घर आगंन के कोने में कुईयां... ठंडा पानी.. जाल ढंका हुआ कि बच्चे गड़ाप न हो जाएं। घर-घर चबूतरों पर खड़े पीतल के हैंडपंप। कई घरों में छोटे-छोटे पक्के हौज। सुबह हैंडपंप से हौज में ४-६ बाल्टी पानी, ढक्कन बंद। दिन भर की छुट्टी। चार हाथ चलाए मोटी धार से जी भर नहाए। तबीयत कूल-कूल।
यह थोड़ा ही कि पानी नहीं आ रहा है तो बदन स्पंज करके पाउडर छिड़क लिया। यानी पुरानी कहावत या तो नहलावे दाई (जन्म पर).. या चार भाई (मरण पर)। सुभान अल्लाह... वह पीने का पानी, घड़ों, सुराहियों, मटकियों में भरा हुआ.. केवड़े में डूबी सींक पड़ी हुई।
शानदार शहर, खुशबूदार पानी। यह थोड़ा ही कि नदियों के देश में बदन पर साबुन लगाए जैसे अरब में बैठे हैं। दिल करता है कि चड्ढी पहन कर गले में बाल्टी लटकाए गोमती में कूद पड़ें। मगर वहां भी सरकार ने जाली लगा रखी है। महापौर जी ने कहे सुने टैंकर भेज दिया तो बाल्टी-बाल्टी जलदर्शन हो गया।
पुरानी फिल्मों में होता था पनघट। गोरियां कमर पर और सिर पर जल भरे घडे़ साधे। आज लोटा भर पानी उठाने को कहो तो कलाई ऐन गैन हो जाए। जिंदाबाद मेरे लखनऊ! प्रसिद्ध अभिनेता भारतभूषण की पहली पत्नी सरला लखनऊ की थीं। अक्सर आते थे। कहा करते थे कि लखनऊ की सुराही के पानी का सोंधापन और कहीं नहीं है।
आज जिसकी जेब मोटी है उसने ५०-६० हजार कीमत की सबमर्सिबल पंप लगवा रखी है। बटन दबाते ही मोटी धार (बिजली फेल तो बेकार).. मिनरल वाटर की चार बोतलें फ्रिज में डाल दीं... छुट्टी।
जिसकी थाली का आटा गीला है, वह एक बोतल नहीं खरीद सकता। खुदी पड़ी सड़कों को देख रहा है। पाइप डालने की प्लान ने सारा शहर कब्रिस्तान बना दिया। खीजे हुए परेशान आदमी को निदा फाजली का शेर याद आता है-
नक्शा उठा के और कोई शहर देखिए,
इस शहर मे तो सब से मुलाकात हो गई।
मगर अपना लखनऊ छोड़ कर कहीं जाया भी तो नहीं जाता। हां, सिर्फ होली और ईद पर दिन भर सही पानी आता है। काश! रोज होली और ईद हो.. पेट काट कर इन्वर्टर लगवा लिया। लाइट और पंखा तो चलेगा। ज्यादा लंबा ब्रेकडाउन हुआ तो इन्वर्टर भी पीं..पीं.. करके शांत।
बिजली और पानी को लेकर गर्मी भर क्यों है बदहाली शहर की? ऊपर वालों को दोष दीजिए तो तुनतुना उठेंगे। मगर ईमानदारी से पूछिए तो शहर के ७५ प्रतिशत नागरिक यही कहेंगे कि यह अफसरों और कर्मचारियों की लापरवाही, सुस्ती गैरजिम्मेदारी और भ्रष्टाचार का नतीजा है।
जो बिजली-पानी का बिल अदा करता है, उसे अंगुली उठाने का हक है। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में मुझे अपने मित्र स्व. दुष्यंत कुमार का शेर याद आता है-
यहां आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां,
मुझे मालूम है पानी कहीं ठहरा हुआ होगा।