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उत्तराखंड की पनबिजली परियोजनाओं पर गतिरोध
नई दिल्ली/ सुजय मेहदूदिया
Updated Tue, 14 Oct 2014 08:12 PM IST
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उत्तराखंड में पनबिजली परियोजना के काम में तेजी लाने के ऊर्जा मंत्रालय के प्रयासों के बीच भी इससे जुड़े गतिरोध बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से इस परियोजना से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित करने को कहा है।
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जून 2013 में उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ से मची तबाही को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को यह निर्देश दिया है। कोर्ट ने विशेषज्ञों की एक कमेटी से हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के पर्यावरण पर होने वाले प्रभावों का गहन अध्ययन करवाने को कहा है। कोर्ट ने विशेषज्ञों की कमेटी से इस बात का अध्ययन करवाने को कहा है कि उत्तराखंड में प्रस्तावित 24 जल विद्युत परियोजनाओं का अलकनंदा और भागीरथी नदी की जैव विविधता पर क्या असर पड़ेगा।
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सुप्रीम कोर्ट द्वारा गहन अध्ययन के इस निर्देश के बावजूद केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) ने अन्य निकायों से इस बारे में अपनी मत भिन्नता के चलते खुद को यह अध्ययन करने वाली विशेषज्ञ समिति (ईबी) से अलग कर रखा है। सीईए और सीडब्ल्यूसी ने इस मामले में अलग से अपनी रिपोर्ट दाखिल की है, जबकि विशेषज्ञ समिति ने अपनी अलग रिपोर्ट दी है।
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इसके बाद वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट से इन सीडब्ल्यूसी, सीईए और ईबी द्वारा सौंपी गई इन रिपोर्टों का अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञों की एक छोटी कमेटी गठित करने की इजाजत मांगी है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने इन 24 परियोजनाओं में किसी भी तरह के निर्माण कार्य को रोकने का निर्देश देते हुए मंत्रालय से रिपोर्टों की समीक्षा के लिए नई विशेषज्ञ समिति के गठन का कारण बताने को कहा है।
दूसरी ओर ऊर्जा और कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने 171 मेगावाट की लता तपोवन हाइड्रो परियोजना को लेकर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के दखल की जरूरत जताई है। यह परियोजना उन 24 परियोजनाओं में शामिल है, जिनके काम पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है।