आपने देखी, हैरान कर देने वाली 6 कारें जो फेल हो गईं
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कार बनाना हमेशा मुश्किल चुनौती रहा है, कॉम्पीटीशन के कारण। बीते कुछ सालों में स्पष्ट हुआ है कि चाहे ऑटो निर्माता कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे उतार चढ़ाव झेलने पड़ते हैं।
कारें हिट भी होती हैं और फ्लॉप भी। ऊपर तस्वीर में दिख रही कार साब कंपनी की है जो एक समय में स्वीडन का बेहतरीन कार ब्रांड था। उसकी कारें रैलियां जीतने के लिए मशहूर थीं, लेकिन फिर ये कंपनी कंगाली तक पहुंच गई।
ऐसा किसी एक कार के साथ नहीं हुआ, बल्कि कई कार कंपनियों के साथ हुआ। अमरीकी फिल्म अभिनेता जेम्स डीन की तरह वो तेज़ी से चमकीं और स्टारडम की धुंध में ग़ायब हो गईं।
1 टकर-48- हर क्षेत्र में अव्वल
ऐसी ही कार थी टकर 48। इसे टकर टोरपीडो के नाम से जाना जाता था। अमरीका में ये कार उसी साल बनी थी, जिस साल भारत आज़ाद हुआ था। तब इसके ख़ूबसूरत डिज़ाइन की ख़ासी प्रशंसा हुई थी।
फ़्रांसिस फ़ोर्ड कोपोला ने 1988 में बायोपिक बनाई टकर- द मैन एंड हिस ड्रीम। ये इस कार के निर्माता प्रेस्टन टकर के बारे में थी जिन्होंने कॉम्पीटीशन को टक्कर देने के लिेए सबसे इन्नोवेटिव कार बनाई।
इसने कार के क्षेत्र में कई तरह की पहल की। ये कार पहली बार तीसरा हेडलैंप लेकर आई, कोलैप्सेबल स्टीयरिंग लाई और सुरक्षा के तमाम इंतज़ाम भी लेकर आई।
लेकिन 1948 की आर्थिक मंदी और कार की नकारात्मक पब्लिसिटी के चलते कंपनी 1949 में बंद हो गई। टकर सीरीज़ की तब केवल 51 कारों का ही निर्माण हो पाया था।
2. ब्रिकलिन एसवी-1- ड्रीम स्पोर्ट्स कार
अमरीकी ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में मैलकम ब्रिकलिन का नाम नया नहीं है। 1960 से लेकर 1980 के दशक में अमरीकी कार बाज़ार में उनकी धाक थी। उनकी कंपनी ने 1970 में स्पोर्ट्स कार बनाने का फैसला किया।
इसे कनाडा की सरकार की ओर से वित्तीय मदद भी मिली। इस कार का नाम रखा गया एसवी-1 यानी सेफ्टी व्हीकल 1। न्यू ब्रंज़्विक प्रांत में इसकी शुरुआत हुई।
इस कार में सुरक्षा के तमाम उपाय किए गए थे आगे की ओर खुलने वाला दरवाज़ा था। फ़ाइबर ग्लास की बॉडी। लेकिन सुरक्षा उपकरणों के चलते कार की परफॉर्मेंस पर असर पड़ा।
कंपनी की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा और 1976 आते आते कंपनी दिवालिया हो गई। तब तक एसवी की 3000 से भी कम कारें बिकी थीं।
3 कैसर डैरिन- स्लाइडिंग डोर वाली कार
डेरिन कैसर मोटर्स की अंतिम पसैंजर कार थी। इस कार का डिज़ाइन हार्वार्ड डैरिन ने तैयार किया था। डैरिन कोच बिल्डिंग के एक्सपर्ट थे जो कार की बॉडी बनाने की कला जानते थे।
डैरिन की बॉडी फ़ाइबर ग्लास की बनी थी, जिसकी छत को हटाया जा सकता था। वैसी इसकी सबसे बड़ी खासियत स्लाइडिंग दरवाज़े थे। दरअसल इसका डिजाइन डैरिन इसलिए बना पाए क्योंकि वो लिफ्ट बनाने वाली कंपनी ओटिस में काम कर चुके थे।
कैसर मोटर्स ने 1954 में कार बाज़ार से निकलने का फ़ैसला किया और इस कार का निर्माण बंद हो गया। तब तक बस 435 डैरिन कारें बाज़ार में आईं थीं।
4. स्टाउट स्कारेब- एल्यूमिनियम फ़्रेम कार
स्कारेब विलियम बी स्टाउट का ब्रेन चाइल्ड था। इस कार की कल्पना 1932 की गई थी और इस कार का डिज़ाइन हवाई जहाज की तरह था। इंजन पीछे था और इंटीरियर मॉड्यूलर था। तब कार का निचला तल समतल नहीं होता था, लेकिन इस कार का था।
इस कार को कार निर्माण के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है। ये पहला वाहन था, जिसका पूरा फ्रेम एक ही शीट से एल्यूमिनियम का बना था। चार चक्कों का अलग अलग सस्पेंशन था और ऐसा डिज़ाइन था जो लोम्बेर्गिनी ने 30 साल बात अपनाया।
इन सबकी बदौलत इस कार की कीमत उस वक्त की सेडान कार के मुक़ाबले में पांच गुना ज़्यादा थी। एक तो कीमत और उपर से इसका डिज़ाइन, बाज़ार में कार नहीं चली और महज़ 9 कारें ही बनाई गईं। 1946 में इस कार का बनना बंद हो गया।
5. ज़िमर क्विकसिल्वर- महंगी पर आरामदेह कार
पोन्टिएक फायरो की चेसी और रनिंग गीयर के आधार पर 1984 में क्विकसिल्वर कार बनी। जेनरल मोर्ट्स के डिजाइनर डॉन जॉनसन ने इस कार का डिज़ाइन तैयार किया। क्विकसिल्वर को कंपनी के फ्लोरिडा स्थित मुख्यालय में तैयार किया गया था।
ये कार लेविश कार थी। ज्यादा स्पेस और ज्यादा आरामदेह। इसके इंटीरियर को इटैलियन लैदर से तैयार किया गया था।
इसके चार साल बाद ही कंपनी वित्तीय संकट से घिर गई और दिवालिया घोषित हो गई। इस कार के केवल 200 यूनिट बने अब अगर बाज़ार में रीसेल के लिए आती है तो अपनी शुरुआती कीमत के मुकाबले से कई गुना कम कीमत पर बिकती है।
6. वैक्टर डब्ल्यू 8- फ़रारी से भी महंगी कार
1971 में जेराल्ड वेगर्ट युवा ही थे, लेकिन उनके दिमाग में एक योजना थी। कॉलेज से पास हो कर निकले पर वे तेज रफ़्तार कार बनाना चाहते थे। काफी साल हिट एंड ट्रायल के बाद उन्होंने डब्ल्यू 8 कार बनाई।
इस कार का इंजन 625 हॉर्स पावर का था और ये 630 पाउंड वजनी था। 1989 में तैयार हुई ये कार 220 मील प्रति घंटे की रफ्तार से भाग सकती थी। जेराल्ड कार तैयार तो हो गए लेकिन इसकी लागत काफी ज़्यादा थी।
जब ये कार बिक्री के लिए उपलब्ध हुई तो इसकी कीमत तब की सुपर कार फ़रारी एफ़ 40 से भी ज़्यादा थी। ऐसे में 1993 में ही कार का उत्पादन बंद कर दिया गया। डब्ल्यू 8 की महज़ 17 कारें बनाई जा सकीं।