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लव आज कलः प्यार होने पर भूमिका-समित ने माना हकीकत में ये होता है दीवाना...

अमर उजाला नेटवर्क, हल्द्वानी Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Mon, 10 Feb 2020 04:50 PM IST
भूमिका- समित
भूमिका- समित - फोटो : अमर उजाला
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हमारी कहानी फिल्म की तरह नहीं है। न तो इसमें कोई विलेन है और न ही हम दोनों के अभिभावक प्यार के दुश्मन बने। तो आप कहोगे ये कैसी कहानी हुई। दरअसल, हम दोनों एक दूसरे को प्यार करने लगे और शादी का फैसला भी कर लिया लेकिन घर वालों के बारे में यह सोचकर घबरा रहे थे कि अगर वे लोग नहीं माने तो क्या होगा....? हमारा डर बेवजह था। आज शादी को भले ही 10 साल हो गए हैं लेकिन एक दूसरे के प्रति प्यार जैसा उस दिन था वैसा ही आज भी है।



चलिए मैं आपको फ्लैशबैक में ले चलती हूं। अरे ठहरिए! मैंने अपना नाम तो बताया ही नहीं। मेरा नाम भूमिका भंडारी अग्रवाल है। 16 मार्च 2008 को हमारी पहली मुलाकात हुई थी। तारीख आज तक याद है, लिहाजा आप मान गए होंगे कि 10 साल बाद भी हमारे बीच प्यार वैसे का वैसा ही है। खैर कहानी पर आती हूं। मैं उस समय एक न्यूज चैनल में थी और छुट्टियों पर हल्द्वानी अपने घर आई हुई थी। इसी दौरान समित से मेरी पहली मुलाकात मेरे ही घर पर हुई।


उन्हें एक प्रोफेशनल फीमेल एंकर की तलाश थी और किसी परिचित ने उन्हें मेरा नाम सुझाया था। मुलाकात हुई और अच्छी बातचीत भी। खैर मैंने एकरिंग के लिए हामी भर दी और प्रोग्राम भी अच्छा हो गया। इस बीच, छुट्टियां खत्म करके मैं दिल्ली वापस चली गई। कुछ समय बाद किसी कारण मुझे हल्द्वानी वापस आना पड़ा और मैंने यहां एक मास कम्यूनिकेशन एकेडमी ज्वॉइन कर ली।

उस दौर में हल्द्वानी में मेरे ज्यादा दोस्त नहीं थे और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्कोप भी आजकल की तरह नहीं था। इसी बीच, समित से मेरी दोबारा मुलाकात इत्तेफाक से उसी कॉलेज में हुई जहां मैं फैकल्टी थी। उस दिन हम दोनों में काफी देर बातचीत हुई। घर आकर मैंने समित के बारे में सोचा तो वह काफी फ्रैंडली और इंट्रेस्टिंग लगे। वहीं समित ने मेरे भीतर अपने कार्य को समर्पित लड़की देखी। ऐसा प्यार होने के बाद समित ने मुझे बताया।

उस वक्त व्हाट्सएप और फेसबुक तो नहीं था लेकिन फोन जरूर थे। लिहाजा, दोनों ने एक दूसरे के मोबाइल नंबर लिए और बातों का सिलसिला शुरू हो गया। पहले दोस्त बने फिर दोस्ती कब प्यार में बदल गई पता ही नहीं चला। किसी ने खूब कहा है, ‘हमें कहां मालूम था कि इश्क होता क्या है, बस तुम मिले और जिंदगी मुहब्बत बन गई।’ हर बात एक दूसरे से शेयर करने लगे।

प्यार मेरी ओर से था समित के मन का पता तो काफी दिनों के बाद चला जब उसने इजहार किया। इस दौरान मुझे लगता कि क्या मुझे ही पहले प्रपोज करना पड़ेगा। हालांकि, वह दिन भी आ गया और सुमित ने 16 जून को प्रपोज कर ही दिया। बाकी सब तो ठीक था लेकिन मैं ठहरी कुमाऊंनी ब्राह्मण और समित पक्का बनिया परिवार से। मेरे परिवार का दूर-दूर तक व्यापार से नाता नहीं था, जबकि समित का परिवार बिजनेस क्लास।

प्यार तो हो गया, लेकिन अब डर यह कि परिवार वालों से कौन बात करे। रोज हम आपस में तय करते कि आज हम अपने परिवार से बात करेंगे लेकिन एक-एक करके दिन कटते गए और नया साल भी आ गया। पहले तय हुआ कि शादी की बात बाद में करेंगे पहले दोनों परिवारों के बीच परिचय करा दिया जाए। दोनों परिवार मिले और अच्छी बातचीत हुई। फिर तय हुआ कि अब अपने-अपने घर में प्यार और शादी की बात बताते हैं। हम खुश किस्मत थे कि बात बन गई। हम दोनों में से किसी के भी परिवार को हमारी शादी पर एतराज नहीं था।

परिवार की रजामंदी मिलने पर शाहरुख खान की फिल्म ओम शांति ओम का वह डायलॉग याद आया जिसमें वह कहता है कि ‘अगर किसी चीज को दिल से चाहो तो पूरी कायनात तुम्हें उससे मिलाने की कोशिश में लग जाती है।’ कल तक हम अपने रिश्ते और परिवार की आशंका को लेकर डर रहे थे लेकिन परिवार ने हमारी भावनाओं की कदर की और आगे आकर शादी के लिए हामी भरी। नतीजतन, 20 नवंबर को हमारी शादी हो गई। आज 10 साल होने वाले हैं लेकिन एक दूसरे के प्रति प्यार जैसा उस दिन था वैसा ही आज भी है।

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