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छुट्टी के दिन लगी अदालत, आईटी कॉलेज की छात्राएं दे सकेंगी बीएड का एग्जाम
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Tue, 26 Dec 2017 01:50 PM IST
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लखनऊ विवि के वीसी से शिकायत करतीं आईटी कॉलेज की छात्राएं (फाइल फोटो))
- फोटो : amar ujala
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आईटी कॉलेज की परीक्षा देने से वंचित बीएड की 60 छात्राओं को हाईकोर्ट लखनऊ खंडपीठ से फिलहाल राहत मिल गई है। अब ये छात्राएं परीक्षा में बैठ सकेंगी। यही नहीं 23 दिसंबर की जो परीक्षा छूटी, वह भी केवल उनके लिए फिर से करवाई जाएगी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ किया कि छात्राओं की बीएड की डिग्री की वैधता अदालत के फैसले के अधीन होंगी। शीतकालीन अवकाश व रविवार का दिन होने के बावजूद विशेष बेंच का गठन कर अदालत ने ये आदेश दिए। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई फरवरी-2018 के दूसरे हफ्ते में नियत की है।
अदालत ने कहा-कॉमन एडमिशन टेस्ट अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं
मामले में सामने आए तथ्यों के आधार पर जस्टिस राजन रॉय ने कहा, आईटी कॉलेज को कोर्स की मान्यता एलयू द्वारा सालाना दी जाती है। इसे हर साल नवीनीकरण करवाना होता है। संस्थान ने अपनी प्रवेश परीक्षा करवाई, मेरिट से दाखिले दिए, लेकिन कोर्स के नियमन के लिए बना एनसीटीई एक्ट अल्पसंख्यक संस्थानों और अन्य संस्थानों में भेद नहीं करता।
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राज्य सरकार अगर कॉमन एडमिशन टेस्ट के लिए नियम बनाती है तो यह अल्पसंख्यक संस्थान के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं है। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि संस्थान कॉमन एडमिशन टेस्ट से आए विद्यार्थियों को दाखिला न दे, बल्कि अपना अलग से टेस्ट करवाए।
वहीं जिन आदेशों का हवाला देकर 50 प्रतिशत सीटों पर दाखिले देने की बात संस्थान द्वारा कही जा रही है, उनका भी पूरी तरह पालन नहीं किया गया। सभी सीटें संस्थान ने अपने तरीके से भरीं।
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हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ किया कि छात्राओं की बीएड की डिग्री की वैधता अदालत के फैसले के अधीन होंगी। शीतकालीन अवकाश व रविवार का दिन होने के बावजूद विशेष बेंच का गठन कर अदालत ने ये आदेश दिए। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई फरवरी-2018 के दूसरे हफ्ते में नियत की है।
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अदालत ने कहा-कॉमन एडमिशन टेस्ट अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं
मामले में सामने आए तथ्यों के आधार पर जस्टिस राजन रॉय ने कहा, आईटी कॉलेज को कोर्स की मान्यता एलयू द्वारा सालाना दी जाती है। इसे हर साल नवीनीकरण करवाना होता है। संस्थान ने अपनी प्रवेश परीक्षा करवाई, मेरिट से दाखिले दिए, लेकिन कोर्स के नियमन के लिए बना एनसीटीई एक्ट अल्पसंख्यक संस्थानों और अन्य संस्थानों में भेद नहीं करता।
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राज्य सरकार अगर कॉमन एडमिशन टेस्ट के लिए नियम बनाती है तो यह अल्पसंख्यक संस्थान के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं है। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि संस्थान कॉमन एडमिशन टेस्ट से आए विद्यार्थियों को दाखिला न दे, बल्कि अपना अलग से टेस्ट करवाए।
वहीं जिन आदेशों का हवाला देकर 50 प्रतिशत सीटों पर दाखिले देने की बात संस्थान द्वारा कही जा रही है, उनका भी पूरी तरह पालन नहीं किया गया। सभी सीटें संस्थान ने अपने तरीके से भरीं।
1998 से यह सब कैसे होता रहा?
लखनऊ विवि में प्रदर्शन करतीं आईटी की छात्राएं।
- फोटो : amar ujala
अदालत ने कहा, संस्थान 1998 से खुद अपनी प्रवेश परीक्षा करवा रहा है, और दाखिले भी दे रहा है, जो चिंता का विषय है। एलयू ने इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। न ही राज्य सरकार ने कोई हस्तक्षेप किया। यह सब कैसे होता रहा?
सुप्रीम कोर्ट टीएमए-पाई इस्लामिक एकेडमी मामले में साफ कर चुका है कि यह राज्य के लिए जरूरी है कि एडमिशन में नियमों का पालन करवाए। आईटी कॉलेज के मामले में ऐसा लगता है कि एलयू और प्रदेश सरकार आराम से बैठे रहे और अब कह रहे हैं कि संस्थान ने उन्हें सूचित नहीं किया कि वह एडमिशन कैसे करता है।
कई वर्षों से हो रहे एडमिशन के लिए इस तर्क को प्रथमदृष्टया स्वीकारा नहीं जा सकता। यूनिवर्सिटी और प्रदेश सरकार का यह दायित्व था कि इन मामलों की जांच करती।
एलयू नहीं समझ रहा छात्राओं की परेशानी
हाईकोर्ट ने कहा, संस्थान के हित से ज्यादा कोर्ट को छात्राओं के हित की चिंता है। कोई भी समझ सकता है कि छात्राएं और अभिभावक किन हालात में हैं। छात्राएं एक सेमेस्टर पढ़ चुकी हैं, परीक्षा की दहलीज पर हैं। उन्हें परीक्षा में बैठने नहीं दिया जा रहा। एक परीक्षा में बैठने भी नहीं दिया गया। एलयू कह रहा है कि वह परीक्षा करा देगी। उसके लिए यह सुविधाजनक बात है। पर, वह छात्राओं की असुविधा और परेशानियों को नहीं समझ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट टीएमए-पाई इस्लामिक एकेडमी मामले में साफ कर चुका है कि यह राज्य के लिए जरूरी है कि एडमिशन में नियमों का पालन करवाए। आईटी कॉलेज के मामले में ऐसा लगता है कि एलयू और प्रदेश सरकार आराम से बैठे रहे और अब कह रहे हैं कि संस्थान ने उन्हें सूचित नहीं किया कि वह एडमिशन कैसे करता है।
कई वर्षों से हो रहे एडमिशन के लिए इस तर्क को प्रथमदृष्टया स्वीकारा नहीं जा सकता। यूनिवर्सिटी और प्रदेश सरकार का यह दायित्व था कि इन मामलों की जांच करती।
एलयू नहीं समझ रहा छात्राओं की परेशानी
हाईकोर्ट ने कहा, संस्थान के हित से ज्यादा कोर्ट को छात्राओं के हित की चिंता है। कोई भी समझ सकता है कि छात्राएं और अभिभावक किन हालात में हैं। छात्राएं एक सेमेस्टर पढ़ चुकी हैं, परीक्षा की दहलीज पर हैं। उन्हें परीक्षा में बैठने नहीं दिया जा रहा। एक परीक्षा में बैठने भी नहीं दिया गया। एलयू कह रहा है कि वह परीक्षा करा देगी। उसके लिए यह सुविधाजनक बात है। पर, वह छात्राओं की असुविधा और परेशानियों को नहीं समझ रहा है।
अदालत ने ये आठ अहम आदेश दिए
1. आईटी कॉलेज ने जिन छात्राओं को एडमिशन दिया है, उन्हें फिलहाल चल रही बीएड परीक्षा (प्रथम सेमेस्टर) में शामिल होने का अवसर दिया जाता है।
2. यह आदेश छात्राओं को बीएड डिग्री पर दावा करने का कतई हकदार नहीं बना रहा है, यह निर्णय याचिका पर कोर्ट के आगे के आदेशों के अधीन होगा।
3. आईटी कॉलेज सभी संबंधित 60 छात्राओं से नौ-नौ हजार रुपये बतौर जमानत राशि लेगा और इसे बैंक गारंटी के तौर एलयू को देगा।
4. इन छात्राओं की जो परीक्षा फीस वापस कर दी थी, उसे अब एलयू स्वीकारेगा।
5. एलयू और प्रदेश सरकार इस आदेश के परिणामस्वरूप वह सभी कदम उठाएंगे जो 26 दिसंबर से छात्राओं को परीक्षा में शामिल करने के लिए जरूरी हैं।
6. इस आदेश का फायदा उठाते हुए आईटी कॉलेज अब किसी और छात्रा को अगले अकादमिक सत्र में बीएड कोर्स में दाखिला नहीं देगा। कॉलेज दाखिला लेने को तो स्वतंत्र है पर कॉमन एंट्रेंस टेस्ट के जरिए और सरकार की नीति व कानून के तहत।
7. परीक्षा को लेकर एलयू का आदेश 22 दिसंबर की शाम को पास किया गया और पहला पेपर अगले ही दिन 23 दिसंबर की सुबह था। हर परीक्षा के लिए प्रश्नपत्रों के दो सेट तैयार किए जाते हैं, एलयू ने यह बात मानी है, ऐसे में आदेश दिए जाते हैं कि एलयू पहले पेपर फिलोसॉफिकल एंड सोशोलॉजिक पर्सपेक्टिव ऑफ एजूकेशन का पेपर कॉलेज की छात्राओं के लिए फिर से करवाए। ऐसे में उनकी डिग्री पर अगले आदेशों तक असर नहीं पड़ेगा। यह परीक्षा जल्द से जल्द करवाई जाएगी ताकि मामले और जटिलताएं न पैदा हों।
8. पहले, चौथे और सातवें निर्देश की अनुपालना तीसरे आदेश की अनुपालना पर निर्भर नहीं होगी।
2. यह आदेश छात्राओं को बीएड डिग्री पर दावा करने का कतई हकदार नहीं बना रहा है, यह निर्णय याचिका पर कोर्ट के आगे के आदेशों के अधीन होगा।
3. आईटी कॉलेज सभी संबंधित 60 छात्राओं से नौ-नौ हजार रुपये बतौर जमानत राशि लेगा और इसे बैंक गारंटी के तौर एलयू को देगा।
4. इन छात्राओं की जो परीक्षा फीस वापस कर दी थी, उसे अब एलयू स्वीकारेगा।
5. एलयू और प्रदेश सरकार इस आदेश के परिणामस्वरूप वह सभी कदम उठाएंगे जो 26 दिसंबर से छात्राओं को परीक्षा में शामिल करने के लिए जरूरी हैं।
6. इस आदेश का फायदा उठाते हुए आईटी कॉलेज अब किसी और छात्रा को अगले अकादमिक सत्र में बीएड कोर्स में दाखिला नहीं देगा। कॉलेज दाखिला लेने को तो स्वतंत्र है पर कॉमन एंट्रेंस टेस्ट के जरिए और सरकार की नीति व कानून के तहत।
7. परीक्षा को लेकर एलयू का आदेश 22 दिसंबर की शाम को पास किया गया और पहला पेपर अगले ही दिन 23 दिसंबर की सुबह था। हर परीक्षा के लिए प्रश्नपत्रों के दो सेट तैयार किए जाते हैं, एलयू ने यह बात मानी है, ऐसे में आदेश दिए जाते हैं कि एलयू पहले पेपर फिलोसॉफिकल एंड सोशोलॉजिक पर्सपेक्टिव ऑफ एजूकेशन का पेपर कॉलेज की छात्राओं के लिए फिर से करवाए। ऐसे में उनकी डिग्री पर अगले आदेशों तक असर नहीं पड़ेगा। यह परीक्षा जल्द से जल्द करवाई जाएगी ताकि मामले और जटिलताएं न पैदा हों।
8. पहले, चौथे और सातवें निर्देश की अनुपालना तीसरे आदेश की अनुपालना पर निर्भर नहीं होगी।