स्थापना दिवसः चंदे से बनी थी लखनऊ यूनिवर्सिटी
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97 वर्षों से लगातार शिक्षा की अलख जलाने वाले लखनऊ विश्वविद्यालय की स्थापना ताल्लुकेदारों ने चंदा जोड़कर की थी। 25 नवंबर 1920 को भारत के गवर्नर जनरल ने एलयू एक्ट पर दस्तखत किए थे। इसी दिन को विवि के स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है।
अधिनियम पर हस्ताक्षर होने के बाद विवि का नया शैक्षिक सत्र जुलाई 1921 मे शुरू हुआ था। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा समेत देश कई शख्सियतों ने यहीं से शिक्षा प्राप्त की है, जबकि आचार्य नरेंद्र देव और राधाकमल मुखर्जी जैसे विद्वानों ने विवि के कुलपति पद को सुशोभित किया है।
ताल्लुकेदारों ने लखनऊ में अपने बच्चों के लिए कॉल्विन कॉलेज की स्थापना की थी। मगर, बारहवीं के बाद पढ़ाई के लिए बाहर जाना होता था। इसलिए ताल्लुकेदारों की ख्वाहिश थी कि स्टूडेंट्स को लखनऊ में ही बेहतर उच्च शिक्षा मिल सके।
उनके इस सपने को साकार करने में सर हरकोर्ट बटलर ने मदद की। उस समय ताल्लुकेदारों ने लविवि की स्थापना के लिए 30 लाख रुपये का चंदा एकत्र किया। कैनिंग कॉलेज और मेडिकल कॉलेज को विवि के मुख्य कॉलेजों के रूप में मान्यता दी गई।
पांच साल का था कुलपति का पहला कार्यकाल
आईटी कॉलेज को महिला शिक्षा के लिए संबद्ध कॉलेज की मान्यता मिली। हालांकि, उस समय क्रिश्चियन कॉलेज में बिना मान्यता के ही वाणिज्य की कक्षाएं चलाई गईं।
स्थापना के बाद इलाहाबाद विवि से सेवानिवृत्त रजिस्ट्रार ज्ञानेंद्र नाथ चक्रवर्ती को यहां का पहला कुलपति बनाया गया। राज्य विश्वविद्यालय में वर्तमान समय में कुलपति का कार्यकाल तीन साल का होता है।
इसे केंद्रीय विवि की तर्ज पर पांच साल करने की मांग चल रही हैं। जबकि विवि के पहले कुलपति का कार्यकाल पांच साल का ही था। उन्होंने 16 दिसंबर 1920 को तीन हजार रुपये प्रतिमाह की तनख्वाह पर कार्यभार संभाला था।
कुलपति की तनख्वाह का खर्च तत्कालीन राजा महमूदाबाद मोहम्मद अली खान की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा जमा किए गए धन से उठाया गया था। उस समय के वित्त सचिव आईसीएस ईए एच ब्लंट विवि के पहले कोषाध्यक्ष नियुक्त हुए थे।
आगरा कॉलेज के मेजर टीएफओ डोनेल को 1200 रुपये प्रतिमाह की तनख्वाह पर रजिस्ट्रार बनाया गया। वर्ष 1922 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम व प्रश्न पत्र का इस्तेमाल हुआ। 1923 में पहली बार खुद के पाठ्यक्रम से परीक्षा हुई।