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आर्थिक तंगी से जूझ रहे एलयू ने सिर्फ परंपरा निभाने के लिए बांट दिए 54 लाख रुपये
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Wed, 15 Nov 2017 04:50 PM IST
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लखनऊ विश्वविद्यालय
- फोटो : अमर उजाला
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लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन हमेशा आर्थिक तंगी का रोना रोता है। इसके बावजूद बिना किसी नियम के कर्मचारियों को करीब 54 लाख रुपये बांट दिये गए। यह रकम पारिश्रमिक के नाम पर दी गई है। सिर्फ परंपरा के तौर पर कर्मचारियों को इस राशि का भुगतान किया जाता है।
इस साल हर कर्मचारी को 3150 रुपये दिये गए हैं। विवि के कला संकाय के डीन प्रो. पीसी मिश्रा और पूर्व कार्यकारी वित्त नियंत्रक प्रो. पीसी मिश्रा इसे पूरी तरह से नियम विरुद्ध बताते हैं। दूसरी तरफ कुलपति ने भी भविष्य में बिना पॉलिसी इस तरह के भुगतान न करने की बात कही है।
लविवि के सामान्य संचालन में करीब 140 करोड़ रुपये का खर्च आता है। अकेले वेतन मद में ही 130 करोड़ रुपये का खर्च होते हैं। प्रदेश सरकार ने 20 साल पहले विवि का बजट फ्रीज कर दिया है। इस वजह से विवि को पिछले 20 साल से सालाना सिर्फ 45 करोड़ रुपये ही दिए जाते हैं।
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लविवि को इसी से शिक्षक-कर्मचारियों का वेतन, वार्षिक रख-रखाव तथा मरम्मत आदि की व्यवस्था करनी होती है। तंगहाली का आलम यह होता है कि विवि के वित्त नियंत्रक को हर महीने शिक्षकों और कर्मचारियों का वेतन देने के लिए काफी गुणा-भाग करना पड़ता है। इसके बावजूद विवि में पारिश्रमिक के नाम पर कर्मचारियों को लाखों रुपये बांट दिये गए हैं।
विद्यार्थियों के हक का पैसा
विवि प्रशासन स्टूडेंट्स को सुविधा देने के नाम पर बजट का रोना रोता है। छात्रसंघ चुनाव, पुअर बॉयज फंड, ग्रुप इंश्योरेंस आदि के नाम पर फीस वसूलने के बावजूद छात्रों को इनकी सुविधा नहीं दी जाती है। इन मदों में विवि हर साल एक करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाता है और विद्यार्थियों के हक का पैसा कर्मचारियों में बांट दिया जाता है।
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इस साल हर कर्मचारी को 3150 रुपये दिये गए हैं। विवि के कला संकाय के डीन प्रो. पीसी मिश्रा और पूर्व कार्यकारी वित्त नियंत्रक प्रो. पीसी मिश्रा इसे पूरी तरह से नियम विरुद्ध बताते हैं। दूसरी तरफ कुलपति ने भी भविष्य में बिना पॉलिसी इस तरह के भुगतान न करने की बात कही है।
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लविवि के सामान्य संचालन में करीब 140 करोड़ रुपये का खर्च आता है। अकेले वेतन मद में ही 130 करोड़ रुपये का खर्च होते हैं। प्रदेश सरकार ने 20 साल पहले विवि का बजट फ्रीज कर दिया है। इस वजह से विवि को पिछले 20 साल से सालाना सिर्फ 45 करोड़ रुपये ही दिए जाते हैं।
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लविवि को इसी से शिक्षक-कर्मचारियों का वेतन, वार्षिक रख-रखाव तथा मरम्मत आदि की व्यवस्था करनी होती है। तंगहाली का आलम यह होता है कि विवि के वित्त नियंत्रक को हर महीने शिक्षकों और कर्मचारियों का वेतन देने के लिए काफी गुणा-भाग करना पड़ता है। इसके बावजूद विवि में पारिश्रमिक के नाम पर कर्मचारियों को लाखों रुपये बांट दिये गए हैं।
विद्यार्थियों के हक का पैसा
विवि प्रशासन स्टूडेंट्स को सुविधा देने के नाम पर बजट का रोना रोता है। छात्रसंघ चुनाव, पुअर बॉयज फंड, ग्रुप इंश्योरेंस आदि के नाम पर फीस वसूलने के बावजूद छात्रों को इनकी सुविधा नहीं दी जाती है। इन मदों में विवि हर साल एक करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाता है और विद्यार्थियों के हक का पैसा कर्मचारियों में बांट दिया जाता है।
अनुदान फ्रीज होने की मुख्य वजह वित्तीय अनियमितता
डेमो पिक
शासन ने लविवि का अनुदान 20 साल पहले फ्रीज कर दिया था। सूत्र बताते हैं कि विवि का अनुदान फ्रीज करने के पीछे मुख्य वजह वित्तीय अनियमितता थी। आज भी विवि में जरूरत के मुकाबले कर्मचारियों की संख्या बहुत ज्यादा है। अन्य विवि में जहां मुश्किल से पांच सौ कर्मचारी हैं, वहीं लविवि में कर्मचारियों की संख्या करीब दो हजार है।
बहुत से कर्मचारी नियमित हो चुके हैं जबकि अभी भी काफी कर्मचारियों के विनियमितीकरण की फाइल शासन में घूम रही है। शासन का आरोप होता है कि विवि वित्तीय नियमों का सही से पालन नहीं करता। इसी वजह से अनुदान फ्रीज कर दिया गया है।
हर काम के लिए पारिश्रमिक
जानकारों का कहना है कि विवि में कर्मचारी ही नहीं पारिश्रमिक के नाम पर शिक्षकों को भी मोटा भुगतान होता है। एडमिशन सेल से लेकर मूल्यांकन तक हर काम के लिए शिक्षकों को भुगतान होता है। जानकारों की मानें तो कई शिक्षक इसी वजह से मुख्य काम के बजाय अन्य ड्यूटी में ही लगे रहतेे हैं।
बहुत से कर्मचारी नियमित हो चुके हैं जबकि अभी भी काफी कर्मचारियों के विनियमितीकरण की फाइल शासन में घूम रही है। शासन का आरोप होता है कि विवि वित्तीय नियमों का सही से पालन नहीं करता। इसी वजह से अनुदान फ्रीज कर दिया गया है।
हर काम के लिए पारिश्रमिक
जानकारों का कहना है कि विवि में कर्मचारी ही नहीं पारिश्रमिक के नाम पर शिक्षकों को भी मोटा भुगतान होता है। एडमिशन सेल से लेकर मूल्यांकन तक हर काम के लिए शिक्षकों को भुगतान होता है। जानकारों की मानें तो कई शिक्षक इसी वजह से मुख्य काम के बजाय अन्य ड्यूटी में ही लगे रहतेे हैं।
सेल्फ फाइनेंस कोर्स ही सहारा
लखनऊ यूनिवर्सिटी
सरकार से अनुदान न मिलने की वजह से लविवि का एकमात्र सहारा सेल्फ फाइनेंस पाठ्यक्रम ही हैं। इन पाठ्यक्रमों की वजह से ही लखनऊ विश्वविद्यालय अपना सामान्य खर्च निकालता है। एलएलबी ऑनर्स, बीकॉम और पीजी के कुछ पाठ्यक्रम इससेें सबसे ज्यादा योगदान करते हैं। सेल्फ फाइनेंस पाठ्यक्रमों की आय अन्य मदों में नहीं खर्च की जानी चाहिए, लेकिन मजबूरी में विवि उनकी मदों में बदलाव कर लेता है।
डीन आर्ट्स का दावा, उन्होंने नहीं लिया पारिश्रमिक
लविवि के पूर्व कार्यकारी वित्त नियंत्रक और कला संकाय के डीन प्रो. पीसी मिश्रा का कहना है कि उन्होंने वेतन के अलावा कोई पारिश्रमिक नहीं लिया है। उनका कहना है कि लेखाधिकारी और डिप्टी रजिस्ट्रार को बजट तैयार करने के लिए जरूर पारिश्रमिक दिया गया है, लेकिन उन्होंने खुद कोई पारिश्रमिक नहीं लिया है। कुलपति ने इनके अनुमोदन की फाइल रोक दी है। इसलिए कुलपति के निर्देश पर इनको पारिश्रमिक वापस करने को भी कहा गया है। प्रो. मिश्रा पर आरोप है कि उन्होंने कार्यकारी वित्त नियंत्रक के पद पर रहते हुए पारिश्रमिक के रूप में 25 हजार रुपये ले लिए हैं।
डीन आर्ट्स का दावा, उन्होंने नहीं लिया पारिश्रमिक
लविवि के पूर्व कार्यकारी वित्त नियंत्रक और कला संकाय के डीन प्रो. पीसी मिश्रा का कहना है कि उन्होंने वेतन के अलावा कोई पारिश्रमिक नहीं लिया है। उनका कहना है कि लेखाधिकारी और डिप्टी रजिस्ट्रार को बजट तैयार करने के लिए जरूर पारिश्रमिक दिया गया है, लेकिन उन्होंने खुद कोई पारिश्रमिक नहीं लिया है। कुलपति ने इनके अनुमोदन की फाइल रोक दी है। इसलिए कुलपति के निर्देश पर इनको पारिश्रमिक वापस करने को भी कहा गया है। प्रो. मिश्रा पर आरोप है कि उन्होंने कार्यकारी वित्त नियंत्रक के पद पर रहते हुए पारिश्रमिक के रूप में 25 हजार रुपये ले लिए हैं।
यह नियमों के खिलाफ,बंद करंगेः वीसी
प्रतीकात्मक तस्वीर
एलयू के कुलपति प्रो. एसपी सिंह ने कहा कि इस साल कर्मचारियों को पिछले साल की तरह पारिश्रमिक दिया गया है। इसकी कुल रकम कितनी है, यह तुरंत बताना संभव नहीं है। संभव है कि यह राशि 30 लाख से ज्यादा हो। कर्मचारियों के लिए इस तरह के पारिश्रमिक के संबंध में कोई लिखित पॉलिसी नहीं है। इसलिए निर्देश जारी किया गया है, आगेे से इस तरह का भुगतान नहीं होगा। अगर इस संबंध में कोई पॉलिसी बनती है तभी भुगतान किया जाएगा।
वहीं, डीन आर्ट्स तथा पूर्व कार्यकारी वित्त नियंत्रक प्रो. पीसी मिश्रा ने कहा कि विवि में परंपरा के तौर पर सभी कर्मचारियों को पारिश्रमिक का भुगतान किया जाता है। इसका कोई नियम नहीं है, इसलिए यह भुगतान गलत है। बीते साल 3000 रुपये का भुगतान किया गया था। इस साल 4500 रुपये का प्रस्ताव भेजा गया था। कुलपति ने 3150 रुपये के भुगतान को स्वीकृति दी है। इस तरह से कर्मचारियों को करीब 54 लाख रुपये का भुगतान किया गया है।
वहीं, डीन आर्ट्स तथा पूर्व कार्यकारी वित्त नियंत्रक प्रो. पीसी मिश्रा ने कहा कि विवि में परंपरा के तौर पर सभी कर्मचारियों को पारिश्रमिक का भुगतान किया जाता है। इसका कोई नियम नहीं है, इसलिए यह भुगतान गलत है। बीते साल 3000 रुपये का भुगतान किया गया था। इस साल 4500 रुपये का प्रस्ताव भेजा गया था। कुलपति ने 3150 रुपये के भुगतान को स्वीकृति दी है। इस तरह से कर्मचारियों को करीब 54 लाख रुपये का भुगतान किया गया है।