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एलएलएम में 80 फीसदी आरक्षण का अध्यादेश हाईकोर्ट ने किया खारिज

Wed, 15 Feb 2017 03:18 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ Updated Wed, 15 Feb 2017 03:18 PM IST
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high court cancelled eighty persent reservation in llm course of lucknow university
डेमो

लखनऊ यूनिवर्सिटी के एलएलएम कोर्स में यूनिवर्सिटी के एलएलबी छात्रों को 80 प्रतिशत आरक्षण के अध्यादेश को हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने खारिज कर दिया है।

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कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को नया अध्यादेश लाकर इसे नए सत्र 2017-18 से लागू करने का आदेश दिया है। अपने निर्णय में जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने सत्र 2016-17 की रुकी हुई प्रवेश प्रक्रिया को 15 दिन में पूरा करते हुए अवकाश के दिन भी क्लासेस करवाते हुए परीक्षा करवाने के आदेश दिए हैं। 
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एलयू के एलएलएम कोर्स के लिए सत्र 2016-17 में आवेदन करने वाले अतुल कुमार ने हाईकोर्ट में यूनिवर्सिटी के अध्यादेश को चुनौती दी थी, जिसमें संस्थागत आरक्षण के तहत 80 प्रतिशत सीटें एलयू के लॉ ग्रेजुएट्स के लिए आरक्षित रखी जाती हैं।
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उन्हाेंने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. प्रदीप तिवारी बनाम केंद्र सरकार के 1984 के निर्णय का हवाला दिया था जो संस्थागत आरक्षण की अनुमति तो देता है, लेकिन इसे अधिकतम 50 प्रतिशत तक ही रखने के लिए कहता है।

सुप्रीम कोर्ट ने सौरभ चौधरी बनाम केंद्र सरकार मामले में भी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण 50 प्रतिशत सीटें मेरिट के आधार पर भरने के निर्देश भी दे रखे हैं। एलयू की ओर से तर्क दिया गया कि यह अध्यादेश यूनिवर्सिटी से पास होने वाले लॉ ग्रेजुएट्स के कॅरिअर के हितों को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया है। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और अन्य सरकारी व प्राइवेट यूनिवर्सिटियों ने ग्रेडिंग सिस्टम अपनाया हुआ है।

इससे यहां पास होने वाले विद्यार्थी 90 प्रतिशत तक अंक एलएलबी में ले आते हैं। वहीं एलयू में यह अंक 70 से 75 के बीच रहते हैं। एलयू में ग्रेडिंग सिस्टम नहीं होने से यहां के विद्यार्थियों को अन्य यूनिवर्सिटी में एडमिशन भी नहीं मिल पाता।

ये द‌िया आदेश

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अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा कि कानूनी तौर पर भेदभाव को रोकना ही समानता है। लेकिन दो अलग अलग स्थितियों में अलग अलग सुलूक के जरिए समानता स्थापित की जाती है।

राज्य के हितों और क्षेत्र के पिछड़ेपन के दावों को देखते हुए इसकी जरूरत पड़ सकती है। लेकिन सप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि संस्थानिक प्राथमिकता कभी भी 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।

जिन दो निर्णयों का हवाला मामले में दिया गया है उनसे साफ है कि एलयू के एलएलएम कोर्स में संस्थानिग प्राथमिकता दी जा सकती है। लेकिन यह 50 प्रतिशत सीटों से अधिक नहीं हो सकती। ऐसे में यूनिवर्सिटी का अध्यादेश वापस लिया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि 80 प्रतिशत आरक्षण के लिए यूनिवर्सिटी ने एनएलयू व अन्य सरकारी व प्राइवेट यूनिवर्सिटी में ग्रेडिंग सिस्टम का जो तर्क दिया है, वह खुद का बनाया है। उन्हाेंने इस विषय पर कोई आंकडे़ प्रस्तुत नहीं किए, न ही कोई अध्ययन किया गया है।

ऐसे में यूनिवर्सिटी का एलएलएम कोर्स को लेकर जारी अध्यादेश खारिज किया जाता है। एलयू को यह अध्यादेश फिर से बनाना होगा, जो यूपी स्टेट यूनिवर्सिटी एक्ट 1973 के तहत होगा। यह नया अध्यादेश 2017-18 के सत्र से लागू होगा।

मौजूदा प्रवेश प्रक्रिया पर निर्णय

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हाईकोर्ट ने कहा कि याची मौजूदा प्रवेश प्रक्रिया की मेरिट लिस्ट से बाहर है। वह कुल मेरिट लिस्ट में 25वें नंबर पर है और ओबीसी कैटेगरी में पांचवें नंबर पर। कई ओबीसी विद्यार्थी उससे ऊपर हैं, जिनमें इन-हाउस विद्यार्थी भी शामिल हैं।

ऐसे में अगर संस्थागत आरक्षण 50 प्रतिशत कर दिया जाए, तब भी उसका एडमिशन नहीं हो पाएगा। याचिका जुलाई 2016 में दायर हुई थी, उस समय प्रवेश प्रक्रिया का पहला राउंड जारी था।

कई विद्यार्थी प्रवेश की औपचारिकताएं पूरी कर चुके हैं। अगस्त 2016 में हाईकोर्ट ने आदेश देकर काउंसलिंग पूरी करने के आदेश दिए थे, और लेकिन प्रवेश अंतिम नहीं माने जाने थे।

ऐसे में अभी एडमिशन पूरे नहीं हुए हैं। इसे देखते हुए एडमिशन प्रक्रिया पर नए निर्देश देना विद्यार्थियाें के सामान्य हितों में नहीं होगा। यूनिवर्सिटी नया अध्यादेश निकाले जो अगले शैक्षिक सत्र से लागू होगा।

मौजूदा सत्र की प्रवेश प्रक्रिया अगले 15 दिन में पूरी की जाए। और निर्धारित संख्या में क्लासेस करवाने के बाद मौजूदा सत्र के लिए परीक्षाएं करवाई जाएं। निर्धारित संख्या में क्लासेस पूरी करवाने के लिए यूनिवर्सिटी प्रशासन अपने शिक्षकों से निवेदन करते हुए अवकाश के दिनों में भी क्लासेस करवाए। 

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