{"_id":"5a9bcd224f1c1bc65c8b563f","slug":"private-schools-will-not-take-admission-of-poor-students-under-rte","type":"story","status":"publish","title_hn":"गरीब बच्चों को एडमिशन देने से 2000 निजी स्कूलों ने किया मना","category":{"title":"Campus","title_hn":"कैंपस ","slug":"campus"}}
गरीब बच्चों को एडमिशन देने से 2000 निजी स्कूलों ने किया मना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sun, 04 Mar 2018 04:10 PM IST
विज्ञापन
डेमो
- फोटो : डेमो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रदेश के दो हजार निजी स्कूल आगामी सत्र में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत अपने यहां गरीब बच्चों को दाखिला नहीं देंगे। इंडिपेंडेंट स्कूल्स फेडरेशन ऑफ इंडिया से जुड़े इन विद्यालयों का तर्क है कि पिछले दो वर्षों से सरकार की ओर से शुल्क की भरपाई नहीं किए जाने के चलते यह फैसला किया गया।
विज्ञापन
फेडरेशन ने आरटीई के तहत वाजिब फीस तय करने की मांग भी उठाई है। वहीं, शिक्षा विभाग ने इस अधिनियम को बाध्यकारी बताते हुए गरीब बच्चों का दाखिला न लेने वाले स्कूलों को कड़ी कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है।
विज्ञापन
फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. मधुसूदन दीक्षित ने कहा कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009 के तहत पिछले दो वर्षों से निजी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों की फीस प्रतिपूर्ति नहीं की गई है।
विज्ञापन
इतना ही नहीं, शुल्क का निर्धारण भी अधिनियम की धारा 12(2) के तहत न करके मनमाने ढंग से 450 रुपये प्रतिमाह तय कर दिया गया है। इसलिए प्रदेश के निजी स्कूलों के प्रबंधन ने फैसला किया है कि वे आगामी शैक्षिक सत्र 2018-19 में इस एक्ट के तहत कोई भी प्रवेश अपने विद्यालय में नहीं लेंगे।
डॉ. दीक्षित ने कहा कि सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थी पर सरकार प्रतिमाह 5 हजार रुपये खर्च करती है, जबकि इन स्कूलों की गुणवत्ता बेहद निम्न दर्जे की है, वहीं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के बावजूद निजी स्कूलों की फीस इससे कहीं कम है। इसलिए आरटीई के अनुसार, शासन को निजी स्कूलों को उनकी वास्तविक फीस के बराबर राशि की प्रतिपूर्ति करनी चाहिए।
डॉ. दीक्षित ने कहा कि आज हाल ऐसे हो गए हैं कि निजी स्कूल अपने शिक्षकों को वेतन नहीं दे पा रहे हैं। बिजली बिल और स्टेशनरी आदि पर होने वाला खर्च भी नहीं निकाल पा रहे। कई निजी स्कूल बंदी के कगार पर पहुंच गए हैं।
आरटीई के तहत जहां 25 प्रतिशत बच्चों की फीस बेहद कम निर्धारित की गई है, वहीं बाकी के 75 फीसदी बच्चों की फीस निर्धारित करने पर भी निजी स्कूलों पर शिकंजा कसा जा रहा है।
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के तीन हजार स्कूलों ने बकाया राशि को पाए बिना आगामी सत्र में एक भी प्रवेश लेने से मना कर दिया है। इसी तरह यूपी के निजी स्कूल भी पिछला बकाया न मिलने और वाजिब फीस तय न होने तक एक भी दाखिला नहीं लेंगे।