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लखनऊ विश्वविद्यालय : पीएचडी की अधिकतम अवधि में मिल सकती है छूट
Tue, 30 Jul 2019 09:25 AM IST
Amulya Rastogi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Tue, 30 Jul 2019 09:25 AM IST
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लखनऊ विश्वविद्यालय
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लखनऊ विश्वविद्यालय इस साल नए दाखिलों से पहले पीएचडी ऑर्डिनेंस में बदलाव करने जा रहा है। इस बदलाव के बाद पीएचडी पूरी करने की अधिकतम अवधि में छूट मिल सकेगी। विश्वविद्यालय विशेष परिस्थितियों में इस अवधि में कुछ छूट देने पर विचार कर रहा है। एलयू ने यूजीसी का ऑर्डिनेंस ज्यों का त्यों लागू कर दिया था जिससे कई बिंदुओं पर स्थिति साफ नहीं है। पीएचडी ऑर्डिनेंस की बैठक में इसके अलावा कई अन्य बदलावों पर चर्चा होनी है।
विश्वविद्यालय ने पिछले शैक्षिक सत्र से अपने यहां पीएचडी का नया आर्डिनेंस लागू किया। दाखिले में होने वाली देरी को देखते हुए नया ऑर्डिनेंस तैयार करने के बजाय यूजीसी का ऑर्डिनेंस पूरी तरह से लागू कर दिया गया। नए आर्डिनेंस में पीएचडी की न्यूनतम अवधि तीन और अधिकतम छह साल रखी गई है। इस अवधि में महिलाओं को मातृत्व अवकाश तथा दिव्यांगों की सहूलियत के लिए दो-दो साल छूट देने का प्रावधान है।
इसके अलावा अन्य शोधार्थियों को कोई छूट नहीं दी गई। जबकि इससे पहले के आर्डिनेंस में लविवि कुलपति को यह अधिकार था कि सभी की सहमति से अवधि को कुछ समय के लिए बढ़ा सकें। यही व्यवस्था एक बार फिर से लागू करने की तैयारी है। यह बढ़ी हुई अवधि कितनी होगी, इसका फैसला अगले सप्ताह होने वाली बैठक में होगा।
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इसके साथ ही किसी शिक्षक के सेवानिवृत्त होने, उसके विदेश जाने आदि की अवधि में शोधार्थी किसके निर्देशन में पीएचडी करेगा, शोधार्थियों की अधिकतम संख्या में यह शोधार्थी शामिल होगा या फिर नहीं, अधिकृत जर्नल किसे मानेंगे, इन सभी बिंदुओं पर बैठक में चर्चा होने के बाद बदलाव किया जाएगा।
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विश्वविद्यालय ने पिछले शैक्षिक सत्र से अपने यहां पीएचडी का नया आर्डिनेंस लागू किया। दाखिले में होने वाली देरी को देखते हुए नया ऑर्डिनेंस तैयार करने के बजाय यूजीसी का ऑर्डिनेंस पूरी तरह से लागू कर दिया गया। नए आर्डिनेंस में पीएचडी की न्यूनतम अवधि तीन और अधिकतम छह साल रखी गई है। इस अवधि में महिलाओं को मातृत्व अवकाश तथा दिव्यांगों की सहूलियत के लिए दो-दो साल छूट देने का प्रावधान है।
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इसके अलावा अन्य शोधार्थियों को कोई छूट नहीं दी गई। जबकि इससे पहले के आर्डिनेंस में लविवि कुलपति को यह अधिकार था कि सभी की सहमति से अवधि को कुछ समय के लिए बढ़ा सकें। यही व्यवस्था एक बार फिर से लागू करने की तैयारी है। यह बढ़ी हुई अवधि कितनी होगी, इसका फैसला अगले सप्ताह होने वाली बैठक में होगा।
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इसके साथ ही किसी शिक्षक के सेवानिवृत्त होने, उसके विदेश जाने आदि की अवधि में शोधार्थी किसके निर्देशन में पीएचडी करेगा, शोधार्थियों की अधिकतम संख्या में यह शोधार्थी शामिल होगा या फिर नहीं, अधिकृत जर्नल किसे मानेंगे, इन सभी बिंदुओं पर बैठक में चर्चा होने के बाद बदलाव किया जाएगा।
लविवि में लगातार तीसरे साल एमफिल के भविष्य पर स्थिति साफ नहीं है। विवि में नए विषयों में एमफिल की पढ़ाई होती है। हिंदी को छोड़कर अन्य विषयों में एमफिल स्ववित्तपोषित प्रणाली पर है। नए अध्यादेश में एमफिल की सीट भी शिक्षकों की संख्या के हिसाब से तय होनी है। इसके बाद से लविवि ने एमफिल के दाखिले ही नहीं लिए हैं। एमफिल में दाखिले होने हैं या नहीं, इसका फैसला भी इस बैठक में किया जाएगा।
अभी स्थिति साफ नहीं
पीएचडी अध्यादेश में कई बिंदु ऐसे हैं जिन पर अभी तक स्थिति साफ नहीं है। नए दाखिले करने से पहले से पहले इन पर स्थिति साफ होनी चाहिए। इसलिए इस संबंध में स्पष्ट नियम बनाए जाएंगे। पीएचडी की अधिकतम अवधि में विशेष परिस्थितियों में कुछ छूट देने के नियम में बदलाव पर भी बैठक में चर्चा की जाएगी।
प्रो. राजकुमार सिंह, प्रति-कुलपति, लविवि
अभी स्थिति साफ नहीं
पीएचडी अध्यादेश में कई बिंदु ऐसे हैं जिन पर अभी तक स्थिति साफ नहीं है। नए दाखिले करने से पहले से पहले इन पर स्थिति साफ होनी चाहिए। इसलिए इस संबंध में स्पष्ट नियम बनाए जाएंगे। पीएचडी की अधिकतम अवधि में विशेष परिस्थितियों में कुछ छूट देने के नियम में बदलाव पर भी बैठक में चर्चा की जाएगी।
प्रो. राजकुमार सिंह, प्रति-कुलपति, लविवि