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लखनऊ विश्वविद्यालय: पीएचडी दाखिले में एससी और ओबीसी का हक मारा, ईडब्ल्यूएस को लाभ देने में कम की सीटें

Sat, 19 Dec 2020 04:18 PM IST
ishwar ashish सचिन त्रिपाठी, अमर उजाला, लखनऊ
सचिन त्रिपाठी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sat, 19 Dec 2020 04:18 PM IST
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Irregularities in phd seats allotment in Lucknow University.
- फोटो : amar ujala

समाजशास्त्र विभाग में 44 सीटों पर दाखिले के लिए चयनित अभ्यर्थियों की जारी सूची में 22 ओपन, चार ईडब्ल्यूएस, आठ एससी और 10 ओबीसी वर्ग के हैं। राज्य सरकार के आरक्षण शासनादेश के अनुसार एससी वर्ग को 21 और ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। इसके अनुसार 44 सीटों में एससी वर्ग की नौ और ओबीसी की 11 सीटें हो रही हैं।

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जूलॉजी विभाग में 22 सीटों पर दाखिले में 13 सीटें ओपन, 5 ओबीसी, 3 एससी और एक ईडब्ल्यूएस कोटे को दी गई हैं। आरक्षण नियम अनुसार एससी वर्ग की चार सीटें बनती हैं। नियम यह भी है कि आरक्षित वर्ग की सीटें नहीं भरती हैं तो अलग से नोटिफिकेशन जारी करना होगा। इसके बाद ही उस पर अन्य वर्ग के अभ्यर्थी को प्रवेश दिया जा सकता है।
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हिंदी विभाग में 44 में 21 सीटें ओपन, 10 ओबीसी, एक डिफेंस पर्सनल, आठ एससी और चार सीटें ईडब्ल्यूएस को दी गईं। शासनादेश अनुसार एससी वर्ग के अभ्यर्थियों की नौ और ओबीसी वर्ग की 11 सीटें बनती हैं। दोनों वर्ग को एक-एक सीट कम मिली।

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कई अन्य विभाग भी जहां नहीं मिल रहा आरक्षण का लाभ

लखनऊ विश्वविद्यालय की पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में इन तीन के साथ ऐसे कई विभाग हैं, जहां एससी और ओबीसी वर्ग को राज्य सरकार की ओर से तय आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है। 11 महीने से जारी प्रवेश प्रक्रिया में अब रिजल्ट जारी किया गया है तो इसमें आरक्षित वर्ग के हितों से खिलवाड़ किया गया है। विवि ने अभ्यर्थियों को फीस जमा करने के निर्देश भी दे दिए हैं।

पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया के रिजल्ट में आरक्षित वर्ग विशेषकर एससी और ओबीसी के अभ्यर्थियों को तय आरक्षण से सीटें नहीं आवंटित की गई हैं। सरकार के निर्देश पर लविवि ने इस साल से पीएचडी में ईडब्ल्यूएस कोटे का लाभ भी दिया है।

इसके लिए जारी शासनादेश अनुसार गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण का लाभ दिया जाएगा, लेकिन इसकी वजह से पहले से आरक्षण का लाभ पाने वालों का हित प्रभावित नहीं होना चाहिए। इसके लिए सीटें बढ़ाई जा सकती हैं। लविवि ने ईडब्ल्यूएस कोटे का लाभ तो दिया है, लेकिन एससी और ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण का भाग कम कर दिया है।

सत्र 19-20 में, दिया 20-21 की सीट पर दाखिला

पीएचडी में प्रोफेसर के अधीन अधिकतम आठ, एसोसिएट प्रोफेसर के अधीन छह और असिस्टेंट प्रोफेसर के अधीन एक समय में अधिकतम चार पीएचडी स्कॉलर ही हो सकते हैं। लविवि ने विज्ञापन में ईडब्ल्यूएस कोटे की सीट की जानकारी नहीं दी थी।

उसका तर्क था कि पीएचडी की सीट यूजीसी के नियम के अधीन है, इसलिए इसमें सीट नहीं बढ़ाई जा सकती है। बाद में ईडब्ल्यूएस कोटे का लाभ देने की घोषणा कर दी। इसके लिए विज्ञापन जारी होने व रिजल्ट निकालने की अवधि के दौरान पीएचडी थीसिस जमा होने से खाली सीटों को शामिल कर लिया।

लविवि में ये दाखिले शैक्षणिक सत्र 2019-20 के हैं। जिन पीएचडी थीसिस जमा होने से सीटें खाली होने की बात कही जा रही है, वे इससे अगले सत्र यानी 2020-21 की हैं।

नहीं ली गई यूजीसी से राय

लविवि ने एलएलबी, बीएड में सीट बढ़ाने को बीसीआई, एनसीटीई को पत्र भेज मार्गदर्शन मांगा था। पत्र आने पर तय संख्या में सीटें बढ़ाकर 10 फीसदी ईडब्ल्यूएस कोटे का लाभ दिया। इससे वहां एससी और ओबीसी अभ्यर्थियों का हित प्रभावित नहीं हुआ। पीएचडी के मामले में लविवि ने यूजीसी को पत्र भेजकर राय लेने के बजाय अपने हिसाब से बिना सीट बढ़ाए कोटे का लाभ दे दिया।

लविवि के प्रवक्ता डॉ. दुर्गेश श्रीवास्तव का कहना है कि पीएचडी में सीटें बढ़ाने के संबंध में निर्देश नहीं हैं। इस कारण लविवि में बनाई समिति की सिफारिश पर सूची जारी की गई है। प्रयास है कि किसी वर्ग के अभ्यर्थियों का अहित न हो। ऐसा हुआ है तो इसे देखा जाएगा।

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