मेडिकल कॉलेजों में केंद्रीयकृत काउंसलिंग से ही होंगे एडमिशन
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश के सभी मेडिकल संस्थानों के एमबीबीएस और बीडीएस मेडिकल कोर्सेस में एडमिशन के लिए केंद्रीयकृत काउंसलिंग करवाने के सरकार के आदेशों को बरकरार रखा है।
वहीं प्राइवेट कॉलेजों की 50 प्रतिशत सीटों पर राजकीय शुल्क के बराबर शुल्क पर गरीब विद्यार्थियों को एडमिशन का प्रावधान हाईकोर्ट ने सशर्त रद्द कर दिया है। हालांकि इस विचार के लिए सरकार को सराहा है। यह काउंसलिंग नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (नीट) 2016 के आधार पर कराई जानी है। साथ ही अल्पसंख्यक संस्थान अपने समुदाय के विद्यार्थियों का एडमिशन भी इसी केंद्रीयकृत काउंसलिंग से करेंगे।
प्रदेश सरकार द्वारा दो सितंबर को जारी अधिसूचना के उन प्रथम दो प्रावधानों को निष्प्रभावी किया है जिनमें निजी कॉलेजों की 50 प्रतिशत सीटों पर गरीब विद्यार्थियों को 36 हजार रुपये सालाना राजकीय फीस पर एडमिशन की बात कही गई थी।
साथ ही प्रावधान किया था कि गैर-सब्सिडी सीटों पर उच्चतर शैक्षणिक शुल्क लागू किए जाएंगे, जिसका निर्धारण उप्र फीस नियमन अधिनियम 2006 के अनुसार फीस नियमन समिति करेगी।
अपनी अलग से नीति बना सकती है राज्य सरकार
हाईकोर्ट ने एडमिशन प्रक्रिया पर प्रदेश सरकार की नीति पर गैर अनुदानित मेडिकल कॉलेज वेलफेयर सोसाइटी सहित कुल 15 याचिकाओं का गुरुवार को साथ निस्तारण करते हुए यह आदेश दिए हैं।
अपने आदेश में जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस राजन रॉय ने राजकीय शुल्क के प्रदेश सरकार के प्रावधान को सराहनीय तो बताया, फिर भी कहा कि अगर सरकार गरीब विद्यार्थियों के लिए सीटों को सब्सिडाइज करना चाहती है तो वह ऐसा कर सकती है, लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें लगा दी गई हैं।
इन शर्तों को अगर राज्य सरकार नहीं मानना चाहती तो वह अपनी अलग से नीति बना सकती है, लेकिन अधिसूचना के प्रावधान एक व दो खारिज ही रहेंगे।