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खिलौनों के व्यापार पर दोहरी मार
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नई दिल्ली। खिलौनों के व्यापार पर इनदिनों दोहरा मार पड़ रहा है। कोरोना ने जहां रोजगार छीन लिया है तो वहीं चीन के साथ तनातनी के कारण दिल्ली के बाजारों में खिलौनों की भरमार पहले जैसी नहीं है।
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घर में खेलने वाले लूडो, शतरंज, कैरम बोर्ड भी मार्केट में महंगी कीमत पर उपलब्ध है। इसी तरह गुड्डे-गुड़िए भी लॉकडाउन के पहले के मुकाबले 30-35 प्रतिशत बाजार में महंगे भी हो गए है। लॉकडाउन के बाद पारंपरिक खेलों की प्रति बच्चो का रूझान काफी बढ़ा है। ऐसा इसलिए भी है कि पार्क, स्कूल बंद होने की वजह से बच्चे घरों में कैद है।
पारंपरिक खिलौनों के प्रति रूझान इसलिए भी बदला है कि मोबाइल पर ऑन लाइन पढ़ाई करने के बाद बच्चे थक जाते है। कोरोना काल में घर में रहने के कारण बच्चे पारंपरिक खेलों की तरफ आकर्षित हुए है। इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के साथ ही यांत्रिक खिलौने बच्चे पसंद कर रहे है।
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बच्चों के खिलौनों पर चीन का 65 प्रतिशत अधिकार था। चीनी बार्डर पर युद्ध की स्थिति बनने की वजह से खिलौनों का व्यापार भी कम हो गया है। ऐसी स्थिति में बाजार से खिलौने तो गायब है। पुराने स्टॉक है भी तो 30-35 प्रतिशत महंगे बिक रहे है। कोरोना की वजह से खिलौनों की फैक्ट्रियां बंद होने की वजह से बाजार में प्रचूर संख्या में खिलौने नहीं है।
इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों की कमी
चीन के साथ तनातनी होने से इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों व गुड़ियों की काफी कमी हो गई है। क्योंकि भारतीय खिलौना बाजार इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के मामले में विदेशों पर ही निर्भर है। इसकी जगह यांत्रिक खिलौनों बाजार में उपलब्ध है। लेकिन ऐसे खिलौनों के व्यापार की गति धीमी होने से बाजार से गायब है।
ऑनलाइन बिक्री ने खाली किया बाजार
फेडरेशन ऑफ सदर बाजार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष परमजीत सिंह पम्मा ने बताया कि अनालॉक में जब सदर बाजार खिलौना बाजार खुला तो ऑनलाइन वालों ने खिलौनों का स्टॉक कर लिया। उधर चीन से खिलौनों के आयात प्रभावित होने की वजह से भी मार्केट से खिलौना गायब है। उन्होंने बताया कि जो खिलौना ऑनलाइन पर उपलब्ध है वह बाजार में नहीं है। पम्मा का कहना है कि लॉकडाउन के पहले के मुकाबले खिलौनों के साथ ही घर में खेले जाने वाले लूडो और कैरम की मांग काफी बढ़ी है।
उद्योग को सरकार के सहयोग की जरूरत
कन्फेडरशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा है कि स्वदेशी खिलौनों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय खिलौना नीति की आवश्यकता है। भारतीय खिलौनों को लेकर प्रधानमंत्री के विजन को वास्तविकता में बदलने के लिए कदम उठाने की आवश्यकता है। टॉय डिज़ाइन एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के निर्माण के लिए भी आग्रह किया जाएगा।
चीन के खिलौनों की जगह नये ट्रेंड के साथ भारतीय खिलौने को प्रोत्साहन मिले तो बच्चों को खूब पसंद आएगा। खंडेलवाल ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान बच्चों का रूझान काफी पारंपरिक खिलौनों की तरफ बढ़ा है। मार्केट में पारंपरिक खेल के सामान की ज्यादा बिक्री से भी यह समझा जा सकता है कि बच्चे पारंपरिक गेम की तरफ आकर्षित हो रहे है।
वैश्विक बाजार को टक्कर दे सकते है भारतीय खिलौने
टॉयज एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अजय अग्रवाल और संयोजक मनु गुप्ता ने बताया कि भारतीय खिलौने वैश्विक बाजार को टक्कर देने में सक्षम है। इसके लिए ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है। खिलौने उद्योग में डिजाइन और इनोवेशन की कमी दूर की जाए तो यह संभव है। दुनिया में बेचे जाने वाले ज्यादातर खिलौने इलेक्ट्रॉनिक हैं जबकि भारत में बने खिलौने यांत्रिक हैं।
. एक अनुमान के अनुसार भारत में खिलौना बाजार का सालाना २५ हजार करोड़ रुपये का हैं।
. इसमें चीन का हिस्सा लगभग 65 प्रतिशत है।
. 5 प्रतिशत खिलौने थाईलैंड, कोरिया और जर्मनी से आयात किया जाता हैं।
. 30 प्रतिशत खिलौने भारत में निर्मित होते हैं।
. प्राथमिक, सूक्ष्म और कुटीर क्षेत्रों में करीब 6000 से अधिक खिलौना निर्माता हैं।
. पिछले 5 वर्षों में खिलौनों के क्षेत्र में चीन ने अपनी पैठ भारत में बनाई है।
. दिल्ली में प्रतिदिन 20 करोड़ का खिलौनों का व्यापार है।
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