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तनाव दूर करना है तो लद्दाख जाएं, सर्दियों में रहस्यमयी होती है ये यात्रा
टीम डिजिटल/ अमर उजाला
Updated Tue, 02 Jan 2018 10:34 AM IST
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उस समय सिर्फ तीन साल की थी, जब मेरे माता-पिता मुझे और मेरी बहन को मनाली के सफर पर लेकर गए थे। उस समय रोहतांग दर्रा जाने का कोई रास्ता नहीं हुआ करता था, तो हम ट्रेक करके पहुंचे थे। इस दौरान वहां ट्रेकिंग का यह मेरा पहला अनुभव था। यहीं से एक पर्वतारोही के रूप में मेरी शुरुआत हुई।
पर्वत मेरे पिता की कमजोरी थे। उन्हें पहाड़ों से प्यार था। जब कभी घूमने का प्लान होता, तो अक्सर हम पहाड़ों की तरफ ही रुख करते। हम लोग सेबों के बाग में एक घर किराए पर ले लेते थे, जहां आमतौर पर मेरे पिता लिखने में व्यस्त रहते और मां चित्रकारी में। इन पहाड़ों और रोहतांग दर्रे ने मुझे भूगोल का व्यवहारिक ज्ञान दिया। छुट्टियों की योजना बनाना मेरे लिए कभी भी मुश्किल काम नहीं रहा। मुझे उन अंदरूनी इलाकों को खोज निकालना पसंद है, जहां आमतौर पर पर्यटक नहीं पहुंच पाते हैं।
वैसे, मुझे क्रॉस कंट्री ड्राइविंग पसंद है, लेकिन पैदल घूमने का अपना ही मजा है। ट्रेकिंग से मुझे पागलपन की हद तक प्यार है और जब मैं यह कर रही होती हूं, तो वास्तव में मैं...मैं होती हूं। मैं इन्हीं चीजों में अपने आप को खोज पाती हूं। सालों से मैं हिमालय क्षेत्र में घूम रही हूं और इसके अंदरूनी इलाकों किन्नौर, लाहौल और स्पीति देख चुकी हूं।
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पर्वत मेरे पिता की कमजोरी थे। उन्हें पहाड़ों से प्यार था। जब कभी घूमने का प्लान होता, तो अक्सर हम पहाड़ों की तरफ ही रुख करते। हम लोग सेबों के बाग में एक घर किराए पर ले लेते थे, जहां आमतौर पर मेरे पिता लिखने में व्यस्त रहते और मां चित्रकारी में। इन पहाड़ों और रोहतांग दर्रे ने मुझे भूगोल का व्यवहारिक ज्ञान दिया। छुट्टियों की योजना बनाना मेरे लिए कभी भी मुश्किल काम नहीं रहा। मुझे उन अंदरूनी इलाकों को खोज निकालना पसंद है, जहां आमतौर पर पर्यटक नहीं पहुंच पाते हैं।
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वैसे, मुझे क्रॉस कंट्री ड्राइविंग पसंद है, लेकिन पैदल घूमने का अपना ही मजा है। ट्रेकिंग से मुझे पागलपन की हद तक प्यार है और जब मैं यह कर रही होती हूं, तो वास्तव में मैं...मैं होती हूं। मैं इन्हीं चीजों में अपने आप को खोज पाती हूं। सालों से मैं हिमालय क्षेत्र में घूम रही हूं और इसके अंदरूनी इलाकों किन्नौर, लाहौल और स्पीति देख चुकी हूं।
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इन सबके बाद ही मैं लद्दाख तक पहुंच पाई। लद्दाख जाने के लिए सीधी उड़ानें नहीं हैं। इसके लिए लेह की फ्लाइट लेनी पड़ती है, जिसके बाद बस, टैक्सी आदि से लद्दाख पहुंचा जा सकता है। लेकिन मैंने मुंबई से लेह तक का सफर खुद ड्राइव करके तय किया है। मेरा यह सफर चीन की सीमा पर बसे एक छोटे से गांव पर आकर खत्म हुआ था। चारों ओर फैली खूबसूरती मुझ पर हावी होने लगी थी।
इस तरह लद्दाख मेरे अंदर बसने लगा था। इस पूरे सफर का मेरे व्यक्तित्व पर एक सकारात्मक आध्यात्मिक प्रभाव हुआ था। लेह घूमने पूरी दुनिया से लोग आते हैं। कोई पहाड़ों की खूबसूरती पर किताब लिखता है, तो कोई बौद्ध मतों पर शोध करता है। तो कोई ट्रैवलॉग के जरिए अपनी पहचान बना रहा है। वहां के लोग ज्यादातर नए और शानदार विचारों से भरे हुए थे।
दिन भर सभी लोग अपना समय खूबसूरत दृश्यों को निहारने या ट्रेकिंग में ही गुजारते थे। दिन भर की थकान उतारने और अपनी भूख मिटाने के लिए लोग रेस्तरां में खाने और सुस्ताने के लिए इकट्ठा होते और आपस में अपने अनुभवों को बांटते थे। लद्दाख में सर्दियों का मौसम खुशनुमा होता है और यही वह समय है, जब लद्दाख मुझे तेजी से अपनी ओर खींचता है। सर्दियों में लद्दाख ज्यादा रहस्यमयी लगता है। इस दौरान मैंने अपनी यात्रा को भरपूर जिया था।
इस तरह लद्दाख मेरे अंदर बसने लगा था। इस पूरे सफर का मेरे व्यक्तित्व पर एक सकारात्मक आध्यात्मिक प्रभाव हुआ था। लेह घूमने पूरी दुनिया से लोग आते हैं। कोई पहाड़ों की खूबसूरती पर किताब लिखता है, तो कोई बौद्ध मतों पर शोध करता है। तो कोई ट्रैवलॉग के जरिए अपनी पहचान बना रहा है। वहां के लोग ज्यादातर नए और शानदार विचारों से भरे हुए थे।
दिन भर सभी लोग अपना समय खूबसूरत दृश्यों को निहारने या ट्रेकिंग में ही गुजारते थे। दिन भर की थकान उतारने और अपनी भूख मिटाने के लिए लोग रेस्तरां में खाने और सुस्ताने के लिए इकट्ठा होते और आपस में अपने अनुभवों को बांटते थे। लद्दाख में सर्दियों का मौसम खुशनुमा होता है और यही वह समय है, जब लद्दाख मुझे तेजी से अपनी ओर खींचता है। सर्दियों में लद्दाख ज्यादा रहस्यमयी लगता है। इस दौरान मैंने अपनी यात्रा को भरपूर जिया था।