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भागी हुई लड़कियां: 'वो न प्यार के लिए भागी, न शादी से, लेकिन भागी'

Fri, 17 Feb 2017 04:37 PM IST
गीता यथार्थ, बीबीसी हिन्दी
गीता यथार्थ, बीबीसी हिन्दी Updated Fri, 17 Feb 2017 04:37 PM IST
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Neither For Love Nor For Marriage, I Ran Away For Something Else

गांव के स्कूल में हमेशा पहली या दूसरी पोजिशन आती थी। स्कूल के टीचर पापा से मिलने पर तारीफ करना नहीं भूलते थे। पापा खुशी से फूले न समाते। पापा मुझे मेडिकल की पढ़ाई कराना चाहते थे। उन्हें लगता कि बेटा एमबीबीएस कर रहा है तो बेटी भी कर लेगी।

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गांव के स्कूल में पांचवीं तक की पढ़ाई के बाद बाद दूसरे गांव पढ़ने जाना पड़ता था। दसवीं क्लास में अच्छे नंबर आए तो पापा की उम्मीद बढ़ गई। पापा ने सोच लिया कि अब लड़का और लड़की दोनों ही डॉक्टर बनेंगे।

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गांव के स्कूल में 11वीं में मेडिकल सब्जेक्ट नहीं था इसलिए पापा ने मेरा एडमिशन गुड़गांव के एक प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में करवा दिया। फीस भरना पापा के लिए मुश्किल था। पापा ने घर के खर्चे में कटौती कर स्कूल की फीस चुकाई।

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शहर के स्कूल में आकर मालूम चला कि दुनिया कितनी बड़ी है। सब फर्राटेदार इंग्लिश में बात करते। ऐसी इंग्लिश हमारे स्कूल के इंग्लिश टीचर भी न बोल पाते थे। लड़कियों की स्कूल ड्रेस की छोटी स्कर्ट सपने जैसा लगता और इन सबसे उलट मैं टॉम बॉय टाइप की लड़की, लंबी स्कर्ट, बेढंगी शर्ट, हिंदी बोलने वाली सबके मज़ाक का केंद्र बन गई।

गांव वाली का टैग लग गया

Neither For Love Nor For Marriage, I Ran Away For Something Else

इंग्लिश का ट्यूशन लगाकर सब ठीक करने ही वाली थी कि बायोलॉजी की प्रैक्टिकल की क्लास आ गई। कमरे में एक छिपकली को देखकर घर सिर पर उठाने वाली लड़की चूहे, छिपकली काटने लगी। इसी डर में बुखार हो गया। कई दिन स्कूल नहीं गई। बस फिर असली बीमारी से बहाने वाली बीमारी पर आ गई। स्कूल जाना एकदम बंद। ऊपर से फीस लगातार जाती रही। इतनी महंगी फीस की वजह से पापा का दबाव पढ़ाई के लिए बढ़ने लगा।

हारकर एक साल बर्बाद करके गांव के स्कूल में नॉन मेडिकल में एडमिशन ले लिया। रिश्तेदार और पड़ोसी पापा को समझाते 10वीं कर ली, ब्याह कर दो। बेटी पर इतना पैसा खर्च करना ठीक नहीं। पापा किसी की न सुनते, बस पढ़ लो- कुछ कर लो, यही धुन थी। फिर पापा ने बीएससी में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी कैंपस में एडमिशन दिलवा दिया।

मैं हॉस्टल चली गई। पहली बार घर से बाहर गई। पहली बार सांभर खाया। देर रात तक लड़कियों के साथ बातें की। पहली बार लड़कों और अपनी पसंद, प्यार के बारे में बातें की।

 नहीं, इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी

Neither For Love Nor For Marriage, I Ran Away For Something Else

फिर से यह सब एक नई दुनिया की सैर सा था। खूब आज़ादी मिली, खूब जिया उन दिनों को। बस पढ़ाई के अलावा सब किया। गांव की लड़की का शहरीकरण हो गया।

कुछ ही महीनों बाद घर जाकर बोला, ''पापा बीएससी नहीं करनी. मेरा मन नहीं करता। मुझे पत्रकारिता की पढ़ाई करनी है।

पापा ने पूछा, ''उससे तो पत्रकार बनते है न, अखबारों में नौकरी लगती है। जगह जगह घूमना भी पड़ेगा। मतलब बहुत सारी जगह अकेले जाना पड़ेगा। नहीं, इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी।''

पापा ने मम्मी, दीदी-जीजा, अंकल को बताया, ''इसका दिमाग ख़राब हो गया। पहले मेडिकल की पढाई छोड़ी, अब बीएससी छोड़ना है। या तो यहीं पढ़ो या घर बैठो। शादी के लिए लड़का देख रहे हैं। बहुत हुआ तुम्हें नहीं पढ़ना।''

फिर लड़का ढूंढा जाने लगा। घर में सबने मुझसे बात करनी बंद कर दी। उधर हर रोज़ मैं सोचती- कैसे भागूं यहां से। क्या करूं कहीं चली गई तो पैसे कहां से आएंगे। तरह-तरह के सवाल। फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता का फॉर्म भर दिया। लेकिन इंटरव्यू में क्वालिफाई नहीं कर पाई।

उससे मिलने का तरीका ढूंढने लगी

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मैं पत्रकारिता कर रहे एक लड़के को जानती थी। कुरुक्षेत्र जाते हुए कश्मीरी गेट के बस स्टैंड पर उससे मुलाकात हुई थी। उसका नाम याद आया। उससे मिलने का तरीका ढूंढने लगी।

उससे मुलाकात मेरी लाइफ का एक टर्निंग पॉइंट था। वो लड़का कानपुर से था। नोएडा के किसी प्राइवेट इंस्टीट्यूट से पत्रकारिता कर रहा था। उससे किसी तरह संपर्क किया, सारी बात बताई। इतनी अक्ल नहीं थी कि किसी अनजान को ऐसे सीधे कुछ बताना चाहिए या नहीं। उस लड़के ने बोला- चिंता मत करो, मैं तुम्हारी मदद करुंगा।

मैंने उस लड़के को पड़ोस की चाची के घर का लैंडलाइन फोन नंबर दिया। अपने घर के लैंडलाइन पर अगर फोन आ जाता तो घरवाले फौरन शादी फिक्स कर देते। फिर एक रोज़ उसकी कॉल आई और वो बोला, ''खुशखबरी है, फरीदाबाद कॉलेज में पहली बार पत्रकारिता कोर्स आया है। सरकारी है तो फीस कम होगी। लगता है भगवान ने तेरी सुन ली। बस चार हजार रुपए का जुगाड़ कर लो। '

'मेरे पास इतने पैसे नहीं थे। उस लड़के ने अपने पैसे से मेरा फॉर्म भरा। मैं बस साइन करने के लिए फरीदाबाद गई थी। इस बीच दीदी जीजा को लगातार मनाती रही।

सब गलत समझेंगे तुम घर लौट जाओ

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एक रोज़ हिम्मत हारकर मैं घर से निकल पड़ी। हिम्मत करके मैं उस लड़के के पास पहुंच गई। ये दूसरी बार था, जब मैं गुड़गांव से फरीदाबाद गई थी। भला हो कि उस लड़के ने बातों-बातों में अपना पता मुझे बताया था। भगवान से दुआ करते हुए वो लड़का अपने रूममेट के साथ फ्लैट की सीढ़ियों पर मुझे मिला तो बस चौंक ही गया।

वो बोला, ''तुम यहां क्या कर रही हो. कब आई. कैसे-किसके साथ आई?' जवाब में मैंने कहा, ''मुझे शादी नहीं करनी. बस पढ़ना है। मेरी मदद कर दो प्लीज। मैं घर से भागकर आई हूं। अब मुझे घर नहीं जाना है। यहीं तुम्हारे कमरे के कोने में सो जाऊंगी। घर का सारा काम कर दूंगी।

वो लड़का मुझे समझाने लगा, ''मैं तुम्हारे पापा से बात करुंगा। सब गलत समझेंगे तुम घर लौट जाओ।'' मेरी ज़िद देखते हुए उसने दीदा का फोन नंबर लेकर उन्हें मेरे सही सलामत रहने की बात और अपना पता बताया। दीदी, जीजा मुझे लेने पहुंच गए।

इसके कुछ वक्त बाद मैं दीदी के पास ही रही। दीदी मेरी हमराज़ थीं। पापा के डर से 2 साल घर नहीं गई। धीरे-धीरे चीजें नॉर्मल होने लगीं। कॉलेज की फीस के लिए ब्यूटी पार्लर में काम करना शुरू किया। फिर पीजी में रहने लगी, ट्यूशन पढ़ाया।

पड़ोसी कहने लगे लड़की भाग गई है

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इस बीच गांव में पड़ोसी कहने लगे- लड़की भाग गई है।

कोई कहता किसी से शादी कर ली। कोई कुछ कहता- कोई कुछ। आईआईएमसी से पढ़ाई फिर नेट करने और फिर नौकरी लगने तक, मेरे भागने के चर्चे गांव में रहे। और मेरी शादी होने तक मेरी हवा- हवाई शादी के चर्चे भी।

गांवों की लड़कियों की राह आसान नहीं होती है। इतने साल मैंने लड़ाई की, अपने छोटे-छोटे सपनों और पसंद की पढ़ाई के लिए। जब मैं घर में अंदरुनी तौर पर लड़ रही थी तो मेरे पेरेंट्स समाज से लड़ रहे थे।

तमाम परेशानियों के बावज़ूद आज ज़िंदगी खूबसूरत लगती है, क्योंकि ये ज़िंदगी अपने हाथों बनाई हुई है।

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