विश्व साहित्य का आकाश: ‘हंगर’- भूख की महागाथा
- 1890 में लिखे ‘सल्ट’ ( इंग्लिश में ‘हंगर’, हिन्दी में ‘भूख’) तथा ‘पान’ (1894) से क्नूत पेडरसन हाम्सुन को विश्व ख्याति मिली।
- ‘हंगर’ में गृहविहीन युवा नायक क्रिस्टीनिया (जिसे आज ओस्लो कहते हैं) की सड़कों पर भूखा-प्यासा भटक रहा है। उसके रहने का स्थान दयनीय है, उसका जीवन दयनीय है।
विस्तार
आज से सौ साल से कुछ अधिक समय की बात है, एक आदमी नोबेल अकादमी के मंच पर खड़ा होता है। उसका सिर घूम रहा है, वह हवा में उड़ रहा है, क्योंकि उस पर नोबेल पुरस्कार की वर्षा हुई है। उसे 1920 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ है। वह अपनी एवं अपने देश की ओर से स्वीडिश अकादमी का धन्यवाद करता है। उसने दूसरों से बहुत कुछ सीखा है और उसके लिखने की अपनी एक खास शैली है। मगर उसे अफसोस है, उसका यौवन जा चुका है। और वह दुनिया के युवाओं के लिए, जीवन में जो कुछ भी युवा है, उसके लिए प्रतिभोज के अवसर पर प्रपोज करता है।
क्नूत हाम्सुन को उनके उपन्यास ‘ग्रोथ ऑफ द सोयल’ हेतु उस साल का नोबेल पुरस्कार मिला था। ‘यह उनके स्थाई महत्व के महान कार्य ‘ग्रोथ ऑफ द सोयल’ हेतु दिया जाता है।’ ऐसा अकादमी ने अपनी प्रशंसा में कहा।
नॉर्वे में 4 अगस्त 1859 को जन्मे क्नूत का पूरा नाम क्नूत पेडरसन हाम्सुन है। जिंदगी भर उन्होंने नॉर्वेजियन भाषा में लिखा। पेट पालने के लिए उन्होंने मोची, राज मिस्त्री, शिक्षक आदि तरह-तरह के काम किए, पर सदा भयंकर गरीबी में रहे। लिखने का जुनून पागलपन की हद तक था, मगर लिखने केलिए कागज-कलम और सकून चाहिए, जिसके लिए सदा तरसना पड़ा।
जैसे वॉन गॉग बिना पेंट किए नहीं रह सकता था, वैसे ही हाम्सुन के लिए बिना लिखे जवित रहना कठिन था। 1890 में लिखे ‘सल्ट’ ( इंग्लिश में ‘हंगर’, हिन्दी में ‘भूख’) तथा ‘पान’ (1894) से उन्हें विश्व ख्याति मिली। स्वीडिश अकादमी के अनुसार, ‘सल्ट’ (‘हंगर’) नॉर्वे साहित्य में वास्तविक रूप में पहला आधुनिक उपन्यास माना जाता है।’
कालजयी उपन्यास ‘हंगर’ (‘भूख’)
आज बात करती हूं, उनके इसी कालजयी उपन्यास ‘हंगर’ (‘भूख’) की। हाम्सुन को नॉर्डिक का दॉस्तवस्की कहा जाता है। काफ्का, थॉमस मान से प्रभावित हाम्सुन के साहित्य को मनोवैज्ञानिक साहित्य का अग्रणी माना जाता है। ‘हंगर’ उपन्यास को बीसवीं सदी के साहित्यिक उद्घाटन, आधुनिक एवं मनोवैज्ञानिक साहित्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
भूख पर कई लोगों ने कलम चलाई है, नोबेल पुरस्कृत गुंटर ग्रास ने भी ‘फ्लाउंडर’ नाम से एक किताब लिखी है, जो भूख पर विश्लेषण है। ‘भूख’ नाम से कई कहानिया मिलती हैं। मगर हाम्सुन भूख का विश्लेशण नहीं कर रहे हैं।
यहां उपन्यास का नायक भूख से गुजर रहा है। भूख जिससे आंतें सूख कर ऐंठ गई हैं। क्रोध, हताशा, खीज, विफलता, निराशा, गरीबी, बेरोजगारी और भूख का ऐसा चित्रण साहित्य में दुर्लभ है।
आप स्वयं अपने जीवन में भूख से गुजरे हैं अथवा नहीं, पर जब आप इस किताब से गुजरते हैं, तो भूख से लड़ते एक युवा आदमी से तादात्म अवश्य बैठा पाते हैं। एक आदमी कितने मोर्चों पर एक साथ संघर्ष कर सकता है, उसे कितने मोर्चों पर संघर्ष करना होता है, यह पढ़ कर द्रवित हुए बिना नहीं रह सकते हैं। इसे पूरा पढ़ पाना अपने आप में यातना की एक नदी से गुजरना है।
यह व्यक्ति गरीब, भूखा और बेरोजगार है, मगर उसमें आत्मसम्मान कूट-कूट कर भरा हुआ है। एक समय ऐसा आता है, जब उसे खाना मिलता है, मगर उसका आत्मसम्मान उस खाने को ग्रहण करने से इंकार कर देता है। स्वाभिमान के चलते, वह किसी से पैसे भी नहीं ले पाता है।
पढ़ते हुए कई बार लगता है, कहीं यह व्यक्ति पागल तो नहीं हो गया है। वैसे भूख एवं हताशा आदमी को पागल कर दे तो क्या आश्चर्य! मगर यह व्यक्ति पागल नहीं है। इस लेखन में कहीं आत्म दया भी नहीं है।
मेरे पास अर्ध-आत्मकथात्मक उपन्यास ‘सल्ट’ का स्वेरा लिन्स्टाड द्वारा अनूदित ‘हंगर’ है। हिन्दी में याह तेजी ग्रोवर के अनुवाद में उपलब्ध है। पूरी किताब एकालाप, लंबे-लंबे एकालाप का समुच्च्य है। सारा कुछ नायक के दिमाग में चल रहा है।
आप पढ़ते जाते हैं और उम्मीद करते जाते हैं कि कुछ अच्छा होगा, कुछ सकारात्मक होगा। मगर नहीं, यहां कोई पोयटिक जस्टिस नहीं होती है, कुछ अच्छा नहीं होता है। वास्तविकता है, एक ईमानदार आदमी के साथ कुछ अच्छा नहीं होता है। यह भी सच है कि लेखक हाम्सुन ने बहुत गरीबी में दिन गुजारे थे।
एक समय ऐसा आया जब उनकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली गई थी, कुछ समय केलिए उन्हें मानसिक अस्पताल में भी रहना पड़ा। मगर उन्होंने इतना अधिक लिखा है कि उनकी मृत्यु के दो वर्ष बाद 1954 में उनका समस्त लेखन 15 भागों में प्रकाशित हुआ है।
सम्पत्ति जप्त कर ली गई, क्योंकि जब नाजी सेना ने नॉर्वे पर आक्रमण किया तो हाम्सुन ने जर्मन सेना के प्रति सहानुभूति दिखाई थी। इस कारण काफी समय तक उनके देश में लोग उनका नाम नहीं लेते थे। लेकिन लोग उनकी किताबें पढ़ते थे, भले ही छिपा कर पढ़ते थे।
युवा नायक क्रिस्टीनिया की कहानी
‘हंगर’ में गृहविहीन युवा नायक क्रिस्टीनिया (जिसे आज ओस्लो कहते हैं) की सड़कों पर भूखा-प्यासा भटक रहा है। उसके रहने का स्थान दयनीय है, उसका जीवन दयनीय है। जिंदगी के कगार पर यह व्यक्ति जीवित रहने हेतु हताशा के साथ संघर्ष कर रहा है, मानसिक-शारीरिक रूप से लड़ रहा है। यहां भूख का वर्णन और विस्तार बहुत जीवंत और यथार्थपरक है।
‘स्ट्रीम ऑफ कॉन्सेसनेस’ की शैली में लिखी, इस किताब को पढ़ना आसान नहीं है, पर आप पढ़ते जाते हैं। किसी आदमी का यूं भहराना बड़ा हृदय विदारक है। आज यह शैली भले बहुत सामान्य मानी जाती है, मगर 1890 में, आज से 184 साल पहले शायद पाठकों ने इस शैली के बारे में सुना भी न था।
‘हंगर’ जितना प्रभावशाली गद्य कोई जीनियस ही लिख सकता है। हृदयग्राही, अस्तित्ववादी साथ ही श्याह कहानी आपको अपनी गिरफ्त में ले लेती है। भूख आदमी के साथ क्या कर सकती है, यदि यह जानने में आपकी रूचि है, तो उपन्यास ‘हंगर’ एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए। 150 पन्नों से कुछ ऊपर की इस किताब की भूमिका एवं नोट्स इसे पढ़ने में सहायक हैं।
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