अमर उजाला संवाद: राम ने वन गमन के लिए अयोध्या से रामेश्वरम का मार्ग ही क्यों चुना? क्या था इसके पीछे का भाव
शिप्रा पाठक ने वन गमन के पथ को लेकर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। एक बड़ा सवाल ये कि राम ने इस यात्रा के लिए गोवा, हिमाचल, खंडाला जैसे रास्तों का चयन क्यों नहीं किया, कितने सुंदर-सुदर रास्ते हैं। उन्होंने अयोध्या से रामेश्वरम का ही मार्ग क्यों चुना?
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अमर उजाला संवाद का कारवां इस बार भारत का हृदय यानी मध्य प्रदेश में पहुंचा है। पहली बार संवाद का मंच भोपाल में सजा है। अमर उजाला संवाद विकास से जुड़ी नीतियों, अर्थव्यवस्था, सिनेमा, खेल और आध्यात्म जैसै विष्यों पर सारगर्भित चर्चा के कारण जाना जाता है।
संवाद के मंच पर वॉटर वुमन शिप्रा पाठक ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। उन्होंने जल संवर्धन से जुड़े मामलों पर अपने विचारों से दर्शकों को रूबरू कराया। शिप्रा पाठक ने 'जल है तो कल है' विषय पर चर्चा करते हुए जल संवर्धन पर अपने विचार रखे।
राम-सीता वन गमन पर चर्चा
संवाद के मंच पर वॉटर वुमन शिप्रा पाठक ने प्रभु श्री राम और मां सीता के वन-गमन पर भी चर्चा की। शिप्रा कहती हैं, राम के जीवन को आप तभी जान सकते हैं जब उनके वन गमन को देखेंगे। राम की पूरी यात्रा के मर्यादित होने का बात हम सभी लगातार करते रहते हैं पर हमें ये समझना सबसे ज्यादा जरूरी है कि ये पूरी यात्रा मर्यादित इसलिए थी क्योंकि मां जानकी कवच बनकर उनके साथ चल रही थीं। इसी को लेकर शिप्रा पाठक ने 'जानकी वन गमन' नाम से एक किताब भी लिखी है।
राम ने क्यों चुना अयोध्या से रामेश्वरम का ही मार्ग?
कार्यक्रम के दौरान शिप्रा पाठक ने राम-जानकी वन गमन के पथ को लेकर भी लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। एक बड़ा सवाल ये कि राम ने इस यात्रा के लिए गोवा, हिमाचल, खंडाला जैसे रास्तों का चयन क्यों नहीं किया? कितने तो सुंदर-सुदर रास्ते हैं। उन्होंने अयोध्या से रामेश्वरम का ही मार्ग क्यों चुना?
शिप्रा पाठक कहती हैं, इस यात्रा को समझने के दौरान मुझे पता चला कि सारी महत्वपूर्ण नदियां जैसे- सरयू, गंगा, यमुना, सरस्वती, मंदाकिनी, नर्मदा, कृष्ण इसी रास्ते में पड़ती हैं। इस मार्ग के चयन के पीछे राम का भाव ये हो सकता था, वो ये संदेश देना चाहते थे कि नदियां रहेंगी तो हम रहेंगे। हमें ही इसकी रक्षा करनी होगी।
पर्वतों की परिक्रमा कर राम ने दिया संदेश
राम जब चित्रकूट में रहे तो कामनानाथ पर्वत की परिक्रमा की। अब सवाल ये है कि विष्णु के अवतार को प्रतिदिन पर्वत की परिक्रमा की आवश्यकता क्या थी? इसका जवाब ये है कि राम संदेश देना चाहते थे कि ये बस परिक्रमा नहीं है, राम मानवजाति को बता रहे थे कि इन सभी पर्वतों को बांधे रखना है। ऐसा ही श्रीकृष्ण ने जब गोवर्धन उठाया तो इसके पीछे भी यही संदेश था कि ये पर्वत हमारे रक्षक हैं, हमें भी इनकी रक्षा करनी चाहिए।
राम चेतना हैं, इसे हृदय में उतारिए
शिप्रा पाठक कहती हैं, राम-जानकी सिर्फ मानव मात्र नहीं थे, वे तत्व हैं, चेतना हैं। इसे हम जितना इस तत्व को धारण करेंगे उतनी चेतना का विकास होता रहेगा। ये मंदिर बनाने तक सीमित नहीं है, राम चेतना को हमें हृदय में समाहित करना होगा ताकि हम बेहतर बन सकें।