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झारखंड: खात्मे की कगार पर नक्सलवाद…बचे केवल दस इनामी नक्सली, लूटे गए हथियार भी 99.9 प्रतिशत बरामद
Sat, 17 Oct 2026 03:34 PM IST
प्रतीक पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: प्रतीक पांडेय
Updated Sat, 17 Oct 2026 03:34 PM IST
सार
सुरक्षा बलों के कड़े अभियानों, ताबड़तोड़ मुठभेड़ों और बड़े पैमाने पर हुए आत्मसमर्पण के कारण झारखंड में नक्सलवाद अपने अंतिम दौर यानी खात्मे की कगार पर पहुंच चुका है। राज्य में एक करोड़ रुपये के इनामी मिसिर बेसरा और असीम मंडल जैसे शीर्ष नक्सलियों की गिरफ्तारी तथा कई बड़े नक्सलियों के मारे जाने के बाद अब नितेश यादव, मनोहर गंझू और आरिफ उर्फ शशिकान्त समेत केवल 10 इनामी नक्सली बचे हैं।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार राज्य में नक्सलवाद लगभग समाप्त हो चुका है और नक्सलियों द्वारा लूटे गए हथियारों का 99.9 प्रतिशत हिस्सा भी सुरक्षा बल बरामद कर चुके हैं। झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों, सीआरपीएफ कोबरा तथा झारखंड जगुआर के संयुक्त अभियानों के कारण पिछले कुछ वर्षों में नक्सलियों की कमर पूरी तरह टूट चुकी है।
सुरक्षा बलों की बड़ी सफलता
राज्य में एक करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष नक्सली कमांडरों, जैसे विवेक उर्फ प्रयाग मांझी और अनुज उर्फ सहदेव सोरेन को या तो मुठभेड़ में ढेर कर दिया गया है या फिर वे सुरक्षा बलों की कड़ी कार्रवाई का शिकार बने हैं। सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन क्लीन’ और सरकार की आत्मसमर्पण व पुनर्वास नीति के कारण लाल आतंक का ढांचा ध्वस्त हुआ है। इस नीति के तहत एक करोड़ रुपये के इनामी नक्सलियों के बॉडीगार्ड्स, सब-जोनल कमांडरों और एरिया कमांडरों समेत दर्जनों नक्सलियों ने हथियारों के साथ मुख्यधारा में लौटना शुरू कर दिया है। नक्सल विरोधी अभियानों और हथियारों की लगातार बरामदगी से जुड़े आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि राज्य में लाल आतंक का दायरा सिमटकर लगभग शून्य हो गया है।
इनामी नक्सलियों का खात्मा
सुरक्षा बलों की ओर से चलाए जा रहे निरंतर अभियानों के चलते उग्रवादी और नक्सली संगठनों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। एक तरफ जहां एक करोड़ रुपये के इनामी मिसिर बेसरा और असीम मंडल जैसे बड़े नक्सली सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं, वहीं कई अन्य शीर्ष कैडर मुठभेड़ में मारे गए हैं। इसके परिणामस्वरूप भाकपा माओवादी, टीपीसी और पीएलएफआई जैसे संगठनों की पकड़ राज्य से ढीली पड़ गई है। भारी मात्रा में हथियारों की बरामदगी और शीर्ष कमान के सफाए के बाद बचे हुए उग्रवादियों के पास अब सीमित विकल्प ही रह गए हैं। सुरक्षा बल बचे हुए नक्सलियों को भी पकड़ने या निष्प्रभावी करने के लिए लगातार अभियान चला रहे हैं।
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बचे हुए इनामी नक्सली
राज्य में अब केवल 10 इनामी नक्सली बचे हैं, जिनकी तलाश में सुरक्षा बल जुटे हैं। इनमें बिहार के गया जिले का निवासी और 15 लाख रुपये का इनामी भाकपा माओवादी संगठन का नितेश यादव उर्फ इरफान उर्फ नन्दू शामिल है। टीपीसी उग्रवादी संगठन का पलामू निवासी आरिफ जी उर्फ शशिकान्त उर्फ सुरेश जी 10 लाख रुपये का इनामी उग्रवादी है। भाकपा माओवादी से जुड़े लातेहार निवासी मनोहर गंझू उर्फ सोहन गंझू उर्फ दिनेश पर भी 10 लाख रुपये का इनाम घोषित है। पलामू निवासी गोदराय यादव उर्फ संजय यादव भाकपा माओवादी का 10 लाख रुपये का इनामी नक्सली है।
भाकपा माओवादी संगठन के गढ़वा निवासी पंकज कोरवा पर पांच लाख रुपये और गढ़वा निवासी राजु भुइयां पर पांच लाख रुपये का इनाम घोषित है। पीएलएफआई उग्रवादी संगठन से जुड़े गुमला जिला निवासी बलराम लोहरा उर्फ जटु पर दो लाख रुपये का इनाम है। इसके अलावा पीएलएफआई के समुएल बुध उर्फ समु पर एक लाख रुपये और चतरा जिला निवासी टीपीसी उग्रवादी सुदेश गंझू उर्फ गुरुदेव पर एक लाख रुपये का इनाम घोषित है।
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सुरक्षा बलों की बड़ी सफलता
राज्य में एक करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष नक्सली कमांडरों, जैसे विवेक उर्फ प्रयाग मांझी और अनुज उर्फ सहदेव सोरेन को या तो मुठभेड़ में ढेर कर दिया गया है या फिर वे सुरक्षा बलों की कड़ी कार्रवाई का शिकार बने हैं। सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन क्लीन’ और सरकार की आत्मसमर्पण व पुनर्वास नीति के कारण लाल आतंक का ढांचा ध्वस्त हुआ है। इस नीति के तहत एक करोड़ रुपये के इनामी नक्सलियों के बॉडीगार्ड्स, सब-जोनल कमांडरों और एरिया कमांडरों समेत दर्जनों नक्सलियों ने हथियारों के साथ मुख्यधारा में लौटना शुरू कर दिया है। नक्सल विरोधी अभियानों और हथियारों की लगातार बरामदगी से जुड़े आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि राज्य में लाल आतंक का दायरा सिमटकर लगभग शून्य हो गया है।
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इनामी नक्सलियों का खात्मा
सुरक्षा बलों की ओर से चलाए जा रहे निरंतर अभियानों के चलते उग्रवादी और नक्सली संगठनों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। एक तरफ जहां एक करोड़ रुपये के इनामी मिसिर बेसरा और असीम मंडल जैसे बड़े नक्सली सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं, वहीं कई अन्य शीर्ष कैडर मुठभेड़ में मारे गए हैं। इसके परिणामस्वरूप भाकपा माओवादी, टीपीसी और पीएलएफआई जैसे संगठनों की पकड़ राज्य से ढीली पड़ गई है। भारी मात्रा में हथियारों की बरामदगी और शीर्ष कमान के सफाए के बाद बचे हुए उग्रवादियों के पास अब सीमित विकल्प ही रह गए हैं। सुरक्षा बल बचे हुए नक्सलियों को भी पकड़ने या निष्प्रभावी करने के लिए लगातार अभियान चला रहे हैं।
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बचे हुए इनामी नक्सली
राज्य में अब केवल 10 इनामी नक्सली बचे हैं, जिनकी तलाश में सुरक्षा बल जुटे हैं। इनमें बिहार के गया जिले का निवासी और 15 लाख रुपये का इनामी भाकपा माओवादी संगठन का नितेश यादव उर्फ इरफान उर्फ नन्दू शामिल है। टीपीसी उग्रवादी संगठन का पलामू निवासी आरिफ जी उर्फ शशिकान्त उर्फ सुरेश जी 10 लाख रुपये का इनामी उग्रवादी है। भाकपा माओवादी से जुड़े लातेहार निवासी मनोहर गंझू उर्फ सोहन गंझू उर्फ दिनेश पर भी 10 लाख रुपये का इनाम घोषित है। पलामू निवासी गोदराय यादव उर्फ संजय यादव भाकपा माओवादी का 10 लाख रुपये का इनामी नक्सली है।
भाकपा माओवादी संगठन के गढ़वा निवासी पंकज कोरवा पर पांच लाख रुपये और गढ़वा निवासी राजु भुइयां पर पांच लाख रुपये का इनाम घोषित है। पीएलएफआई उग्रवादी संगठन से जुड़े गुमला जिला निवासी बलराम लोहरा उर्फ जटु पर दो लाख रुपये का इनाम है। इसके अलावा पीएलएफआई के समुएल बुध उर्फ समु पर एक लाख रुपये और चतरा जिला निवासी टीपीसी उग्रवादी सुदेश गंझू उर्फ गुरुदेव पर एक लाख रुपये का इनाम घोषित है।