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किन नेताओं और पार्टियों का भविष्य तय करेगा झारखंड विधानसभा चुनाव

Mon, 23 Dec 2019 01:06 PM IST
अनिल पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: अनिल पांडेय Updated Mon, 23 Dec 2019 01:06 PM IST
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Jharkhand Election Results 2019: What is at stake in Jharkhand for key political parties and leaders
झारखंड में इनकी प्रतिष्ठा दांव पर - फोटो : Amar Ujala Graphics

झारखंड विधानसभा चुनाव के परिणाम पर कई राजनीतिक दलों और नेताओं का भविष्य निर्भर है। राज्य में चुनाव के दौरान ही केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम देश में लागू कर दिया। भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार का फोकस विकास से हटाकर नागरिकता कानून, एनआरसी और राम मंदिर पर कर लिया। 81 सीटों वाली झारखंड विधानसभा के नतीजों से राजनीतिक भविष्य और नीतियां, दोनों ही तय होंगी। आइए जानते हैं कि इस चुनाव में किसका क्या-क्या दांव पर लगा है।

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रघुवर दास

झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास, पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले राज्य के पहले सीएम हैं। पांच साल के दौरान उन पर भाजपा के स्थानीय नेताओं को नजरअंदाज करने के आरोप लगते रहे और उनकी कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए। इन्हीं पांच वर्षों के दौरान भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सरयू राय ने पार्टी छोड़ी और सीएम रघुवर दास को पूर्वी जमशेदपुर सीट से विधानसभा चुनाव में चुनौती दी है।

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जमशेदपुर पूर्व सीट से रघुवर दास सन 1995 से लगातार जीतते आ रहे हैं। यह तब की बात है जब बिहार और झारखंड का विभाजन नहीं हुआ था। लेकिन यह पहली बार है जब राय को उनकी सीट पर कड़ी टक्कर मिल रही है। यदि रघुवर अपनी सीट बचा नहीं पाएंगे तो पार्टी के भीतर उनके खिलाफ स्वर मुखर हो जाएंगे।

भाजपा

ऐसे समय में जब पूरे देश में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर बवाल मचा हुआ है, तब झारखंड के विधानसभा चुनाव के परिणाम देश की राजनीति पर प्रभावी असर डाल सकते हैं। भाजपा ने अपना चुनाव प्रचार विकास से शुरू किया था, लेकिन 10 दिसंबर के बाद यह पूरी तरह से नागरिकता कानून, एनआरसी और राम मंदिर पर फोकस हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने सीएए और एनआरसी को प्रमुख मुद्दा बताते हुए अपने प्रचार के केंद्र में रखा।

इस समय देश में नागरिकता कानून के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। ऐसे में यदि भाजपा को झारखंड में जीत हासिल होती है, तो पार्टी इसे केंद्र सरकार के फैसलों पर मुहर के रूप में प्रचारित करेगी। इससे पार्टी को दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी मदद मिल सकती है और वो आम आदमी पार्टी के खिलाफ मजबूती से लड़ेगी। वहीं यदि पार्टी सत्ता से दूर होती है तो उसे अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा। लेकिन इसी के साथ यह पार्टी के हाथ से फिसलने वाला पांचवां बड़ा राज्य बन जाएगा। इससे पहले पार्टी मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की कुर्सी गंवा चुकी है।

हेमंत सोरेन

झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया हेमंत सोरेन के लिए यह चुनाव वर्चस्व का सवाल है। वो अपने पिता शिबू सोरेन की छाया से बाहर आना चाहते हैं। और इसके लिए उनकी पार्टी को यह चुनाव जीतना ही होगा। इस बार के चुनाव प्रचार में सोरेन में मतदाताओं से ज्यादा से ज्यादा संपर्क साधने की कोशिश की है। उन्होंने चुनाव प्रचार को स्थानीय मुद्दों पर फोकस रखा। 2014 में उनकी पार्टी को राज्य की विधानसभा में 19 सीटें मिली थीं। यह संख्या झारखंड राज्य बनने के बाद सर्वाधिक था। राज्य की 26 फीसदी आदिवासी आबादी झामुमो की शक्ति है।

अपने चुनाव प्रचार के दौरान सोरेन ने सभी महत्वपूर्ण हिस्सों में अच्छी तरह से प्रचार किया। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या उनकी यह मेहनत विधायकों की संख्या के रूप में प्राप्त होगी और क्या उनकी पार्टी अपना 19 का रिकॉर्ड तोड़ सकेगी। यदि झामुमो सबसे बड़ी पार्टी बनती है तो निश्चित रूप से सोरेन क्षेत्रीय क्षत्रप बनने में सफल हो जाएंगे। राज्य में गैरभाजपा सरकार तभी बन सकेगी, जब सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा और उसके सहयोगी दल कुल विधानसभा सीटों में से 43 या उससे अधिक पर जीत दर्ज कर लें।

कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी की हालत झारखंड में अच्छी नहीं कही जा सकती है। 2009 से अब तक राज्य के चुनावों में पार्टी को जो कुछ भी हासिल हुआ है वो केवल झारखंड मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय जनता दल का गठबंधन सहयोगी बनने से ही मिला है। यह पहली बार है जब झामुमो, कांग्रेस और राजद, राज्य में एकसाथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।

इस गठबंधन को उम्मीद है कि ऐसा करने से वह भाजपा के वोट काट सकेंगे और सत्ता तक पहुंचने की राह आसान होगी। कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में उसे 14 से ज्यादा सीटें हासिल होंगी। यदि ऐसा नहीं भी होता है तो भी पार्टी विपक्ष में मजबूत स्थिति में रहेगी। लेकिन राज्य में मिलने वाली सीटों की संख्या से कांग्रेस पार्टी केंद्र में भाजपा को घेरने की शक्ति जुटाएगी।

सुदेश महतो

आजसू के प्रमुख सुदेश महतो की पूरी कोशिश है कि वो अपनी पार्टी को एक मजबूत क्षेत्रीय दल के रूप में स्थापित कर सकें। 2014 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने भाजपा की छवि के साथ चुनाव लड़ा था। पार्टी ने आठ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और पांच पर जीत हासिल की थी। 2019 के चुनावों में भी आजसू की आरजू है कि वो किंगमेकर बने। इस बार पार्टी ने 53 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। हालांकि देखना यह होगा कि महतो खुद अपनी सीट सिल्ली को बचा पाते हैं या नहीं।

बाबूलाल मरांडी

मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए गठबंधन का हिस्सा थी। लेकिन सीटों के बंटवारे में असहमति के चलते मरांडी की पार्टी ने अकेले ही चुनाव लड़ने का फैसला किया था। झाविमो का भविष्य मौजूदा विधानसभा चुनाव के परिणाम से तय होगा। हालांकि 2009 में पार्टी ने राज्य विधानसभा में 11 सीटें जीती थीं।

सरयू राय

पूर्व भाजपा नेता और रघुवर दास मंत्रिमंडल के सदस्य रहे सरयू राय ने पार्टी से विद्रोह करके जमशेदपुर पूर्व विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा है। यह सीट राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास की रही है। यहां का चुनाव परिणाम राय का राजनीतिक भविष्य भी तय करेगा। सरयू भाजपा में रहते हुए हमेशा रघुवर की नीतियों और फैसलों का मुखर विरोध करते रहे थे। उनका पूरा विधानसभा चुनाव प्रचार भाजपा के विरोध में ही रहा।

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