नई पीढ़ी से दूर हो रही ‘डोगरी’, स्कूल स्तर पर अहमियत दिलाने की जरूरत
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डोगरी भाषा का पाठ्यक्रम इस तरह से बनाया जाता है कि विद्यार्थियों की इसमें रुचि कम हो रही है। इसके लिए जरूरी है कि डोगरी का पाठ्यक्रम बच्चों की रुचि के हिसाब से बनाया जाए ताकि उनमें डोगरी को जानने की जिज्ञासा बढ़े। डोगरी भाषा और सभ्यता को बचाना बहुत ही जरूरी है। ऐसा केवल तब हो सकता है जब स्कूल स्तर से ही बच्चों को इसकी अहमियत के बारे में बताया जाए। शिक्षा विभाग की तरफ से हायर सेकेंडरी स्कूलों में डोगरी विषय को अनिवार्य करने की आवश्यकता है।
डोगरी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्य है। इसे 22 दिसंबर 2003 को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। पिछले साल 2 अप्रैल को उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए राज्य भर के सभी स्कूलों में डोगरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को बिना किसी भेदभाव के पढ़ाने के संबंध में एक आदेश लागू करने का निर्देश दिया था।
डोगरी को इतनी अहमियत नहीं दिला पाया जितनी आवश्यकता थी
"डोगरी भाषा में बाल साहित्य की कमी है, जिसके चलते विद्यार्थियों में से डोगरी पढ़ने की रुचि खत्म हो जाती है। इसी के साथ जो स्कूलों में डोगरी का पाठ्यक्रम शामिल किया जाता है, वो भी सही ढंग से नहीं बनाया जाता। जिन्हें डोगरी के बारे में जानकारी नहीं है वह डोगरी का अच्छा पाठ्यक्रम कैसे बना सकते हैं। सरकार भी डोगरी भाषा के प्रति गंभीर नहीं है। मुझे लगता है कि यह माता-पिता का फर्ज है कि वह अपने बच्चों को डोगरी बोलने के लिए प्रेरित करें और उनके साथ डोगरी का प्रयोग भी करें। हम किसी भी भाषा को देख लें हर कोई बड़े ही गर्व के साथ अपनी भाषा में बात करता है लेकिन सिर्फ डोगरे ही हैं जो डोगरी बोलने में शर्म महसूस करते हैं।"- सुरजीत होश बडसली, डोगरी लेखक