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Bombay High Court: 'महाराष्ट्र में अतिक्रमण करने पर मुफ्त आवास मिलता है', राज्य सरकार पर अदालत की सख्त टिप्पणी
Fri, 14 Feb 2025 10:03 PM IST
बशु जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: बशु जैन
Updated Fri, 14 Feb 2025 10:03 PM IST
सार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को महाराष्ट्र में बढ़ रहे अतिक्रमण को लेकर सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र देश का अकेला ऐसा राज्य है जहां अतिक्रमण करने वालों को मुफ्त आवास का लाभ दिया जाता है। लगातार हो रहे अवैध निर्माण ने सामूहिक आवास की समस्या को अधिक पेचीदा बना दिया है।
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बॉम्बे हाईकोर्ट
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को महाराष्ट्र में बढ़ रहे अतिक्रमण को लेकर सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र देश का अकेला ऐसा राज्य है जहां अतिक्रमण करने वालों को मुफ्त आवास का लाभ दिया जाता है। लगातार हो रहे अवैध निर्माण ने सामूहिक आवास की समस्या को अधिक पेचीदा बना दिया है।
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30 जुलाई 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद महाराष्ट्र स्लम क्षेत्र अधिनियम 1971 की समीक्षा के संबंध में स्वत: संज्ञान के आधार पर एक याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुनवाई की। न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने कहा कि सरकार की अद्भुत नीति के चलते देश में हम एकमात्र ऐसे राज्य हैं जहां अतिक्रमण करने के बाद मुफ्त आवास का लाभ दिया जाता है। हमने पिछले फैसले में पूछा था कि क्या यह स्वीकार्य है? क्या यह एक सांविधानिक नीति है, जिसे संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त है?
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महाराष्ट्र स्लम क्षेत्र अधिनियम 1971 के कार्यान्वयन को लेकर चिंता जाहिर की थी और उच्च न्यायालय को ऑडिट करने का निर्देश दिया था। यह पहली बार है जब अदालत किसी अधिनियम का ऑडिट करेगी। हाईकोर्ट ने कहा कि अतिक्रमण के कारण बड़े पैमाने पर आवास की समस्या बढ़ रही है। आपके पास राज्य, निजी, नगरपालिका, केंद्र सरकार की जमीनें हैं। मैंग्रोव जमीन पर भी अवैध निर्माण होते हैं, जिन्हें समय के साथ झुग्गी झोपड़ी क्षेत्र घोषित कर दिया जाता है।
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अदालत ने कहा कि धीरे-धीरे मैंग्रोव खत्म हो गए और झुग्गियां बन गईं। फिर इन झुग्गियों को पुनर्विकास और लाभों के लिए नियमित झुग्गियां घोषित कर दिया जाता है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाटा ने कहा कि किसी को भी अतिक्रमण करने और अवैध कब्जा करने का अधिकार नहीं है। भले ही आर्थिक वास्तविकताएं किफायती आवास की कमी के कारण प्रवासियों को अवैध बस्तियों में रहने के लिए मजबूर करती हैं।
उच्च न्यायालय ने यह भी आशंका जताई कि अनियंत्रित पुनर्विकास से असहनीय शहरी वातावरण बन जाएगा। कोर्ट ने मुंबई में घटती हरित जगहों और खेल सुविधाओं के बारे में भी चिंता जताई। मामले की अगली सुनवाई 27 फरवरी को होगी।