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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Yasin malik life imprisonment: Big question is that who saved this separatist leaders from past 30 years

Yasin Malik Life Imprisonment: 30 साल तक किसकी 'फिरन' में छिपा रहा यासीन, क्या सत्ता में बैठे नेताओं से हुई चूक!

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 25 May 2022 06:45 PM IST
सार

पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने बताया, यहां पर जरूर यह विचार करना चाहिए कि एनआईए द्वारा दर्ज किए गए केस में पांच साल के भीतर सजा हो सकती है, तो टाडा जैसे मामलों में 30 साल बीतने के बाद भी यासीन मलिक को दोषी नहीं ठहराया जा सका। इसका जवाब सरकार और सिस्टम को देना चाहिए...

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Yasin malik life imprisonment: Big question is that who saved this separatist leaders from past 30 years
यासीन मलिक को उम्रकैद - फोटो : PTI

विस्तार

यासीन मलिक को उसके बुरे कर्मों की सजा मिल गई है। उसे आजीवन कारावास मिला है। अब वह कानूनी शिकंजे में आ ही गया है तो उसके गुनाहों की फेहरिस्त भी लंबी हो चली है। पांच साल पहले 'गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम' (UAPA) के तहत दर्ज हुए केस में एनआईए अदालत की सजा इस आतंकी के लिए काफी नहीं है। यासीन पर 'टाडा' के तहत दर्ज दो केसों में भी जल्द ही सजा सुनाई जाएगी। हो सकता है कि उनमें उसे फांसी तक की सजा हो जाए। वे दोनों केस तो नब्बे के दशक के हैं। 30-32 साल बाद यासीन मलिक को उन गुनाहों की सजा न मिल पाना, क्रीमिनल जस्टिस सिस्टम और शासन-प्रशासन पर सवाल खड़े करता है।

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जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व डीजीपी एसपी वैद कहते हैं, यहां पर सवाल उठना तो वाजिब है। स्थानीय राजनीतिक दल, खासतौर पर जम्मू-कश्मीर से जुड़ी पार्टियां जो लंबे समय तक सत्ता में रही हैं, वे इस सवाल का जवाब दे सकती हैं। जब एनआईए के केस में महज पांच साल में सजा सुनाई जा सकती है, तो एयरफोर्स के स्क्वैड्रन लीडर रवी खन्ना सहित चार जवानों की हत्या और तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद का अपहरण, जैसे बड़े केसों में तीन दशक के बाद भी यासीन मलिक का कुछ नहीं बिगड़ पाना, मतलब उसे किसी ने तो जरूर अपनी 'फिरन' में छिपा रखा था।

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टाडा केस में तीन दशक बाद भी यासीन मलिक दोषी नहीं

पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने बताया, यहां पर जरूर यह विचार करना चाहिए कि एनआईए द्वारा दर्ज किए गए केस में पांच साल के भीतर सजा हो सकती है, तो टाडा जैसे मामलों में 30 साल बीतने के बाद भी यासीन मलिक को दोषी नहीं ठहराया जा सका। इसका जवाब सरकार और सिस्टम को देना चाहिए। एनआईए, महज पांच साल में ही केस को उसके अंजाम तक पहुंचा देती है, तो नब्बे के दशक में दर्ज हुए केसों में अभी तक किसके बलबूते 'यासीन' बाहर घूमता रहा। कोई तो है, जिसने उसे इतने वर्षों तक बचाए रखा है। जनवरी, 1990 में स्क्वैड्रन लीडर रवि खन्ना और उनके तीन साथियों की श्रीनगर के बाहरी इलाके में हत्या कर दी जाती है। रावलपोरा की इस घटना के लिए यासीन मलिक के संगठन से जुड़े आतंकी जिम्मेदार रहे हैं। रुबिया सईद के अपहरण में भी उसका हाथ रहा है। इन मामलों में कहीं न कहीं, किसी स्तर पर तो हस्तक्षेप रहा है। यासीन मलिक के साथ किसी की तो सहानुभूति रही है। अगर जम्मू कश्मीर पुलिस को फ्री हैंड मिलता तो पांच छह साल में उक्त दोनों केसों में भी सजा हो सकती थी। सरकार आई और चली गई, यासीन मलिक के केस ठंडे बस्ते में पड़े रहे। बड़े स्तर पर 'हस्तक्षेप' के बिना इतने हाई प्रोफाइल केस को दबाना मुश्किल था।

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ये तीन पार्टियां, जिनके रहमोकरम पर यासीन बचता रहा

जम्मू कश्मीर के राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) ने बताया, यासीन मलिक के सिर पर कोई एक हाथ नहीं रहा है। उसे हीरो बनाने में कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी का हाथ रहा है। इन्हीं दलों की सरकार के दौरान मलिक ने खुद को 'घाटी का गांधी' बनने का प्रयास किया था। यासीन मलिक के पुराने केस टाडा जैसे कठोर अधिनियम के तहत दर्ज हैं। उसके बावजूद यासीन मलिक का बाहर घूमना, कहीं न कहीं व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने उसे शेल्टर दिया है। एक पार्टी ने तो उसे देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तक पहुंचा दिया था। इस आतंकी को बेगुनाह साबित करने और घाटी का गांधी, बनाने की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थी। दिल्ली में उसे एक कार्यक्रम में बैठाया गया। पत्रकार ने जब उससे सवाल पूछा तो कई दूसरे लोगों के चेहरे सफेद पड़ने लगे थे।
 

यासीन मलिक को सरकारों का पूरा समर्थन रहा। पाकिस्तान, यासीन के मुद्दे पर सदैव सक्रिय रहा है। बुधवार को यासीन मलिक की सजा सुनाए जाने से कुछ देर पहले भारत में रहे पाकिस्तान के पूर्व राजदूत अब्दुल बासित, मलिक के समर्थन में ट्वीट कर रहे थे। प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री से लेकर अन्य राजनेता यासीन के प्रति सहानुभूति दिखाते रहे। बतौर अनिल गौर, मोदी सरकार बनने के बाद यासीन मलिक पर शिकंजा कसना शुरू हुआ। नतीजा, 2017 में एनआईए ने स्वत: संज्ञान लेकर यासीन के खिलाफ यूएपीए के तहत केस दर्ज कर लिया था। यासीन मलिक पर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने और आतंकियों की मदद करने के लिए धन जुटाने का आरोप लगा है। इन मामलों में दोषी साबित होने वाले व्यक्ति को फांसी या उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

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