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World Bank : शहरी सुविधाओं के लिए 15 साल में भारत को चाहिए 68 लाख करोड़, विश्व बैंक की रिपोर्ट में खुलासा

Tue, 15 Nov 2022 05:25 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Tue, 15 Nov 2022 05:25 AM IST
सार

2011 और 2018 के बीच, निम्न और मध्यम आय वाले देशों के सकल घरेलू उत्पाद के औसत 0.3-0.6 प्रतिशत की तुलना में शहरी संपत्ति कर सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.15 प्रतिशत था। नगरपालिका सेवाओं के लिए कम सेवा शुल्क भी उनकी वित्तीय व्यवहार्यता और निजी निवेश के प्रति आकर्षण को कम करता है।

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World Bank Report : revealed India needs 68 lakh crores in 15 years for urban facilities
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत को गांवों का शहर कहा जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में शहरीकरण ने तेज रफ्तार पकड़ी है। इसकी वजह से शहरों पर संसाधन उपलब्ध कराने का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। इसे लेकर विश्व बैंक की रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को तेजी से बढ़ती शहरी जनसंख्या के चलते अगले 15 साल में 840 बिलियन डॉलर या तकरीबन 68 लाख करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी। 

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यह प्रति वर्ष औसतन 55 बिलियन डॉलर या तकरीबन 4.4 लाख करोड़ रुपये होगा। 'भारत की बुनियादी ढांचे की जरूरतों का वित्तपोषण : वाणिज्यिक वित्त पोषण की बाधाएं और नीतिगत कार्रवाई की संभावनाएं' शीर्षक वाली यह रिपोर्ट उभरते वित्तीय अंतराल को पूरा करने के लिए जल्दी और ज्यादा निजी और वाणिज्यिक निवेश की जरूरत पर जोर देती है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2036 तक 60 करोड़ लोग भारत के शहरों में रह रहे होंगे। यह देश की कुल जनसंख्या का 40 प्रतिशत होगा।
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इसलिए पड़ेगी जरूरत

  • शहरी क्षेत्र में आबादी का दबाव बढ़ेगा तो स्वच्छ पेयजल, निर्बाध बिजली आपूर्ति और सुरक्षित सड़क परिवहन की मांग भी बढ़ेगी। इससे शहरी अवसंरचना और सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका है। 
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  • वर्तमान में, केंद्र और राज्य सरकारें शहरों के बुनियादी ढांचे के 75% से अधिक का वित्त पोषण करती हैं, जबकि शहरी स्थानीय निकाय खुद जुटाए गए राजस्व के माध्यम से 15% वित्त पोषण ही कर पाते हैं।

निजी निवेश बहुत कम
रिपोर्ट के अनुसार, शहरों में सुविधाएं देने के मामले में निजी कंपनियों का निवेश काफी कम है। वर्तमान में भारतीय शहरों की आधारभूत संरचना की जरूरतों का सिर्फ 5 प्रतिशत ही निजी स्रोतों के माध्यम से वित्तपोषित हो रहा है। सरकार का वर्तमान (2018) वार्षिक शहरी अवसंरचना निवेश 16 बिलियन डॉलर (1.29 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच रहा है। ऐसे में मांग व वित्त की उपलब्धता खाई को भरने के लिए निजी वित्त पोषण की आवश्यकता होगी।

कई उपायों का प्रस्ताव
ग्लोबल लीड, सिटी मैनेजमेंट एंड फाइनेंस, वर्ल्ड बैंक और रिपोर्ट के सह-लेखक रोलैंड व्हाइट ने कहा कि भारत सरकार निजी वित्त पोषण तक पहुंचने के लिए शहरों के सामने आने वाली बाजार से जुड़ी दिक्कतों को हटाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में कई उपायों का प्रस्ताव है जो शहर, राज्य और संघीय एजेंसियों द्वारा भविष्य को ध्यान में रख कर उठाए जा सकते हैं। इसके जरिये निजी वाणिज्यिक वित्त भारत की शहरी निवेश चुनौती के समाधान का एक बड़ा हिस्सा बन जाएगा। 

सुझाव...शहरी निकायों व नगर पालिका को मजबूत बनाने की जरूरत
विश्व बैंक में भारत के कंट्री डायरेक्टर अगस्टे तानो कौमे ने कहा कि भारत के शहरों का हरित, स्मार्ट, समावेशी और टिकाऊ शहरीकरण के लिए बड़ी मात्रा में वित्त पोषण की आवश्यकता है। शहरों को सक्षम बनाने के लिए शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाना होगा। उन्हें इतना मजबूत बड़ा और क्रेडिट योग्य बनाना होगा कि वो निजी स्रोतों से अधिक उधार ले सके। इससे ही एक बढ़ती शहरी आबादी के जीवन स्तर में सुधार लाने का स्थायी तरीका खोजा जा सकता है।

  • शहरी एजेंसियों की क्षमताओं का विस्तार की सिफारिश : रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को चलाने के लिए शहरी एजेंसियों की क्षमताओं का विस्तार करने की सिफारिश की गई है। वर्तमान में 10 सबसे बड़े यूएलबी हाल के तीन वित्तीय वर्षों में अपने कुल पूंजीगत बजट का केवल दो-तिहाई खर्च करने में ही सक्षम रहे हैं। स्थानीय निकायों को लेकर किसी भी तरह के ठोस नियम कायदों का न होना और राजस्व संग्रह करने की उनकी अक्षमता के चलते ही अधिक निजी वित्त पोषण नहीं हो पा रहा है। 
  • 2011 और 2018 के बीच, निम्न और मध्यम आय वाले देशों के सकल घरेलू उत्पाद के औसत 0.3-0.6 प्रतिशत की तुलना में शहरी संपत्ति कर सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.15 प्रतिशत था। नगरपालिका सेवाओं के लिए कम सेवा शुल्क भी उनकी वित्तीय व्यवहार्यता और निजी निवेश के प्रति आकर्षण को कम करता है। मध्यम अवधि में रिपोर्ट, कराधान नीति और राजकोषीय हस्तांतरण प्रणाली सहित संरचनात्मक सुधारों की एक श्रृंखला का सुझाव देती है। इसके जरिये शहरों को अधिक निजी वित्त पोषण का लाभ उठाने की अनुमति दी जा सकेगी।
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