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संसद के शीत सत्र में महिला आरक्षण बिल ला सकती है मोदी सरकार
एजेंसी/ नई दिल्ली
Updated Fri, 22 Sep 2017 03:17 AM IST
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मोदी सरकार संसद में महिला आरक्षण बिल लाने पर विचार कर रही है। 1996 में देवेगौड़ा सरकार के समय पहली बार लाए गए इस बिल के तहत लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव है। 21 साल के दौरान इस बिल को पारित कराने की कई बार कोशिश की गई लेकिन हर बार राजनीतिक विरोध के कारण यह संभव नहीं हो पाया।
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भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि सरकार और पार्टी में इस बिल को लेकर गहन विचार-विमर्श चल रहा है। इस बिल को उसके मूल रूप में पेश किया जाएगा या फिर इसमें परिवर्तन किए जाएंगे, इसके जवाब में उक्त नेता ने कहा कि इस पर बहस चल रही है और अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। क्या इस बिल को संसद के शीत सत्र में पेश किया जाएगा, इस पर उक्त नेता ने कहा कि हो सकता है कि ऐसा ही हो, लेकिन अभी इस बारे में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
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भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अगर मोदी सरकार इस संविधान संशोधन बिल को पारित कराने में कामयाब हो जाती है तो एक नया राजनीतिक ध्रुवीकरण होगा जिसका फायदा उसे 2019 के लोकसभा चुनाव में मिलना तय है।
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स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए पहले से ही सीटें आरक्षित हैं और इसका राजनीति पर काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इसके मद्देनजर संसद और विधानसभाओं में भी उनके लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित कर देनी चाहिए।
सात साल पहले भी था मौका
यूपीए सरकार ने इस बिल को 2010 में राज्य सभा से पारित करवा लिया लेकिन घटक दलों और लालू, मुलायम और शरद यादव जैसे ओबीसी सांसदों के विरोध के कारण लोकसभा में पारित नहीं करवा पाई। 15वीं लोकसभा के भंग होने के साथ ही इस बिल का अस्तित्व भी खत्म हो गया।
ओबीसी सांसदों का विरोध
पहली बार 1996 में पेश किए गए महिला आरक्षण बिल को पिछले 21 साल में कई बार पारित कराने की कोशिश की गई लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सांसदों के विरोध के कारण यह अधर में लटका हुआ है। पार्टी लाइन से इतर एकजुट हुए इन सांसदों की दलील है कि इसका लाभ सिर्फ उच्च वर्ग की महिलाओं को मिलेगा क्योंकि वे शिक्षित हैं और संसाधनों से भरपूर हैं।