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Hindi News ›   India News ›   Winning America and the world will not be easy for Joe Biden as a President

राष्ट्रपति के रूप में बाइडन के लिए आसान नहीं होगा अमेरिका और दुनिया का दिल जीतना

Sun, 08 Nov 2020 01:12 AM IST
देव कश्यप शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Sun, 08 Nov 2020 01:12 AM IST
सार

  • डोनाल्ड ट्रंप की धारा से उलट चलना सबसे बड़ी चुनौती।
  • ट्रंपकाल में अमेरिकी राष्ट्रवाद की काट ढूंढना भी आसान नहीं।
  • अफगानिस्तान, चीन, रूस, ईरान, उत्तर कोरिया के साथ संतुलित समीकरण की चुनौती।
  • प्रोटेक्शनिज्म बनाम उदारवाद का संतुलित स्वरुप बनेगा इम्तिहान।

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Winning America and the world will not be easy for Joe Biden as a President
Joe Biden - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड जे ट्रंप चुनाव हार गए हैं। जो बाइडन सबसे शक्तिशाली देश के 46वें राष्ट्रपति चुने गए हैं और वह अगले साल 20 जनवरी को पद और गोपनीयता की शपथ लेंगे। राष्ट्रपति डोनाल्ड जे ट्रंप चुनाव भले हार गए हैं, लेकिन चार बाद दूसरे कार्यकाल का चुनाव न जीत पाने वाले ट्रंप ने पूरे अमेरिका में राष्ट्रवाद की एक बयार बहा रखी है। राष्ट्रपति पद के चुनाव से कुछ समय पहले ही अमेरिका में ब्लैक और व्हाइट के बीच में नस्लभेद की खाई भी चौड़ी हुई है, वहीं दुनिया में प्रोटेक्शनिज्म की नीति पर चल कर अमेरिका के हितों को देखने वाले ट्रंपकाल काफी कुछ बदला है। इससे पार पाना राष्ट्रपति जो बाइडन के लिए बहुत आसान नहीं है।

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जो बाइडन के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश के भीतर चुनावी नतीजों को लेकर बनने वाले हिंसा के माहौल से निजात पाने की है। हालांकि इसके लिए उन्होंने कमला हैरिस के साथ अपने गृहनगर में लोगों को संबोधित करके शुरुआत कर दी है। इस तरह की स्थिति उनके लिए आगे भी बड़ी चुनौती बनने वाली है। चुनाव में राष्ट्रपति ट्रंप अपनी हार को नहीं पचा पा रहे हैं। उन्होंने आक्रामक नीति अपनाकर अमेरिका में एक नई स्थिति भी पैदा की है। इससे पार पाना जो बाइडन के लिए बहुत आसान नहीं होगा।
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बाइडन की दूसरी चुनौती कोविड-19 संक्रमण से निपटने की होगी। ट्रंप के समय में अमेरिका को इस महामारी ने बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया है। ताजा मामलों में नए मरीजों की संख्या एक लाख के आंकड़े को पार कर रही है। राष्ट्रपति बाइडन के लिए इसका सामना करना मुश्किलों से भरा हो सकता है।

सबसे बड़ा नासूर इस्लामिक आतंकवाद
दुनिया के लिए इस्लामिक आतंकवाद बड़ा नासूर बन चुका है। अफगानिस्तान में आतंकी हिंसा की घटनाएं, पाकिस्तान में आतंकवाद का संरक्षण, फ्रांस में इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरपंथ की घटनाएं, हमला, आस्ट्रेलिया में इसका विकृत रूप यह सब बाइडन के लिए चुनौती बनने वाला है। आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन, अल कायदा का पुर्नसंगठन का प्रयास, सीरिया के एक हिस्से में आईएसआईएस की मौजूदगी। यह एक बड़ा सवाल है कि पूर्व राष्ट्रपति बुश के समय में शुरू किए गए आतंकवाद, कट्टरवाद के विरुद्ध युद्ध जो बाइडन की लीडरशिप में अमेरिका नेतृत्व करेगा?

अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध का इस्तेमाल
राष्ट्रपति पद के लिए होने वाली डिबेट में जो बाइडन के विचार पूर्व राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की नीतियों का समर्थन करने तथा डोनाल्ड ट्रंप की नीति के बिल्कुल उलट चलने वाले रहे हैं। ट्रंप ने अपने शासन काल के दौरान अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का हथियार की तरह इस्तेमाल किया। इसी के साथ राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका के ऐसे शिखर नेता रहे जिन्होंने जार्ज बुश सीनियर, जार्ज बुश जूनियर, बिल क्लिंटन, बराक ओबामा की तुलना में सैन्य आपरेशन का बहुत कम और बहुत ही सीमित इस्तेमाल (न के बराबर) किया।

अमेरिकी हितों को साधने के लिए प्रतिबंधों का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उनके इस कदम से दुनिया में अमेरिका की बनी बादशाहत को करारा झटका भी लगा है। छोटे, विकासशील देशों को उनकी इस नीति से करारा झटका लगा। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस नीति का इस्तेमाल ईरान, रूस समेत अन्य के खिलाफ प्रमुखता से किया। ग्लोबल वार्मिंग को लेकर यूरोप में पहली बैठक में ही बिल्कुल अलग निर्णय ले लिया। भारत-पाकिस्तान का मामला हो या भारत-चीन के बीच में लद्दाख का विवाद, राष्ट्रपति ट्रंप लगातार परंपरा से हटकर अपनी तरफ से मध्यस्थता का प्रस्ताव रखने से भी नहीं चूके।

ट्रंप की नीतियां बनेंगी चुनौती
चीन के साथ दक्षिण चीन सागर का मामला हो या अंतराष्ट्रीय व्यापार युद्ध, कोविड-19 संक्रमण को लेकर आरोप रहे हों या विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका को बाहर करने का निर्णय, राष्ट्रपति ट्रंप का निर्णय परंपरा से काफी हटकर रहा है। उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन से बयानबाजी, वार्ता और संबंध के मामले में ट्रंप का रवैया पूर्व राष्ट्रपतियों से काफी अलग रहा है।

ईरान के मामले में भी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा प्रतिबंध थोपना, बराक ओबामा के समय में लिए गए निर्णय को पलटना, ईरान के सैन्य कमांडर मेजर जनरल सुलेमानी पर सैन्य कार्रवाई और अमेरिका को एक बड़े मुस्लिम मिलिशिया देशों से अलग राह पर ले जाने की स्थिति से निपटना भी जो बाइडन के लिए चुनौती होगी। राष्ट्रपति ट्रंप ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का कदम आगे बढ़ा दिया है। ट्रंप के इस निर्णय के बाद वहां आतंकवाद और हिंसा का वातावरण फिर से खड़ा होने लगा है। क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए यह बड़े खतरे जैसा होगा। जो बाइडन के लिए इस मुद्दे पर निर्णय भी किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होगा।


भारत और चीन के बीच में विवाद बनेगा बड़ी चुनौती
अमेरिका, भारत का सामरिक साझीदार देश है। राष्ट्रपति ट्रंप प्रशासन ने लद्दाख में चीन के साथ सैन्य तनातनी के बीच भारत का मुश्किल घड़ी साथ देने का वादा किया है। बीका (बेसिक इक्सचेंज कोआपरेशन एग्रीमेंट) समझौता इस विश्वास को बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम है। राष्ट्रपति जो बाइडन के लिए दक्षिण एशिया में इन दोनों देशों के बीच में संतुलन बिठाना भी बड़ी चुनौती होगी। जापान, आस्ट्रेलिया, भारत के साथ फोरम को सशक्त बनाना, दक्षिण चीन सागर में अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर स्वतंत्र और भयरहित नौवहन तथा वायुमार्ग का प्रवेश सुनिश्चित कराना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मामले में काफी आक्रमकता अपनाए रखी है।


विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विश्व में तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अमेरिका द्वारा निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों अपने देश को सीमित कर लिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका बाहर हो गया था। संयुक्त राष्ट्र के कई फोरम और संस्थाओं से भी अपनी भूमिका को सीमित कर लिया था। देखना होगा कि नये चुने गए राष्ट्रपति जो बाइडन इन मामलों में किस तरह से निर्णय करते हैं। अमेरिका को क्या दिशा देते हैं और कैसे अपने देश की अंतरराष्ट्रीय स्तर धाक कायम कर पाते हैं।

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