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तेज होगी विपक्षी एकता की कोशिशें, कांग्रेस को बनना होगा जूनियर पार्टनर
शरद गुप्ता, नई दिल्ली
Updated Sat, 19 May 2018 08:23 PM IST
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महाअधिवेशन का आखिरी दिन: कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह
- फोटो : ANI
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कर्नाटक में कांग्रेस को जदएस के साथ मिलकर सरकार बनाने का अवसर मिलने से विपक्षी एकता की कोशिशों में तेजी आने की संभावना है। कर्नाटक के घटनाक्रम से उन्हें स्पष्ट हो गया है बीजेपी के सामने अगर वे एकजुट होकर चुनाव लड़ें तो ही वे सत्ता में आ पाएंगे। साथ ही एनडीए के कुछ घटक भी इस तीसरे मोर्चे में शामिल हो सकते हैं।
लेकिन इससे कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने की अभिलाषा को भी तगड़ा झटका लगा है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने कर्नाटक चुनाव के दौरान खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताया था। उनका कहना था कि यदि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरेगी तो वे ही प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन जिस तरह कांग्रेस ने जद एस जैसे छोटे क्षेत्रीय दल के आधिपत्य को स्वीकार किया है, उससे जाहिर है कि कांग्रेस को 2019 के चुनाव में क्षेत्रीय दलों के पिछलग्गू की भूमिका ही निभानी होगी। शनिवार को इसीलिए राहुल के स्वर बदले हुए थे। उन्होंने क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर भाजपा को हराने का दावा किया।
नतीजे बताते हैं कि यदि कांग्रेस और जद एस ने चुनाव पूर्व गठबंधन किया होता तो वे कर्नाटक की 224 में से 157 सीटें जीत सकते थे। यानी भाजपा को महज 65 सीटों पर सिमटना पड़ता। इन्हीं नतीजों को अगर लोकसभा के स्तर पर देखा जाए तो भाजपा कर्नाटक की 28 में से केवल 10 सीटें ही जीत पाएगी। यानी कांग्रेस-जद एस यदि अगला चुनाव साथ मिलकर लड़ें तो वे राज्य की 18 सीटें जीतेंगे।
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बसपा अध्यक्ष मायावती ने कांग्रेस के जद एस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने की सलाह दी थी। लेकिन तब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को अपनी सरकार के प्रदर्शन, कन्नड़ और लिंगायत कार्ड के बदौलत जीतने का पूरा भरोसा था। कर्नाटक के नतीजों ने कांग्रेस का अभिमान तोड़ किया है।
मणिपुर, गोवा और मेघालय में कांग्रेस केवल अपने घमंड के चलते सरकार बना पाने में असफल रही। क्षेत्रीय दलों के कांग्रेस का साथ देने से भाजपा का दामन थामना बेहतर लगा।
भाजपा का देशव्यापी प्रसार
भाजपा के तेजी से होते विस्तार ने विपक्षी दलों में भय का संचार कर दिया है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने सहयोगियों के साथ 80 में से 73 लोकसभा और 403 विधानसभा में से 325 सीटें जीत कर अपनी दबदबा दिखा दिया। बिहार में जद (यू) और राजद गठबंधन टूटने पर वहां भी अपनी सरकार बना ली। पश्चिम बंगाल में वाम दलों के 37 साल के दबदबे और कांग्रेस को पीछे छोड़ती हुई वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।
उड़ीसा में भी कांग्रेस अब तीसरे नंबर पर है और पिछले बीस सालों से सत्ता पर काबिज बीजू जनता दल को बीजेपी से चुनौती मिल रही है। कर्नाटक में वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। अब उसकी निगाहें तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सरकार बनाने पर है। पूर्वोत्तर के सात में छह राज्यों में अब बीजेपी और सहयोगियों की सरकार है।
कांग्रेस होगी जूनियर पार्टनर
ऐसे में विपक्षी दलों के पास एक साथ मिल कर चुनाव लड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा ने साथ लड़ने का निश्चय किया है। अन्य राज्यों में भी भाजपा के खिलाफ साझा उम्मीदवार उतारने की कोशिश हो रही है। लेकिन इन कोशिशों में एक बात तय है कि कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों के साथ साझेदारी में जूनियर पार्टनर की भूमिका निभानी होगी।
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लेकिन इससे कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने की अभिलाषा को भी तगड़ा झटका लगा है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने कर्नाटक चुनाव के दौरान खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताया था। उनका कहना था कि यदि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरेगी तो वे ही प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन जिस तरह कांग्रेस ने जद एस जैसे छोटे क्षेत्रीय दल के आधिपत्य को स्वीकार किया है, उससे जाहिर है कि कांग्रेस को 2019 के चुनाव में क्षेत्रीय दलों के पिछलग्गू की भूमिका ही निभानी होगी। शनिवार को इसीलिए राहुल के स्वर बदले हुए थे। उन्होंने क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर भाजपा को हराने का दावा किया।
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नतीजे बताते हैं कि यदि कांग्रेस और जद एस ने चुनाव पूर्व गठबंधन किया होता तो वे कर्नाटक की 224 में से 157 सीटें जीत सकते थे। यानी भाजपा को महज 65 सीटों पर सिमटना पड़ता। इन्हीं नतीजों को अगर लोकसभा के स्तर पर देखा जाए तो भाजपा कर्नाटक की 28 में से केवल 10 सीटें ही जीत पाएगी। यानी कांग्रेस-जद एस यदि अगला चुनाव साथ मिलकर लड़ें तो वे राज्य की 18 सीटें जीतेंगे।
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बसपा अध्यक्ष मायावती ने कांग्रेस के जद एस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने की सलाह दी थी। लेकिन तब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को अपनी सरकार के प्रदर्शन, कन्नड़ और लिंगायत कार्ड के बदौलत जीतने का पूरा भरोसा था। कर्नाटक के नतीजों ने कांग्रेस का अभिमान तोड़ किया है।
मणिपुर, गोवा और मेघालय में कांग्रेस केवल अपने घमंड के चलते सरकार बना पाने में असफल रही। क्षेत्रीय दलों के कांग्रेस का साथ देने से भाजपा का दामन थामना बेहतर लगा।
भाजपा का देशव्यापी प्रसार
भाजपा के तेजी से होते विस्तार ने विपक्षी दलों में भय का संचार कर दिया है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने सहयोगियों के साथ 80 में से 73 लोकसभा और 403 विधानसभा में से 325 सीटें जीत कर अपनी दबदबा दिखा दिया। बिहार में जद (यू) और राजद गठबंधन टूटने पर वहां भी अपनी सरकार बना ली। पश्चिम बंगाल में वाम दलों के 37 साल के दबदबे और कांग्रेस को पीछे छोड़ती हुई वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।
उड़ीसा में भी कांग्रेस अब तीसरे नंबर पर है और पिछले बीस सालों से सत्ता पर काबिज बीजू जनता दल को बीजेपी से चुनौती मिल रही है। कर्नाटक में वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। अब उसकी निगाहें तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सरकार बनाने पर है। पूर्वोत्तर के सात में छह राज्यों में अब बीजेपी और सहयोगियों की सरकार है।
कांग्रेस होगी जूनियर पार्टनर
ऐसे में विपक्षी दलों के पास एक साथ मिल कर चुनाव लड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा ने साथ लड़ने का निश्चय किया है। अन्य राज्यों में भी भाजपा के खिलाफ साझा उम्मीदवार उतारने की कोशिश हो रही है। लेकिन इन कोशिशों में एक बात तय है कि कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों के साथ साझेदारी में जूनियर पार्टनर की भूमिका निभानी होगी।