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Luna 25 vs Chandrayaan 3: 23 अगस्त को ही चांद पर क्यों उतर रहा चंद्रयान-3, लूना-25 के चूकने की वजह क्या?
Mon, 21 Aug 2023 05:15 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Mon, 21 Aug 2023 05:15 PM IST
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चंद्रयान-3
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
रूस के चंद्र मिशन को बड़ा झटका लगा है। चांद पर रूस की पहुंचने की उम्मीदें खत्म हो गई हैं, क्योंकि उसका अंतरिक्ष यान लूना-25 लैंडिंग से ऐन पहले क्रैश हो गया। रूस की अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस ने रविवार को इस बात की आधिकारिक पुष्टि की। उधर भारत का चंद्रयान-3 मिशन का लैंडर मॉड्यूल चांद की सतह से महज 25 से 150 किलोमीटर की दूरी पर चक्कर लगा रहा है। अब 23 अगस्त का इंतजार है, जब चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के साथ ही भारत इतिहास रच देगा।इस बीच, सवाल उठने लगे हैं कि आखिर रूस का लूना-25 क्रैश क्यों हुआ? मिशन के साथ आखिरी क्षणों में क्या हुआ? चांद पर अंतरिक्ष यान उतारने के अधिकतर प्रयास असफल क्यों होते हैं? रूस के लिए अब आगे क्या? तो भारत के चंद्रयान-3 की स्थिति क्या है? चंद्रयान-3 को अपना सफर पूरा करने में इतना समय क्यों लग रहा? 23 अगस्त को ही चंद्रयान-3 क्यों उतर रहा?
लूना 25
- फोटो :
सोशल मीडिया
पहले जानते हैं कि लूना-25 क्रैश क्यों हुआ?
रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रासकास्माज ने 10 अगस्त को लूना- 25 अंतरिक्ष यान लांच किया था। इसे मास्को से लगभग 3,450 मील (5,550 किमी) पूर्व में स्थित वोस्तोचनी कोस्मोड्रोम से लॉन्च किया गया था। लूना- 25 को 313 टन वजनी रॉकेट सोयुज 2.1 बी में भेजा गया था। मिशन को नाम लूना- ग्लोब दिया गया था।
उम्मीद जताई जा रही थी कि 21 अगस्त को यह चांद की सतह पर पहुंच जाएगा। रूस इससे पहले 1976 में चांद पर लूना-24 उतार चुका है। विश्व में अबतक जितने भी चांद मिशन हुए हैं, वे चांद के भूमध्य रेखा पर पहुंचे हैं। लूना-25 सफल होता तो ऐसा पहली बार होता कि कोई मिशन चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड किया। हालांकि, यह सब कुछ हो पता इससे पहले ही मिशन चांद की सतह से टकराकर क्रैश हो गया।
इसके वजहों पर बात करें तो लूना-25 से शनिवार को संपर्क साधने में परेशानी हुई थी। इसके बाद उससे संपर्क करने की कई बार कोशिश की गईं, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका। रासकास्माज के मुताबिक, शुरुआती जांच में पता चला है कि लूना-25 असली पैरामीटर्स से अलग चला गया था। इसके साथ ही वह तय कक्षा की जगह दूसरी कक्षा में चला गया जहां पर उसे नहीं जाना चाहिए था। इसके कारण वह सीधे चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास जाकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
लूना-25 नियंत्रण से बाहर होकर ऐसी समस्या में फंस गया था जिसके कारण का पता नहीं चल सका। 47 साल में लूना-25 रूस का पहला चंद्र मिशन था। इसको चंद्रमा के सबसे कठिन दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग के लिए भेजा गया था। संपर्क टूटने की वजह से यह मानवरहित अंतरिक्ष यान लैंडिंग में सफल नहीं हो पाया।
रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रासकास्माज ने 10 अगस्त को लूना- 25 अंतरिक्ष यान लांच किया था। इसे मास्को से लगभग 3,450 मील (5,550 किमी) पूर्व में स्थित वोस्तोचनी कोस्मोड्रोम से लॉन्च किया गया था। लूना- 25 को 313 टन वजनी रॉकेट सोयुज 2.1 बी में भेजा गया था। मिशन को नाम लूना- ग्लोब दिया गया था।
उम्मीद जताई जा रही थी कि 21 अगस्त को यह चांद की सतह पर पहुंच जाएगा। रूस इससे पहले 1976 में चांद पर लूना-24 उतार चुका है। विश्व में अबतक जितने भी चांद मिशन हुए हैं, वे चांद के भूमध्य रेखा पर पहुंचे हैं। लूना-25 सफल होता तो ऐसा पहली बार होता कि कोई मिशन चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड किया। हालांकि, यह सब कुछ हो पता इससे पहले ही मिशन चांद की सतह से टकराकर क्रैश हो गया।
इसके वजहों पर बात करें तो लूना-25 से शनिवार को संपर्क साधने में परेशानी हुई थी। इसके बाद उससे संपर्क करने की कई बार कोशिश की गईं, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका। रासकास्माज के मुताबिक, शुरुआती जांच में पता चला है कि लूना-25 असली पैरामीटर्स से अलग चला गया था। इसके साथ ही वह तय कक्षा की जगह दूसरी कक्षा में चला गया जहां पर उसे नहीं जाना चाहिए था। इसके कारण वह सीधे चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास जाकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
लूना-25 नियंत्रण से बाहर होकर ऐसी समस्या में फंस गया था जिसके कारण का पता नहीं चल सका। 47 साल में लूना-25 रूस का पहला चंद्र मिशन था। इसको चंद्रमा के सबसे कठिन दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग के लिए भेजा गया था। संपर्क टूटने की वजह से यह मानवरहित अंतरिक्ष यान लैंडिंग में सफल नहीं हो पाया।
लूना 25
- फोटो :
सोशल मीडिया
मिशन के साथ आखिरी क्षणों में क्या हुआ?
साल 1976 के बाद लाॅन्च होने वाला यह मिशन रूस के लिए बेहद अहम था। सोवियत संघ के पतन के बाद रूस ने पहला चंद्र मिशन लॉन्च किया था। फ्रांसीसी अंतरिक्ष विज्ञानी फ्रैंक मार्चिस के मुताबिक, एक सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी की वजह से लूना-25 क्रैश हो गया। इस गड़बड़ी से लूना-ग्लोब लैंडर तबाह हो गया।
मार्चिस कहते हैं, 'निर्णायक कक्षा समायोजन के समय अप्रत्याशित लंबे इंजन के ओवरफायर की वजह से यह चंद्रमा पर क्रैश हो गया। तकनीकी खामी के बाद करीब 10 घंटे तक लूना-25 से संपर्क नहीं साधा जा सका।'
साल 1976 के बाद लाॅन्च होने वाला यह मिशन रूस के लिए बेहद अहम था। सोवियत संघ के पतन के बाद रूस ने पहला चंद्र मिशन लॉन्च किया था। फ्रांसीसी अंतरिक्ष विज्ञानी फ्रैंक मार्चिस के मुताबिक, एक सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी की वजह से लूना-25 क्रैश हो गया। इस गड़बड़ी से लूना-ग्लोब लैंडर तबाह हो गया।
मार्चिस कहते हैं, 'निर्णायक कक्षा समायोजन के समय अप्रत्याशित लंबे इंजन के ओवरफायर की वजह से यह चंद्रमा पर क्रैश हो गया। तकनीकी खामी के बाद करीब 10 घंटे तक लूना-25 से संपर्क नहीं साधा जा सका।'
moon
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istock
चांद पर अंतरिक्ष यान उतारने के अधिकतर प्रयास असफल क्यों होते हैं?
विज्ञान की भाषा में अक्सर कहा जाता है कि कोई भी प्रयोग असफल नहीं माना जाता बल्कि हम इससे कुछ न कुछ सीखते हैं। पिछले चार वर्षों में, चार देशों भारत, इस्राइल, जापान और अब रूस की सरकारी और निजी अंतरिक्ष एजेंसियों ने चंद्रमा पर अपने अंतरिक्ष यान उतारने की कोशिश की है, लेकिन ये अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सके। चारों मिशन को अंतिम चरण यानी लैंडिंग प्रक्रिया के दौरान समस्याओं का सामना करना पड़ा और चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गए।
विज्ञान के लिए आश्चर्य ही है कि पिछले 10 वर्षों में तीन चीनी मिशनों को छोड़कर चंद्रमा पर सभी सफल लैंडिंग 1966 और 1976 के बीच एक दशक के भीतर हुईं। अब जब तकनीक इतना आगे बढ़ चुकी है उसके बावजूद मिशन अपना सफर पूरा करने में चूक रहे हैं।
2019 में चंद्रयान-2 मिशन से पहले, इसरो के तत्कालीन अध्यक्ष के सिवन ने लैंडिंग के अंतिम चरण को 'आतंक के 15 मिनट' कहा था। यह बयान चंद्र कक्षा से चंद्रमा की सतह तक उतरने में शामिल कठिनाइयों को दर्शाता है। यही कारण है कि यह चंद्र मिशन का सबसे कठिन हिस्सा माना जाता है।
लूना-25 से पहले तीन के मिशन इसरो का चंद्रयान-2, इस्रायल से बेरेशीट और जापान से हकुतो-आर विभिन्न प्रकार की खराबी के चलते लैंडिग में सफल नहीं हुए थे। चीन इसमें एकमात्र अपवाद रहा है, जिसने 2013 में अपने पहले ही प्रयास में चांग'ई-3 के साथ लैंडिंग की थी। इसने 2019 में चांग'ई-4 और 2020 में चांग'ई-5 के साथ इस उपलब्धि को दोहराया था।
विज्ञान की भाषा में अक्सर कहा जाता है कि कोई भी प्रयोग असफल नहीं माना जाता बल्कि हम इससे कुछ न कुछ सीखते हैं। पिछले चार वर्षों में, चार देशों भारत, इस्राइल, जापान और अब रूस की सरकारी और निजी अंतरिक्ष एजेंसियों ने चंद्रमा पर अपने अंतरिक्ष यान उतारने की कोशिश की है, लेकिन ये अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सके। चारों मिशन को अंतिम चरण यानी लैंडिंग प्रक्रिया के दौरान समस्याओं का सामना करना पड़ा और चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गए।
विज्ञान के लिए आश्चर्य ही है कि पिछले 10 वर्षों में तीन चीनी मिशनों को छोड़कर चंद्रमा पर सभी सफल लैंडिंग 1966 और 1976 के बीच एक दशक के भीतर हुईं। अब जब तकनीक इतना आगे बढ़ चुकी है उसके बावजूद मिशन अपना सफर पूरा करने में चूक रहे हैं।
2019 में चंद्रयान-2 मिशन से पहले, इसरो के तत्कालीन अध्यक्ष के सिवन ने लैंडिंग के अंतिम चरण को 'आतंक के 15 मिनट' कहा था। यह बयान चंद्र कक्षा से चंद्रमा की सतह तक उतरने में शामिल कठिनाइयों को दर्शाता है। यही कारण है कि यह चंद्र मिशन का सबसे कठिन हिस्सा माना जाता है।
लूना-25 से पहले तीन के मिशन इसरो का चंद्रयान-2, इस्रायल से बेरेशीट और जापान से हकुतो-आर विभिन्न प्रकार की खराबी के चलते लैंडिग में सफल नहीं हुए थे। चीन इसमें एकमात्र अपवाद रहा है, जिसने 2013 में अपने पहले ही प्रयास में चांग'ई-3 के साथ लैंडिंग की थी। इसने 2019 में चांग'ई-4 और 2020 में चांग'ई-5 के साथ इस उपलब्धि को दोहराया था।
lunar roving vehicle first used on moon
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NASA
...तो पहले कैसे उतरे थे चंद्र मिशन?
1963 और 1976 के बीच उतरने के 42 प्रयासों में से 21 सफल हुए। उस समय चंद्रमा पर जाने की वजहें बहुत अलग थीं। यह मुख्य रूप से शीत युद्ध की प्रतिद्वंद्विता के बीच हो रहा था, जो अमेरिका और तत्कालीन यूएसएसआर को इन चंद्रमा मिशनों को भेजने के लिए प्रेरित कर रहीं थीं। बेहद महंगे और ऊर्जा अकुशल होने के बावजूद कई मिशन सफल रहे।
चंद्रयान-1 के निदेशक रहे एम. अन्नादुरई कहते हैं, 'उन चंद्रमा मिशनों को भेजने में जिस तरह के जोखिम उठाए गए, वे अब पूरी तरह से अस्वीकार्य होंगे। अब उन मिशनों पर होने वाले खर्च को भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही, चंद्रमा मिशन के मौजूदा दौर के लिए इस्तेमाल की जा रही प्रौद्योगिकियां बहुत अलग हैं। वे अधिक सुरक्षित, सस्ते और अधिक ईंधन कुशल हैं। लेकिन इसका मतलब यह भी है कि इनकी तुलना 1960 और 1970 के दशक में इस्तेमाल किए गए उपकरणों से नहीं की जा सकती और इनका परीक्षण अभी ही किया जा रहा है।
1963 और 1976 के बीच उतरने के 42 प्रयासों में से 21 सफल हुए। उस समय चंद्रमा पर जाने की वजहें बहुत अलग थीं। यह मुख्य रूप से शीत युद्ध की प्रतिद्वंद्विता के बीच हो रहा था, जो अमेरिका और तत्कालीन यूएसएसआर को इन चंद्रमा मिशनों को भेजने के लिए प्रेरित कर रहीं थीं। बेहद महंगे और ऊर्जा अकुशल होने के बावजूद कई मिशन सफल रहे।
चंद्रयान-1 के निदेशक रहे एम. अन्नादुरई कहते हैं, 'उन चंद्रमा मिशनों को भेजने में जिस तरह के जोखिम उठाए गए, वे अब पूरी तरह से अस्वीकार्य होंगे। अब उन मिशनों पर होने वाले खर्च को भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही, चंद्रमा मिशन के मौजूदा दौर के लिए इस्तेमाल की जा रही प्रौद्योगिकियां बहुत अलग हैं। वे अधिक सुरक्षित, सस्ते और अधिक ईंधन कुशल हैं। लेकिन इसका मतलब यह भी है कि इनकी तुलना 1960 और 1970 के दशक में इस्तेमाल किए गए उपकरणों से नहीं की जा सकती और इनका परीक्षण अभी ही किया जा रहा है।
लूना-25
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SOCIAL MEDIA
अब लूना मिशन का भविष्य क्या है?
रूस ने लूना-25 नाम लूना श्रृंखला की निरंतरता को दर्शाने के लिए रखा था। इसका इस्तेमाल 50 साल पहले तत्कालीन सोवियत संघ चंद्रमा तक पहुंचने के लिए करता था। 1976 में लॉन्च किया गया लूना-24, चंद्रमा की सतह पर उतरने वाला रूस का आखिरी अंतरिक्ष यान था। इससे पहले चंद्र मिशन रुके हुए थे और लगभग दो दशकों तक निलंबित रहे थे।
रूस पहले ही घोषणा कर चुका है कि लूना-25 के बाद और भी चंद्र मिशन होंगे। इस दशक में लूना श्रृंखला में कम से कम तीन और की योजना बनाई गईं हैं।
रूस ने लूना-25 नाम लूना श्रृंखला की निरंतरता को दर्शाने के लिए रखा था। इसका इस्तेमाल 50 साल पहले तत्कालीन सोवियत संघ चंद्रमा तक पहुंचने के लिए करता था। 1976 में लॉन्च किया गया लूना-24, चंद्रमा की सतह पर उतरने वाला रूस का आखिरी अंतरिक्ष यान था। इससे पहले चंद्र मिशन रुके हुए थे और लगभग दो दशकों तक निलंबित रहे थे।
रूस पहले ही घोषणा कर चुका है कि लूना-25 के बाद और भी चंद्र मिशन होंगे। इस दशक में लूना श्रृंखला में कम से कम तीन और की योजना बनाई गईं हैं।
भारत के चंद्रयान-3 की स्थिति क्या है?
चंद्रयान-3 मिशन का लैंडर मॉड्यूल चांद की सतह से महज 25 से 150 किलोमीटर की दूरी पर चक्कर लगा रहा है। इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-3 का दूसरा और अंतिम डीबूस्टिंग प्रक्रिया सफलतापूर्वक हो चुकी है और अब 23 अगस्त का इंतजार है, जब चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के साथ ही भारत इतिहास रच देगा और ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। अभी तक अमेरिका, रूस और चीन ने ही चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने में सफलता हासिल की है। इतना ही नहीं चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग कराने वाला भारत पहला देश हो सकता है।
चंद्रयान-3 मिशन का लैंडर मॉड्यूल चांद की सतह से महज 25 से 150 किलोमीटर की दूरी पर चक्कर लगा रहा है। इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-3 का दूसरा और अंतिम डीबूस्टिंग प्रक्रिया सफलतापूर्वक हो चुकी है और अब 23 अगस्त का इंतजार है, जब चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के साथ ही भारत इतिहास रच देगा और ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। अभी तक अमेरिका, रूस और चीन ने ही चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने में सफलता हासिल की है। इतना ही नहीं चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग कराने वाला भारत पहला देश हो सकता है।
चंद्रयान-3
- फोटो :
अमर उजाला
चंद्रयान-3 को अपना सफर पूरा करने में इतना समय क्यों लग रहा?
लूना-25 एक शक्तिशाली रॉकेट पर सवार होकर 10 अगस्त को प्रक्षेपण के बाद केवल छह दिनों में चंद्रमा की कक्षा में पहुंच गया था। चंद्रयान-3 को 14 जुलाई को लॉन्च होने के बाद 23 दिन लग गए। दरअसल, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने के लिए बूस्टर या कहें शक्तिशाली रॉकेट यान के साथ उड़ते हैं।
अगर आप सीधे चांद पर जाना चाहते हैं, तो आपको बड़े और शक्तिशाली रॉकेट की जरूरत होगी। इसमें ईंधन की भी अधिक आवश्यकता होती है, जिसका सीधा असर प्रोजेक्ट के बजट पर पड़ता है। यानी अगर हम चंद्रमा की दूरी सीधे पृथ्वी से तय करेंगे तो हमें ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। नासा भी ऐसा ही करता है लेकिन इसरो का चंद्र मिशन सस्ता है क्योंकि उसने चंद्रयान को सीधे चंद्रमा पर नहीं भेजा है। फिलहाल, चंद्रयान-3 मिशन चंद्रमा की कक्षा में हैं और लैंडिंग की उल्टी गिनती शुरू होने को है।
लूना-25 एक शक्तिशाली रॉकेट पर सवार होकर 10 अगस्त को प्रक्षेपण के बाद केवल छह दिनों में चंद्रमा की कक्षा में पहुंच गया था। चंद्रयान-3 को 14 जुलाई को लॉन्च होने के बाद 23 दिन लग गए। दरअसल, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने के लिए बूस्टर या कहें शक्तिशाली रॉकेट यान के साथ उड़ते हैं।
अगर आप सीधे चांद पर जाना चाहते हैं, तो आपको बड़े और शक्तिशाली रॉकेट की जरूरत होगी। इसमें ईंधन की भी अधिक आवश्यकता होती है, जिसका सीधा असर प्रोजेक्ट के बजट पर पड़ता है। यानी अगर हम चंद्रमा की दूरी सीधे पृथ्वी से तय करेंगे तो हमें ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। नासा भी ऐसा ही करता है लेकिन इसरो का चंद्र मिशन सस्ता है क्योंकि उसने चंद्रयान को सीधे चंद्रमा पर नहीं भेजा है। फिलहाल, चंद्रयान-3 मिशन चंद्रमा की कक्षा में हैं और लैंडिंग की उल्टी गिनती शुरू होने को है।
चंद्रयान 3
- फोटो :
Isro
...तो 23 अगस्त को ही चंद्रयान-3 क्यों उतर रहा?
दरअसल, 23 अगस्त वह तारीख है जिस दिन चंद्रमा पर दिन की शुरुआत होती है। एक चंद्र दिवस पृथ्वी पर लगभग 14 दिनों के बराबर होता है, जब सूर्य का प्रकाश लगातार उपलब्ध रहता है। चंद्रयान-3 के उपकरणों का जीवन केवल एक चंद्र दिवस का ही होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरण होते हैं और उन्हें चालू रहने के लिए सूर्य की रोशनी की जरूरत होती है।
रात के समय चंद्रमा अत्यधिक ठंडा हो जाता है। यह तापमान शून्य से 100 डिग्री सेल्सियस नीचे तक पहुंच जाता है। ऐसे कम तापमान पर उपकरण जम सकते हैं और ये काम करना भी बंद कर सकते हैं। अवलोकनों और प्रयोगों के लिए अधिकतम समय मिले इस लिहाज से चंद्रयान-3 का चंद्र दिवस की शुरुआत में उतरना जरूरी है। सीधे शब्दों में कहें तो चंद्रयान-3 23 अगस्त से पहले उतर नहीं सकता और 24 अगस्त के बाद उतरना भी नहीं चाहेगा।
इस बीच, इसरो ने रविवार को कहा कि उसने चंद्रयान-3 मिशन के ‘लैंडर मॉड्यूल’ (एलएम) को कक्षा में थोड़ा और नीचे सफलतापूर्वक पहुंचा दिया और इसके अब बुधवार को शाम छह बजकर चार मिनट पर चंद्रमा की सतह पर उतरने की उम्मीद है।
दरअसल, 23 अगस्त वह तारीख है जिस दिन चंद्रमा पर दिन की शुरुआत होती है। एक चंद्र दिवस पृथ्वी पर लगभग 14 दिनों के बराबर होता है, जब सूर्य का प्रकाश लगातार उपलब्ध रहता है। चंद्रयान-3 के उपकरणों का जीवन केवल एक चंद्र दिवस का ही होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरण होते हैं और उन्हें चालू रहने के लिए सूर्य की रोशनी की जरूरत होती है।
रात के समय चंद्रमा अत्यधिक ठंडा हो जाता है। यह तापमान शून्य से 100 डिग्री सेल्सियस नीचे तक पहुंच जाता है। ऐसे कम तापमान पर उपकरण जम सकते हैं और ये काम करना भी बंद कर सकते हैं। अवलोकनों और प्रयोगों के लिए अधिकतम समय मिले इस लिहाज से चंद्रयान-3 का चंद्र दिवस की शुरुआत में उतरना जरूरी है। सीधे शब्दों में कहें तो चंद्रयान-3 23 अगस्त से पहले उतर नहीं सकता और 24 अगस्त के बाद उतरना भी नहीं चाहेगा।
इस बीच, इसरो ने रविवार को कहा कि उसने चंद्रयान-3 मिशन के ‘लैंडर मॉड्यूल’ (एलएम) को कक्षा में थोड़ा और नीचे सफलतापूर्वक पहुंचा दिया और इसके अब बुधवार को शाम छह बजकर चार मिनट पर चंद्रमा की सतह पर उतरने की उम्मीद है।