ओआरओपी के बाद भी क्यों असंतुष्ट हैं पूर्व सैनिक
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मोदी सरकार ने 6 सितंबर 2015 को लगभग 40 साल बाद वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) योजना लागू कर दी थी लेकिन पूर्व सैनिकों का मानना है कि इससे उनकी मांग पूरी नहीं हुई। इस योजना के तहत किसी भी वक्त सेवानिवृत्त हुए सैन्यकर्मियों को समान पेंशन मिलेगी, यदि वे उसी रैंक में और समान अवधि तक सेवाएं देते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कहा था कि ओआरओपी के तहत लगभग 5,500 करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं। मेजर जनरल सतबीर सिंह (सेवानिवृत्त) का कहना है कि यह योजना पेंशन में एकमुश्त इजाफा है न कि ओआरओपी। यह विसंगति यदि दूर नहीं की गई तो वरिष्ठ सैन्यकर्मियों को अपने जूनियर सैन्यकर्मियों के मुकाबले कम पेंशन मिलने लगेगी। संवैधानिक रूप से यह व्यवस्था अस्वीकार्य और अन्यायपूर्ण है।
क्या है विवाद की जड़
यह योजना आधारभूत वर्ष 2013 के साथ 1 जुलाई 2014 से प्रभावी है। ओआरओपी के लाभार्थी 30 लाख सैन्यकर्मी चाहते हैं कि इसे 1 अप्रैल 2014 से लागू किया जाए और 2015 को इसका आधार वर्ष माना जाए।
योजना का एरियर चार छमाही किश्तों में भुगतान किया जा रहा है जबकि सभी सैनिक की विधवाओं और युद्ध के दौरान मारे गए सैनिकों की विधवाओं को यह रकम एकमुश्त दी जा रही है। पहली किश्त दी जा चुकी है।
सरकार ने इस योजना की हर पांच साल में समीक्षा का प्रस्ताव रखा है जबकि सैनिक हर वर्ष इसकी समीक्षा चाहते हैं। इस योजना का सबसे बड़ा विवाद यह है कि कोई सीनियर अधिकारी अपने जूनियर अधिकारी के मुकाबले कम पेंशन पाना नहीं चाहेगा।
सरकार यह भी कहती है कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले सैनिकों को ओआरओपी का लाभ नहीं मिलेगा। यह कहकर सरकार ने सैनिकों की दुखती रग को छेड़ दिया है क्योंकि 40 प्रतिशत सैनिक जल्दी सेवानिवृत्त हो जाते हैं। सरकार यह भी कहती है कि इसका लाभ योजना लागू होने से पहले सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों को ही मिलेगा।
ओआरओपी की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए एकसदस्यीय न्यायिक समिति बनाई गई है। समिति ने अपनी रिपोर्ट भी सरकार को सौंप दी है लेकिन सरकार इसे सार्वजनिक नहीं कर रही है।