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लालू से 6 घंटे तक उलझने वाले सीबीआई के राकेश अस्थाना कैसे बने संदिग्ध
बीबीसी हिंदी
Updated Tue, 23 Oct 2018 01:24 PM IST
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राकेश अस्थाना
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केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच जारी जंग सार्वजनिक होने के बाद इस मुद्दे ने राजनीतिक मोड़ ले लिया है।
सीबीआई ने जांच एजेंसी में नंबर दो की हैसियत वाले अधिकारी राकेश अस्थाना के खिलाफ रिश्वत लेने के मामले में एफआईआर दर्ज की है। इसके बाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरते हुए राकेश अस्थाना को उनका चहेता अधिकारी करार दिया है।
राहुल गांधी ने ट्वीट करते हुए कहा है, "प्रधानमंत्री मोदी के चहेते अधिकारी और गुजरात कैडर के आईपीएस अफसर जिन्होंने गोधरा मामले की जांच भी की थी, राकेश अस्थाना को रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया है।" इसके बाद दोनों अधिकारियों को प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से समन मिलने की खबरें सामने आ रही हैं।
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कौन हैं राकेश अस्थाना
1984 बैच के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना झारखंड के रांची शहर से आते हैं।
जेएनयू से पढ़ाई करने वाले अस्थाना को नरेंद्र मोदी और अमित शाह के करीबी अधिकारियों में से एक माना जाता है। जब केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो गुजरात काडर के राकेश अस्थाना को 20 अन्य आला अफसरों के साथ गुजरात से दिल्ली बुलाया गया। इन अधिकारियों की सूची में सबसे ऊपर हैं हंसमुख अधिया। वो वित्त मंत्रालय में सचिव हैं।
वहीं रीता टोटिया भी गुजरात में अधिकारी रही हैं और अब वो वाणिज्य सचिव हैं। वहीं तपन राय कॉरपोरेट मामलों के सचिव हैं। राकेश अस्थाना ने अपने अब तक के करियर में उन अहम मामलों की जांच की है जो कि वर्तमान राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से खास माने जाते हैं।
इन मामलों में गोधरा कांड की जांच, चारा घोटाला, अहमदाबाद बम धमाका और आसाराम बापू के खिलाफ जांच शामिल है। लेकिन राकेश अस्थाना को लालू प्रसाद यादव से लगातार छह घंटे तक पूछताछ करने के बाद ही ख्याति मिली थी।
अस्थाना के ही नेतृत्व में गोधरा कांड की जांच हुई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनाई गई आर के राघवन के नेतृत्व वाली जांच समिति ने अस्थाना की रिपोर्ट को सही माना था। गुजरात काडर से आने की वजह से वह गुजरात के प्रमुख शहरों जैसे अहमदाबाद, सूरत और वडोदरा में उच्च पदों पर तैनात रह चुके हैं।
खास बात ये है कि अस्थाना उस दौर में गुजरात के प्रमुख पदों पर रहे हैं जब वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह हुआ करते थे। इसके बाद वर्तमान केंद्र सरकार ने अस्थाना को सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर के रूप में नियुक्त किया।
केंद्र सरकार ने इससे पहले सीबीआई में वरिष्ठता के क्रम में नंबर दो पर तैनात अधिकारी आरके दत्ता को पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा का कार्यकाल पूरा होने से ठीक दो दिन पहले गृह मंत्रालय भेज दिया।
अगर आरके दत्ता को गृह मंत्रालय नहीं भेजा जाता तो वह स्वाभाविक रूप से सीबीआई के निदेशक बन जाते। लेकिन सरकार के इस फैसले के बाद सीबीआई लगभग एक महीने तक बिना किसी निदेशक के काम करती रही।
खबरों के मुताबिक, अस्थाना इस समय विजय माल्या और लालू यादव परिवार के खिलाफ मामलों की जांच कर रहे हैं। अस्थाना को सीबीआई का स्पेशल डायरेक्टर बनाए जाने को 2017 में अदालत में एक याचिका डालकर चुनौती दी गई थी।
याचिका में कहा गया था कि सीबीआई निदेशक की इच्छा के विरुद्ध जाकर सरकार और चुनाव समिति ने अस्थाना की सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर पद पर नियुक्ति की।
याचिका में कहा गया कि स्पेशल डायरेक्टर सीबीआई में निदेशक के बाद दूसरे नंबर का अधिकारी होता है जो सीबीआई के जांच के दायरे में आनेवाले सभी मामलों पर नजर रखता है और अस्थाना की इस पद पर नियुक्ति सवाल उठाती है।
एक एनजीओ की तरफ से डाली गई याचिका में कहा गया था कि 'सीबीआई एक ऐसे मामले की जांच कर रही है जिसमें अस्थाना का नाम भी सामने आया है और जब तक उस मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक अस्थाना को सीबीआई से स्थानांतरित कर दिया जाना चाहिए।'
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अस्थाना की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया था।
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सीबीआई ने जांच एजेंसी में नंबर दो की हैसियत वाले अधिकारी राकेश अस्थाना के खिलाफ रिश्वत लेने के मामले में एफआईआर दर्ज की है। इसके बाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरते हुए राकेश अस्थाना को उनका चहेता अधिकारी करार दिया है।
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राहुल गांधी ने ट्वीट करते हुए कहा है, "प्रधानमंत्री मोदी के चहेते अधिकारी और गुजरात कैडर के आईपीएस अफसर जिन्होंने गोधरा मामले की जांच भी की थी, राकेश अस्थाना को रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया है।" इसके बाद दोनों अधिकारियों को प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से समन मिलने की खबरें सामने आ रही हैं।
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कौन हैं राकेश अस्थाना
1984 बैच के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना झारखंड के रांची शहर से आते हैं।
जेएनयू से पढ़ाई करने वाले अस्थाना को नरेंद्र मोदी और अमित शाह के करीबी अधिकारियों में से एक माना जाता है। जब केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो गुजरात काडर के राकेश अस्थाना को 20 अन्य आला अफसरों के साथ गुजरात से दिल्ली बुलाया गया। इन अधिकारियों की सूची में सबसे ऊपर हैं हंसमुख अधिया। वो वित्त मंत्रालय में सचिव हैं।
वहीं रीता टोटिया भी गुजरात में अधिकारी रही हैं और अब वो वाणिज्य सचिव हैं। वहीं तपन राय कॉरपोरेट मामलों के सचिव हैं। राकेश अस्थाना ने अपने अब तक के करियर में उन अहम मामलों की जांच की है जो कि वर्तमान राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से खास माने जाते हैं।
इन मामलों में गोधरा कांड की जांच, चारा घोटाला, अहमदाबाद बम धमाका और आसाराम बापू के खिलाफ जांच शामिल है। लेकिन राकेश अस्थाना को लालू प्रसाद यादव से लगातार छह घंटे तक पूछताछ करने के बाद ही ख्याति मिली थी।
अस्थाना के ही नेतृत्व में गोधरा कांड की जांच हुई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनाई गई आर के राघवन के नेतृत्व वाली जांच समिति ने अस्थाना की रिपोर्ट को सही माना था। गुजरात काडर से आने की वजह से वह गुजरात के प्रमुख शहरों जैसे अहमदाबाद, सूरत और वडोदरा में उच्च पदों पर तैनात रह चुके हैं।
खास बात ये है कि अस्थाना उस दौर में गुजरात के प्रमुख पदों पर रहे हैं जब वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह हुआ करते थे। इसके बाद वर्तमान केंद्र सरकार ने अस्थाना को सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर के रूप में नियुक्त किया।
केंद्र सरकार ने इससे पहले सीबीआई में वरिष्ठता के क्रम में नंबर दो पर तैनात अधिकारी आरके दत्ता को पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा का कार्यकाल पूरा होने से ठीक दो दिन पहले गृह मंत्रालय भेज दिया।
अगर आरके दत्ता को गृह मंत्रालय नहीं भेजा जाता तो वह स्वाभाविक रूप से सीबीआई के निदेशक बन जाते। लेकिन सरकार के इस फैसले के बाद सीबीआई लगभग एक महीने तक बिना किसी निदेशक के काम करती रही।
खबरों के मुताबिक, अस्थाना इस समय विजय माल्या और लालू यादव परिवार के खिलाफ मामलों की जांच कर रहे हैं। अस्थाना को सीबीआई का स्पेशल डायरेक्टर बनाए जाने को 2017 में अदालत में एक याचिका डालकर चुनौती दी गई थी।
याचिका में कहा गया था कि सीबीआई निदेशक की इच्छा के विरुद्ध जाकर सरकार और चुनाव समिति ने अस्थाना की सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर पद पर नियुक्ति की।
याचिका में कहा गया कि स्पेशल डायरेक्टर सीबीआई में निदेशक के बाद दूसरे नंबर का अधिकारी होता है जो सीबीआई के जांच के दायरे में आनेवाले सभी मामलों पर नजर रखता है और अस्थाना की इस पद पर नियुक्ति सवाल उठाती है।
एक एनजीओ की तरफ से डाली गई याचिका में कहा गया था कि 'सीबीआई एक ऐसे मामले की जांच कर रही है जिसमें अस्थाना का नाम भी सामने आया है और जब तक उस मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक अस्थाना को सीबीआई से स्थानांतरित कर दिया जाना चाहिए।'
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अस्थाना की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया था।
सुधारवादी अफसर के रूप में चर्चित हैं वर्मा
आलोक वर्मा
- फोटो : सोशल मीडिया
अगले साल जनवरी में रिटायर होने वाले आलोक वर्मा को उन पुलिस अधिकारियों के रूप में जाना जाता है जिन्होंने पुलिस सेवा को बेहतर बनाने के लिए तमाम नई योजनाओं को शुरू किया। आलोक वर्मा ने अपने 35 साल के करियर में अब तक केंद्र शासित राज्यों के पुलिस प्रमुख के पद से लेकर तिहाड़ जेल के डीजीपी पद और दिल्ली पुलिस कमिश्नर के पद को संभाला है।
1979 बैच के आईपीएस अधिकारी आलोक वर्मा ने मात्र 22 साल की उम्र में भारतीय पुलिस सेवा में प्रवेश किया था। दिल्ली पुलिस में अलग-अलग पदों पर रहते हुए उन्होंने तमाम सुधारवादी कदम उठाए। इनमें साल 2016 में दिल्ली पुलिस आयुक्त के पद पर रहते हुए उन्होंने महिला पीसीआर शुरू कराने से लेकर दिल्ली पुलिस में पारदर्शिता लाने के लिए कई प्रयास किए।
अगर वर्तमान मामले की बात करें तो सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने अपने खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी में कथित भ्रष्टाचार के 10 मामले दर्ज कराए हैं। सीबीआई में एडिशनल डायरेक्टर और स्पेशल डायरेक्टर के पद पर रह चुके अरुण भगत आलोक वर्मा को एक बेहद ही समझदार अधिकारी बताते हैं।
अरुण भगत कहते हैं, "आलोक वर्मा ने मेरे साथ दिल्ली पुलिस में काम किया है। वह एक बहुत ही समझदार अधिकारी रहे हैं और जल्दबाजी में काम करने वाले अधिकारी नहीं हैं। वो धैर्य के साथ काम करते हैं। लेकिन आलोक वर्मा के सामने जरूर ही कोई मजबूरी होगी जिसकी वजह से वह इतने वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ ये कदम उठा रहे हैं। उन्होंने अपने करीबी अधिकारियों से सलाह-मशविरा भी किया होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो वह ऐसा नहीं करते।"
देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई के काम करने के तरीकों पर तो पहले भी कई बार सवाल उठाए जाते रहे हैं। सीबीआई को पिंजड़े में बंद तोते के विशेषण से भी नवाजा जा चुका है।
ये पहला मौका है, जब सीबीआई के दो अधिकारी आपस में ही एक दूसरे पर खुले तौर पर आरोप लगा रहे हैं। सरकार के सामने इस विवाद को सुलझाने के साथ-साथ सीबीआई की लगातार गिरती साख को भी बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है।
1979 बैच के आईपीएस अधिकारी आलोक वर्मा ने मात्र 22 साल की उम्र में भारतीय पुलिस सेवा में प्रवेश किया था। दिल्ली पुलिस में अलग-अलग पदों पर रहते हुए उन्होंने तमाम सुधारवादी कदम उठाए। इनमें साल 2016 में दिल्ली पुलिस आयुक्त के पद पर रहते हुए उन्होंने महिला पीसीआर शुरू कराने से लेकर दिल्ली पुलिस में पारदर्शिता लाने के लिए कई प्रयास किए।
अगर वर्तमान मामले की बात करें तो सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने अपने खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी में कथित भ्रष्टाचार के 10 मामले दर्ज कराए हैं। सीबीआई में एडिशनल डायरेक्टर और स्पेशल डायरेक्टर के पद पर रह चुके अरुण भगत आलोक वर्मा को एक बेहद ही समझदार अधिकारी बताते हैं।
अरुण भगत कहते हैं, "आलोक वर्मा ने मेरे साथ दिल्ली पुलिस में काम किया है। वह एक बहुत ही समझदार अधिकारी रहे हैं और जल्दबाजी में काम करने वाले अधिकारी नहीं हैं। वो धैर्य के साथ काम करते हैं। लेकिन आलोक वर्मा के सामने जरूर ही कोई मजबूरी होगी जिसकी वजह से वह इतने वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ ये कदम उठा रहे हैं। उन्होंने अपने करीबी अधिकारियों से सलाह-मशविरा भी किया होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो वह ऐसा नहीं करते।"
देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई के काम करने के तरीकों पर तो पहले भी कई बार सवाल उठाए जाते रहे हैं। सीबीआई को पिंजड़े में बंद तोते के विशेषण से भी नवाजा जा चुका है।
ये पहला मौका है, जब सीबीआई के दो अधिकारी आपस में ही एक दूसरे पर खुले तौर पर आरोप लगा रहे हैं। सरकार के सामने इस विवाद को सुलझाने के साथ-साथ सीबीआई की लगातार गिरती साख को भी बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है।