अयोध्या: क्षितिज से गायब हुए विरोध या समर्थन में आवाज बुलंद करने वाले
करीब सात दशक के इंतजार के बाद अयोध्या में राममंदिर का निर्माण बुधवार से शुरू हो जाएगा। हालांकि, इस दौरान राम मंदिर के समर्थन और विरोध में मोर्चा खोलने वाली बड़ी हस्तियों की कमी खलेगी।
ऐसी हस्तियां जिनके समर्थन और विरोध की राजनीति ने राम मंदिर मुद्दे को न सिर्फ देश का सबसे बड़ा सियासी मुद्दा बनाया बल्कि जिनके कारण इसकी गूंज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी सुनाई दी। समर्थन और विरोध करने वाली कई जानीमानी हस्तियां अनंत में विलीन हो चुकी हैं। जो जीवित हैं वह अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में सियासी बियाबान में खो गए हैं।
कभी राममंदिर निर्माण आंदोलन के प्रणेता रहे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती जैसी दिग्गज सियासी हस्तियों से उनकी उम्र और कोरोना महामारी ने भूमि पूजन कार्यक्रम में सशरीर उपस्थित होने का अवसर छीन लिया है।
राममंदिर आंदोलन को सही मायने में लालकृष्ण आडवाणी ने सियासी धार दी। साल 1990 में उनकी सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा ने इस मुद्दे को नई ऊंचाईयां दी। वर्ष 1992 में कल्याण सिंह के यूपी का सीएम रहते विवादित ढांचे को तोड़ा गया।
कल्याण को इस मामले अपनी सत्ता गंवाने के साथ जेल भी जाना पड़ा। इस दौरान तब पार्टी के कद्दावर नेता रहे मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती ने मंदिर आंदोलन में जान फूंकी। अब जबकि बुधवार को उसी राम मंदिर का भूमि पूजन है तब ये चारों हस्तियां उम्र, कोरोना के कारण वहां सशरीर उपस्थित नहीं हो सकेंगी।
विरोधी भी किनारे या अनंत में विलीन
राम मंदिर मामले में विरोध का मोर्चा खोलने वाली कई बड़ी हस्तियां इस दुनिया में नहीं हैं। बाबरी मस्जिद के पक्ष में दशकों लगातार संघर्ष करने वाले सबसे चर्चित चेहरा रहे हामिद अंसारी, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सैयद शहाबुद्दीन अब इस दुनिया में नहीं हैं।
वर्ष 1990 में राम मंदिर के पक्ष में आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या यात्रा पर रोक लगाने और आडवाणी को गिरफ्तार करने वाले बिहार के तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद यादव का सियासी कॅरियर खत्म हो गया है। वह चारा घोटाले में जेल में बंद हैं। इसी साल कारसेवकों पर सख्ती दिखा कर आलोचनाओं के शिकार हुए यूपी के तत्कालीन सीएम मुलायम सिंह यादव भी जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं।
देवरहा बाबा, अवैद्यनाथ, सिंहल और डालमिया की बस यादें बाकी
राममंदिर निर्माण से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ी कई अन्य हस्तियां भी अनंत में विलीन हो गई हैं। मसलन तब विवादित परिसर का ताला खुलवाने और मंदिर का शिलान्यास करने वाले तत्कालीन पीएम राजीव गांधी और गृह मंत्री बूटा सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं।
इसके बाद जिन पीवी नरसिंह राव के प्रधानमंत्री रहते साल 1992 में विवादित ढांचा टूटा उनकी भी बस यादें बाकी हैं। मंदिर आंदोलन को शुरुआती दौर में अपने समर्थन से नई दिशा देने वाले महंत रामचंद्रदास महंत, देवराहा बाबा, महंत अवैद्यनाथ, संघ प्रमुख रहे केसी सुदर्शन, विहिप के वरिष्ठ नेता विष्णुहरि डालमिया, अशोक सिंहल जैसी बड़ी हस्तियां भी अब इस दुनिया में नहीं हैं।