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यूपी: मिले मुलायम कांशीराम, क्या नब्बे के दशक में पहुंच गई राजनीति?

Thu, 15 Mar 2018 11:09 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Thu, 15 Mar 2018 11:09 AM IST
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When Mulayam and Kanshiram met
मुलायम सिंह, कांशीराम
1993 के विधानसभा चुनाव में बसपा के संस्थापक कांशीराम ने बड़ा निर्णय लिया था। उन्होंने समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लडने का फैसला किया। नतीजा सामने भाजपा का हिन्दुत्व का एजेंडा धरा का धरा रह गया। आज एक बार फिर उसी दौर को याद किया जा रहा है। फिर नारा बुआ-भतीजे (माया-अखिलेश) के मिलन का लग रहा है।
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क्या 90 के दशक में पहुंच गई राजनीति

खांटी राजनीतिज्ञ शरद यादव ठीक कहते हैं कि भारत जैसे देश में धर्म के आगे राजनीति का जोर नहीं चल सकता। शरद यादव ने 2014 में भाजपा को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत मिलने के बाद चर्चा में कहा था। इसके बाद शरद यादव ने जनता दल परिवार को एकजुट करने की कोशिश शुरू की। वह मुलायम से भी मिले और लालू से भी बात किए। बिहार की राजनीति के दो ध्रुव माने जाने वाले जद(यू) और राष्ट्रीय जनता दल साथ आए। कांग्रेस इसमें शामिल हुई। समाजवादी पार्टी भी गठबंधन का हिस्सा बनी और चुनाव करीब आते-आते छिटक गई। लेकिन 2015 के इस बिहार विधानसभा चुनाव में पूरा दम-खम लगाने के बाद भी भाजपा सत्ता में नहीं आ पाई। महागठबंधन जीत गया।
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उत्तर प्रदेश में करना चाहा प्रयोग

शरद यादव चाहते थे यह प्रयोग यूपी में हो। बसपा, सपा साथ आए तो हर्ज क्या? 2017 के विधानसभा चुनाव के पहले तमाम भूमिकाएं बनी। लेकिन कहा जाता है कि समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव और उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव के साथ बसपा प्रमुख मायावती साथ आने के लिए तैयार नहीं थी। इसकी पृष्ठभूमि में 90 के दशक का गेस्ट हाऊस कांड था। गेस्ट हाऊस कांड में कहा जाता है कि समाजवादी पार्टी के विधायकों ने मुलायम की लाठी कहे जाने वाले शिवपाल के तेवर देखकर मायावती के साथ बदसलूकी की थी। बसपा के पुराने धुरंधर बताते हैं कि मायावती के लिए यह सदमे की तरह था। वह इसे कभी नहीं भूली। न तो भाजपा के नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी द्वारा उस समय की गई तात्कालिक मदद को और न ही इस गुंडागर्दी में शामिल विधायकों को। बताते हैं बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद अपने ही सांसद उमाकांत यादव को अपने आवास से गिरफ्तार कराने के पीछे एक छिपा हुआ गुस्सा भी था।
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चुनाव के पहले हो गई लोट-पोट

When Mulayam and Kanshiram met
सपा, बसपा
यूपी के 2017 में होने वाले चुनाव से छह महीने पहले समाजवादी पार्टी के भीतर ही घमासान शुरू हो गया। मुलायम, शिवपाल, अखिलेश के बीच पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने अभियान में सफल रहे। शिवपाल सिंह यादव पार्टी में हाशिए पर हो गए। मुलायम की बात मानना या न मानना अखिलेश की इच्छा पर निर्भर करने लगा। लेकिन बसपा और समाजवादी पार्टी के बीच में कोई समझौते का बिन्दु क्या संभावना भी नहीं दिखी। इसके बरअक्स कांग्रेस, समाजवादी पार्टी साथ आ गई। हालांकि कांग्रेस की पहली वरीयता बसपा थी, लेकिन मायावती ने कांग्रेस को कंधे पर हाथ रखने का भी अवसर नहीं दिया। बसपा अकेले चुनाव लड़ी। चुनाव हुआ, गठबंधन सम्मानजनक सीटें नहीं ला पाया। भाजपा प्रचंड बहुमत 311 का पाने में सफल रही। 13 सीटें उसकी सहयोगी दलों को भी मिली।

फिर साथ आए

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने चुनाव के बाद ही मायावती के साथ मधुरता का संकेत देना शुरू कर दिया। वह बुआ -भतीजे के भाव में आ गए। यह वही अखिलेश यादव थे जो मायावती के शासन में मूर्तियों पर तल्ख टिप्पणी कर रहे थे और यह वहीं मायावती हैं जो अखिलेश के नेतृत्व वाली सरकार की बखिया उधेड़ रही थी। लेकिन दोनों ने यूपी लोकसभा उपचुनाव में साथ आने का फैसला ले लिया। बसपा ने उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के फूलपुर और गोरखपुर के प्रत्याशी क्रमश: नागेन्द्र पटेल और प्रवीण कुमार निषाद को समर्थन देने का निर्णय ले लिया।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने राष्ट्रीय लोकदल के सहयोग से बसपा के उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर को राज्यसभा में भेजने का निर्णय लिया। नतीजा सामने है। गोरखपुर की असंभव सी समझे जाने वाली और भाजपा का अभेद्य किला बन चुकी गोरखपुर सीट मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की सीट होने के बाद भी समाजवादी के पाले में आ गई। समाजवादी पार्टी फूलपुर सीट पर भी विजयी रही। एक बार फिर भाजपा का एजेंडा हवा में उड़ गया।

क्या है चुनाव के माने

When Mulayam and Kanshiram met
सपा, बसपा
कहानी किसान के बच्चे जैसी है। बच्चे आपस में लड़ रहे थे और किसान को उन्हें एकता का महत्व समझाना पड़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से अब तक के हुए राज्यों के चुनाव और 2018 के उपचुनाव ने इस महत्ता को फिर समझा दिया है। कहना ठीक होगा कि लोकसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले 2018 में कांग्रेस, सपा, बसपा, रालोद समेत यूपी के कई छोटे-बड़े दल इस महत्व को समझ चुके हैं। सवाल भाजपा से 2019 में मिलने वाली चुनौती का खड़ा है। सोनिया गांधी द्वारा 13 मार्च को बुलाए गए रात्रिभोज में एकता एक संकेत कर रही है। एनसीपी के शरद पवार का वहां होना माने रखता है। तेजस्वी यादव राजनीति और राजद के नए सितारे हैं। चौधरी अजीत सिंह की बेचारगी बताती है कि कुछ बचा नहीं है। कुछ पाना है तो कुछ करना है। उमर अब्दुल्ला और फारुख अब्दुल्ला भी इसे समझ रहे हैं। वहां आए 19 दलों के नेताओं को पता है कि क्षेत्रीय राजनीति में वजूद बनाये रखने के लिए जरूरी है कि भाजपा से मिलकर कड़ा मुकाबला किया जाए।

भाजपा के लिए भी उपचुनाव साफ संकेत दे रहा है। उसकी जमीन खिसक रही है। यूपी के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य मान चुके हैं। वह स्वीकार कर रहे हैं कि कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा अध्यक्ष महेन्द्र पांडे इसकी समीक्षा कर रहे हैं। यह भी तय है कि अंदरखाने में ही सही यूपी में भी यूपी सरकार के नेतृत्व पर भी सवाल उठेंगे। मोदी सरकार के सरकार के कामकाज पर तो सवाल है ही। युवाओं की बेरोजगारी, किसानों की हालत, भाजपा द्वारा किए गए वादे, जमीनी हकीकत भी बड़ी चुनौती है। राज्य के नेताओं के साथ मिलकर निबटना भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को ही है।

क्या होगा आगे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की भाजपा से मुकाबले के लिए विपक्षी राजनीतिक दल साथ आएंगे। करीब डेढ़ दर्जन दल कांग्रेस के साथ यूपीए (यूनाइटेड प्रोग्रेसिंव एलाएंस) का हिस्सा अवश्य बनेंगे। लेकिन बड़ा सवाल समाजवादी पार्टी और बसपा के इर्द-गिर्द घूमेगा। यह कहने में गुरेज नहीं है कि केन्द्र की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर गुजरता है। 2004 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को मिली 40 सीटों ने उसके तत्कालीन महासचिव अमर सिंह और नेता मुलायम सिंह को किंग मेकर का सपना दिखा दिया था। वामदलों को अच्छी संख्या में सीट नहीं मिली होती तो यह समाजवादी पार्टी के नेताओं की सोच कहीं से भी गलत नहीं थी।

यह बड़ा सवाल 2019 के गठबंधन की संभवाना में मौजूं रहेगा। संभव है कि सपा और बसपा का ही गठबंधन बने। यह भी संभव है कि सब एक क्षत के नीचे आकर भाजपा और उसके सहयोगी दलों का मुकाबला करें। फिलहाल अभी संभावना मिलकर लडने का फार्मूला निकाले जाने की ही है। कांग्रेस पार्टी के एक रणनीतिकार का मानना है कि अभी इसका सही समय नहीं आया है। अक्टूबर-नवंबर 2018 के बाद इसकी संभावना दिखाई देगी। अभी तो बुनियाद की ईंटें रखी जा रही हैं।
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