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रिसर्च: दक्षिण एशिया के 17 देशों में बढ़ा संक्रमण, वैज्ञानिक पता लगा रहे भारतीय वैरिएंट की भूमिका

Fri, 30 Apr 2021 10:54 AM IST
प्रियंका तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रियंका तिवारी Updated Fri, 30 Apr 2021 10:54 AM IST
सार

शोधकर्ता यह पता लगाने में जुट गए हैं कि आखिर कोरोना वायरस के मामलों में ये अप्रत्याशित उछाल क्यों आया, और क्या भारत में पहली बार मिलने वाले कोरोना वायरस के विशेष वैरिएंट को इसके लिए दोषी माना जाना चाहिए।

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What we know about the Indian variant as Corona sweeps South Asia
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

विस्तार

दुनियाभर में फैल चुके कोरोना महामारी का प्रकोप दक्षिण एशिया के देशों में भी भयंकर रूप से देखने को मिल रहा है। भारत में पहली बार पाया गया B.1.617 नाम का कोरोना वायरस वैरिएंट दक्षिण एशिया के 17 देशों में भी मिल चुका है। ऐसे में यह चर्चा उठी है कि दक्षिण एशियाई देशों में फैले कोरोना वायरस का यह वैरिएंट कहीं भारत से तो नहीं पहुंचा। फिलहाल वैज्ञानिक अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं। 

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इधर, भारत ने दुनियाभर के मुकाबले इस माह कोरोना वायरस के सबसे अधिक मामले दर्ज किए हैं। इन केस लोड के कारण देश की राजनीतिक और वित्तीय राजधानियां नई दिल्ली और मुंबई में अस्पताल के बेड, मेडिकल ऑक्सीजन और दवाओं की भारी कमी से जूझ रही हैं। ऐसे में शोधकर्ता यह पता लगाने में जुट गए हैं कि आखिर कोरोना वायरस के मामलों में ये अप्रत्याशित उछाल क्यों आया, और क्या भारत में पहली बार मिलने वाले कोरोना वायरस के विशेष वैरिएंट को इसके लिए दोषी माना जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर भारत में मिले कोरोना वायरस वैरिएंट को लेकर चिंता बनी हुई है।

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क्या है B.1.617 वैरिएंट?
वरिष्ठ भारतीय वायरोलॉजिस्ट शाहिद जमील ने कहा कि B.1.617 वैरिएंट में वायरस के दो प्रमुख म्यूटेशन हैं जो मानव कोशिकाओं से जुड़ते हैं। डब्ल्यूएचओ ने भी कहा कि B.1.617 वैरिएंट में ऐसे म्युटेंट हैं जो वायरस को अधिक संक्रामक बनाते हैं और जो वैक्सीन की प्रतिरक्षा से भी बच सकते हैं। सार्स-सीओवी-2 का B.1.617 वैरिएंट, जिसे डबल म्यूटेंट या इंडियन स्ट्रेन भी कहा जाता है, महाराष्ट्र और दिल्ली में बड़े पैमाने पर मिला है। इसकी वजह से यहां आई महामारी की दूसरी लहर ने बुरी तरह प्रभावित किया है। देश के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र के कई शहरों में जीनोम सिक्वेसिंग किए गए आधे से ज्यादा सैंपल में B.1.617 वैरिएंट मिला है। वहीं, मार्च के दूसरे सप्ताह में यूनाइटेड किंगडम वैरिएंट की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की कहना है कि B.1.617 के प्रमुख वंश को पहली बार भारत में दिसंबर में पहचाना गया था। हालांकि, इसके पुराने वैरिएंट को अक्टूबर 2020 में पाया गया था।  
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कोरोना के नए मामलों में वृद्धि का क्या कारण है?
शोधकर्ताओं ने कहा कि यह कहना कठिन है कि कोरोना के मामलों में वृद्धि की वजह क्या है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि इसके लिए अधिक अध्ययन की तत्काल जरूरत है। हालांकि, यह भी कहा गया है कि प्रयोगशाला-आधारित सीमित नमूनों की जांच के बाद यह कहा जा सकता है कि कोरोना के मामलों में वृद्धि के लिए नए वैरिएंट्स ही जिम्मेदार हैं।

डब्ल्यूएचओ ने आगे कहा कि अभी इस पर साफ तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल होगा क्योंकि यूनाइटेड किंगडम में सबसे पहले पाए जाने वाले B.117 वैरिएंट के कारण भी भारत के कुछ हिस्सों में कोरोना वायरस के मामलों में वृद्धि देखी गई है। वहीं, नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के निदेशक सुजीत कुमार सिंह के अनुसार, यूके वेरिएंट के कारण दिल्ली में कोरोना वायरस के दोगुने केस मध्य मार्च के बाद देखने को मिले। सिंह ने कहा कि हालांकि, वायरस का भारतीय वैरिएंट महाराष्ट्र में व्यापक रूप से फैला हुआ है।


क्या टीके इसे रोक सकते हैं?
अच्छी बात यह है कि भारत में लगाई जा रहीं वैक्सीन बी.1.617 वैरिएंट के खिलाफ बेहतर तरीके से काम कर रही हैं। व्हाइट हाउस के मुख्य चिकित्सा सलाहकार एंथोनी फौसी ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा था कि लैब अध्ययनों से प्रारंभिक साक्ष्य बताते हैं कि भारतीय विकसित कोवाक्सिन कोरोना वायरस के बी.1.617 वैरिएंट को निष्प्रभावी करने में सक्षम है। पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड ने कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ काम कर रहा है, लेकिन वर्तमान में उसे इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है कि भारतीय कोरोना वायरस वैरिएंट और इससे संबंधित पहले के दो वैरिएंट्स अधिक गंभीर बीमारी का कारण बनते हैं या ये टीकों के प्रभाव को कम करते हैं।

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