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'गालियां खाएंगे, पिटेंगे, पर भारत नहीं छोड़ेंगे'

Fri, 22 Apr 2016 02:03 PM IST
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india Updated Fri, 22 Apr 2016 02:03 PM IST
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'we never left india'
ग़लत बर्ताव की वजह से मुझे अपनी कॉल सेंटर की नौकरी छोड़नी पड़ी - फोटो : BBC

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"आए दिन की छेड़छाड़ और ग़लत बर्ताव की वजह से मुझे अपनी कॉल सेंटर की नौकरी छोड़नी पड़ी। लोग हमें चिंकी या नेपाली कहते हैं, अश्लील इशारे करते हैं, मेट्रो या बस में इधर-उधर छूने की कोशिश करते हैं और अगर कुछ बोलो तो फिर झगड़ा और पुलिस थाने का चक्कर।" ये आप बीती है म्यांमार से आकर दिल्ली में रहने वाली 20 साल की एक चिन शरणार्थी की जो अपना नाम नहीं बताना चाहती। भारत में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के साथ-साथ एक बड़ी संख्या ईसाई धर्म मानने वाले चिन समुदाय की है। इस समुदाय के एक नेता को नई सरकार में उपराष्ट्रपति चुना गया है। लेकिन म्यांमार में सालों के सैन्य शासन के अंत और एक निर्वाचित सरकार की गठन के बावजूद ये शरणार्थी वापस नहीं जाना चाहते हैं।

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संयुक्त राष्ट्रसंघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की सीमा से लगे पश्चिम म्यांमार का चिन राज्य दुनिया के सबसे ग़रीब इलाकों में से एक है जहां लगभग 73 प्रतिशत लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं। अगस्त 1988 में लोकतंत्र बहाली की मांग को लेकर खड़े हुए आंदोलन के बाद हज़ारों की संख्या में चिन सीमावर्ती भारतीय राज्य मिजोरम भाग आए और फिर वहां से दिल्ली। इनमें से ज़्यादातर पश्चिमी दिल्ली के बुडेला और हस्ताल गांव में रहते हैं। भारत में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) लोक सूचना अधिकारी शुचिता मेहता बताती हैं कि मिजोरम में इनकी संख्या क़रीब एक लाख है, वहीं दिल्ली में लगभग छह हज़ार पंजीकृत चिन शरणार्थी रहते हैं।
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दिल्ली में इनकी स्थिति और यूएनएचसीआर की तरफ से दी जा रही मदद के सवाल पर शुचिता कहती हैं, "भारत में शरणार्थियों के लिए कोई विशेष क़ानून नहीं है, लेकिन 1951 के रिफ्यूजी कन्वेंशन के प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं। सबसे पहले हम पता करने की कोशिश करते हैं कि यहां आने वाले लोग शरणार्थी होने की सभी शर्तों को पूरा करते हैं या नहीं, फिर पहचान पत्र के तौर पर एक रिफ्यूजी कार्ड दिया जाता है, ताकि उन्हें जबरन वापस न भेजा जाए।"


यूएनएचसीआर गैर-सरकारी (एनजीओ) संस्थाओं के साथ मिलकर शरणार्थियों के शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ आजीविका के अवसर मुहैया करने का प्रयास करता है। पिछले नौ सालों से दिल्ली में रह रहे 27 साल के टूलियन थान शरणार्थियों के लिए काम करने वाली एनजीओ डॉन बॉस्को आशालयम से जुड़े हैं। वे अपने बड़े भाई और भाभी के साथ अगस्त 2006 में मिज़ोरम पहुंचे थे फिर जनवरी 2007 में दिल्ली। नवनिर्वाचित सरकार में चिन समुदाय के हेनरी वान थियो को उपराष्ट्रपति बनाए जाने पर टूलियन कहते हैं, "बौद्ध लोग अभी भी इसका विरोध कर रहे हैं। इससे साफ तौर पर पता चलता हैं कि म्यांमार में अभी धार्मिक-सांस्कृतिक स्वतंत्रता नहीं हैं। इसलिए वहां लौटना हमारे लिए अभी भी ख़तरे से खाली नहीं।"

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ज़्यादातर चिन शरणार्थी अशिक्षित हैं और यहां की भाषा न जानने की वजह से कोई ढंग का काम भी नहीं मिलता। एक रेस्टोरेंट में सफाई का काम करने वाले 28 साल के कामखान तुंग टूटी-फूटी हिंदी में बताते हैं कि अक्सर रात में घर लौटते समय सड़क किनारे खड़े लोग उन्हें गलियां देते हैं और विरोध करने पर मारपीट भी करते हैं। हालांकि डॉन बॉस्को आशालयम के बुडेला शाखा के प्रबंधक सुरेश कुजूर बताते हैं कि उनकी संस्था शरणार्थियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने का भरसक प्रयास करती है। लेकिन ज़्यादातर शरणार्थी दिहाड़ी मज़दूर है और पुलिस में शिकायत का मतलब एक-दो दिन की छुट्टी। इसलिए वे ये सब चुपचाप सह लेते हैं।

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इन मुसीबतों के बावजूद इन्हें म्यांमार में हुए हालिया राजनीतिक बदलावों से न तो कोई बड़ी उम्मीद हैं और न ही वापस अपने देश लौटने का उत्साह। कामकाजी शरणार्थियों के बच्चों की देखभाल करने वाली 42 वर्षीय चेन्नोय कहती हैं कि अगर कुछ बेहतर होगा तो शायद अगली पीढ़ियों के लिए, उनके और उनके हमउम्र लोगों के लिए अभी वहां कोई उम्मीद नहीं। 2007 में अरुणाचल प्रदेश के रास्ते भारत आने वाली चेन्नोय कहती है, "वहां न शिक्षा हैं, न रोज़गार। और जब लोग इन सबके लिए आवाज़ उठाते हैं तो उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया जाता हैं। हमें आंग सान सू ची से बहुत उम्मीदें हैं, लेकिन पिछले हफ्ते एक फोटो में मैंने देखा कि उनकी पार्टी के नेता कचिन प्रदेश से लौट रहे सैनिकों का स्वागत कर रहे हैं जबकि वहां आज भी स्थानीय कचिन समुदाय और सेना के बीच लड़ाई जारी है। यह सब देखकर अब शक़ होता है।"

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