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संसदीय समिति की रिपोर्ट की वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

Thu, 10 May 2018 05:59 AM IST
 ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
 ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 10 May 2018 05:59 AM IST
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Validity of parliamentary committee reports can not be challenged says Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है और संविधान के अनुच्छेद 32 (रिट याचिका) और 136 (विशेष अनुमति याचिका) के तहत दायर होने वाली याचिकाओं में समिति की रिपोर्ट को आधार बनाया जा सकता है, लेकिन उसकी वैधता पर न तो सवाल खड़ा किया जा सकता है और न ही उसे चुनौती दी जा सकती है। पांच जजों की संविधान पीठ ने आमराय से यह व्यवस्था दी, लेकिन तीन जजों ने अपनी अलग राय जाहिर की। 

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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एके सिकरी, न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट को न्यायिक प्रक्रिया से अलग रखने का कोई कारण नहीं है और अदालत उन पर निर्भर कर सकती है।
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पीठ ने कहा कि समिति की रिपोर्ट पर न्यायिक संज्ञान लेना संसदीय विशेषाधिकार पर अतिक्रमण नहीं है। हालांकि पीठ ने कहा कि संसदीय समिति की रिपोर्ट को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। फैसला चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यामयूर्ति डीवाई चंद्रचूंड और न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने अलग-अलग लिखा है लेकिन सभी का निष्कर्ष एक ही है।
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फैसले में कहा गया है कि संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक होती है और नागरिकों को उस पर पर टिप्पणी करने एवं प्रतिक्रिया देने का अधिकार है। न्यायिक प्रक्रिया में समिति की रिपोर्ट का हवाला देना संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन नहीं है। याचिकाओं में समिति की रिपोर्ट को साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि सबूत के तौर पर समिति की रिपोर्ट का हवाला देने का यह मतलब नहीं है कि वह सही साबित हो गया। समिति की रिपोर्ट पर उचित टिप्पणी करना अभिव्यक्ति के अधिकार के दायरे में है।

Validity of parliamentary committee reports can not be challenged says Supreme Court
वास्तव में यह संवैधानिक मसला कल्पना मेहता की जनहित याचिका पर उठा। याचिका में सरवाइकल कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाले दो वैक्सीन के लाइसेंस को रद्द करने का निर्देश देने की गुहार की गई थी।

आंध्र प्रदेश और गुजरात की आदिवासी लड़कियों एवं किशोरियों पर इन दोनों वैक्सीन के इस्तेमाल की इजाजत दी गई थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि गारडासिल और सर्वारिक्स नामक ये दोनों वैक्सीन सत्यापित नहीं है और यह खतरनाक है। याची के अनुसार जिन महिलाओं पर इन वैक्सीन का इस्तेमाल किया गया, उन्हें उनके दुष्प्रभावों की जानकारी नहीं दी गई। 

मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन
याचिका में कहा गया था कि वर्ष 2014 में संसदीय स्थायी समिति की 81वीं रिपोर्ट में कहा गया था कि आंध्र प्रदेश और गुजरात सरकार द्वारा इन दोनों वैक्सीन के इस्तेमाल की इजाजत देना चिकित्सकीय नैतिकता और लड़कियों एवं किशोरियों के मानवाधिकार का घोर उल्लंघन है।

दो सदस्यीय पीठ ने प्रथम दृष्टया यह कहा था कि संसदीय समिति की रिपोर्ट के दस्तावेजों को बहस का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए। हालांकि पीठ ने इसमें संवैधानिक मसला होने की बात कहते हुए उसे संविधान पीठ के पास भेज दिया था।  
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