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उत्तराखंड: तीरथ सिंह रावत से क्यों पिछड़ गए निशंक और धन सिंह रावत, पढ़ें पर्दे के पीछे की कहानी

Wed, 10 Mar 2021 06:24 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा/आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा/आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 10 Mar 2021 06:24 PM IST
सार

  • प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊं का होने से गढ़वाल क्षेत्र का ही मुख्यमंत्री होना तय था
  • गुटबाजी से दूर और कार्यकर्ताओं की पहुंच वाले नेता हैं तीरथ सिंह  
  • चुनावी साल में पार्टी को चाहिए था निचले स्तर तक पहुंच वाला मुख्यमंत्री

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Uttarakhand: Why BJP choose Tirath singh Rawat as chief minister of state besides Nishank Pokhriyal and Dhan singh rawat, here is the story
Tirath Singh Rawat Sworn In As New Chief Minister Of Uttarakhand - फोटो : ANI

विस्तार

त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस्तीफे के बाद उत्तराखंड की बागडोर जब तीरथ सिंह रावत को देने का एलान हुआ तो तमाम दिग्गज नेता और सियासी जानकार हैरत में पड़ गए। अप्रत्याशित तरीके से तीरथ सिंह रावत ने उन सभी दावेदारों को पीछे छोड़ दिया, जिनके नाम पिछले कुछ दिनों से चर्चा में थे। माना जा रहा है कि बेहद शांत और शालीन व्यक्तित्व वाले तीरथ सिंह रावत को ये अहम जिम्मेदारी इसलिए दी गई, क्योंकि उनपर कभी किसी गुटबाजी का आरोप नहीं लगा और तमाम कार्यकर्ताओं तक उनकी बहुत गहरी पहुंच रही है।

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त्रिवेंद्र सिंह रावत के ऊपर सबसे गंभीर आरोप उनका कार्यकर्ताओं की पहुंच से बाहर होना बताया जा रहा था, जबकि दो बार उत्तराखंड के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रहते हुए तीरथ सिंह रावत किसी भी विवाद से दूर रहे और इस बीच सभी कार्यकर्ताओं की पहुंच में बने रहे। संघ की पृष्ठभूमि भी उन्हें सहज-सरल होकर लोगों के करीब रहने में मदद करती है, जो विधानसभा चुनाव की दृष्टि से पार्टी के पक्ष में जाती है। उनके नाम पर पार्टी के किसी गुट का विरोध भी नहीं था। लिहाजा वे इस पद के लिए पहली पसंद बन गए।
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उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल रीजन और कुमाऊं रीजन का बड़ा प्रभाव रहता है। किसी भी सत्ताधारी दल के लिए इन दोनों ही क्षेत्रों को सत्ता में बराबर की भागीदारी सुनिश्चित करने की चुनौती रहती है। त्रिवेंद्र सिंह रावत भी इसी क्षेत्र से आते हैं और सत्ता में दोनों क्षेत्रों का बराबर का संतुलन बना रहता था, लेकिन किसी दूसरे क्षेत्र से मुख्यमंत्री बनाने से यह संतुलन गड़बड़ा सकता था। लिहाजा तीरथ सिंह रावत इस पद के लिए ज्यादा उपयुक्त समझे गए।

राज्य की राजनीति में राजपूत बहुल आबादी और ब्राह्मणों के प्रभाव को भी संतुलन में साधना पड़ता है। त्रिवेंद्र सिंह रावत को राजपूत समाज की भागीदारी के रूप में मुख्यमंत्री पद दिया गया था, तो वहीं ब्राह्मण समुदाय की भागीदारी के लिए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में बंशीधर भगत को जिम्मेदारी दी गई है। त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाने के बाद अगर यही जिम्मेदारी रमेश पोखरियाल निशंक को दी जाती तो यह समीकरण गड़बड़ा सकता था। चुनावी वर्ष में भाजपा यह जोखिम नहीं उठा सकती थी।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक धन सिंह रावत के नाम पर त्रिवेंद्र सिंह के विरोधी सहमत नहीं थे, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि वे बाद में भी त्रिवेंद्र सिंह रावत के प्रभाव में काम करते रह सकते थे। जाहिर है चुनावी साल के मद्देनजर ये पार्टी के लिए घातक होता।

दरअसल उत्तराखंड भाजपा में हमेशा से कई गुट रहे हैं। ऐसे में भाजपा आला कमान को ऐसे नेता की तलाश थी, जो बेदाग हो और उसकी सभी कार्यकर्ताओं से बनती भी हो, सभी को लेकर चलने की क्षमता हो। ऐसे में इकलौता नाम सांसद तीरथ सिंह रावत का सामने आया। उनकी भाजपा के सभी अंदरूनी गुटों में स्वीकार्यता है। इसके अलावा संगठन में भी अच्छी पैठ है। प्रदेश और केन्द्रीय नेतृत्व के साथ बेहतर सामंजस्य के मामले में तीरथ सिंह रावत सबसे अव्वल माने गए।

उत्तराखंड भाजपा में इस वक्त प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊं मंडल से है, तो मुख्यमंत्री गढ़वाल मंडल से ही चुना जाना था। ऐसे में भाजपा के नेता अजय भट्ट का पत्ता इसी मंडल के सिलसिले में कट गया। अब जो दूसरे नाम भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के सामने थे उसमें धन सिंह रावत, अनिल बलूनी, रमेश पोखरियाल निशंक समेत वरिष्ठ भाजपा नेता और महाराष्ट्र के गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी प्रमुख थ। सूत्र बताते हैं कि धन सिंह रावत के नाम को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सिफारिश की थी। त्रिवेंद्र सिंह रावत की सिफारिश के चलते ही धन सिंह रावत का भी पत्ता कट गया।


चूंकि प्रदेश भाजपा में रमेश पोखरियाल निशंक और धन सिंह रावत समेत अनिल बलूनी गुट के लोग हैं। ऐसे में आलाकमान ने तय किया कि किसी ऐसे तटस्थ अनुभवी नेता को जिम्मेदारी दी जाए, जो प्रदेश को अगले साल होने वाले चुनाव में स्वच्छ और बेहतर छवि के साथ मैदान में उतार सके। इन सब के बाद ही सांसद तीरथ सिंह रावत का नाम तय किया गया। तीरथ सिंह रावत को संगठन में काम करने के साथ प्रशासनिक मामलों में भी अच्छा खासा अनुभव है। हिमाचल प्रदेश में बतौर प्रभारी का उनका कार्यकाल रहा हो या पूर्व में कैबिनेट मंत्री का कार्यकाल, केंद्रीय नेतृत्व ने तीरथ सिंह रावत की क्षमताओं को हमेशा सराहा।

भाजपा नेता विपिन गौड़ कहते हैं कि तीरथ सिंह रावत बेदाग छवि और संघ में मजबूत पकड़ वाले नेता हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में तीरथ सिंह रावत ने न सिर्फ अपने संसदीय क्षेत्र में बल्कि पूरे उत्तराखंड में जिस तरीके से लोगों की मदद की वह एक मानवीय पहलू भी उभर कर सामने आया। विपिन का कहना है कि अगले साल होने वाले चुनाव में तीरथ सिंह रावत से बेहतर चेहरा उत्तराखंड में और कोई भी नहीं हो सकता था। केंद्रीय नेतृत्व ने जो फैसला लिया है वह अगले साल होने वाले चुनाव में एक बेहतर परिणाम के तौर पर सामने आएगा।

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