‘गाय हो या कोई और बहाना, हमले बर्दाश्त नहीं’
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धार्मिक अल्पसंख्यकों पर होने वाले हमलों को लेकर भारत की आलोचना करने वाली अमरीकी रिपोर्ट पाकिस्तानी उर्दू मीडिया की तवज्जो का केंद्र है। 'औसाफ' लिखता है कि अमरीकी विदेश मंत्रालय ने धार्मिक आजादी से जुड़ी 2015 की अपनी रिपोर्ट जारी कर दी है।
अखबार कहता है कि धार्मिक आजादी को लेकर विशेष अमरीकी दूत डेविड स्टेन ने भारत में मुसलमानों समेत सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले बर्ताव पर चिंता जताई है।
अखबार ने अमरीकी रिपोर्ट में पाकिस्तान पर कही गई नकारात्मक बातों का जिक्र भर किया है, जबकि उसके संपादकीय के शीर्षक से भारत को लेकर तल्खी साफ दिखती है। शीर्षक है: अमरीका की नरेंद्र मोदी से मांग, मानवाधिकार का ध्यान रखा जाए।
वहीं 'नवा-ए-वक्त' लिखता है कि डेविड स्टेन ने एक सवाल के जबाव में कहा,'गौमांस हो या कोई और बहाना, मुसलमानों समेत अल्पसंख्यकों पर हमले स्वीकार नहीं किए जा सकते।'
अखबार लिखता है कि भारत में लोग गाय का गोश्त रखने भर के संदेह में हिंदू कट्टरपंथियों की जुनूनियत का शिकार बन रहे हैं। अखबार की राय में आज अमरीका को भी अहसास हो रहा है कि भारत में मुसलममानों और अन्य अल्पसंख्यकों को तंग किया जा रहा है तो फिर उसे भारत के हाथ रोकने चाहिए।
हनीफ मोहम्मद की जिंदगी की पारी तो खत्म हो गई
रोजनामा 'पाकिस्तान' ने क्वेटा में हालिया हमले के लिए जहां भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ की गतिविधियों पर सवाल उठाया है, वहीं पाकिस्तान के सुरक्षा प्रबंधों को भी नाकाफी कहा है। अखबार लिखता है कि कहीं न कहीं कमजोरी तो जरूर है, जिसका फायदा उठाकर दहशतगर्द धमाके करने में कामयाब हो जाते हैं।
अखबार कहता है कि दहशतगर्दी को खत्म करना है तो सभी पहलुओं को ध्यान में रख कर रणनीति बनानी होगी। वहीं 'जंग' ने पाकिस्तानी क्रिकेटर हनीफ मोहम्मद के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है कि वो उन चंद खिलाड़ियों में शामिल थे जिन्होंने युवाओं की तीन पीढ़ियों में क्रिकेट का शौक और जज्बा पैदा किया।
अखबार लिखता है कि हनीफ मोहम्मद की जिंदगी की पारी तो खत्म हो गई है लेकिन उनका शानदार किरदार और खेल आने वाले कई दशकों तक युवाओं को प्रेरित करता रहेगा। 'एक्सप्रेस' लिखता है कि 1958-59 में हनीफ मोहम्मद ने सर डॉन ब्रेडमैन से फर्स्ट क्लास क्रिकेट की एक पारी में सबसे ज्यादा व्यक्तिगत स्कोर का रिकॉर्ड छीन लिया था।
अखबार के मुताबिक ये रिकॉर्ड उन्होंने 499 रन बनाकर अपने नाम किया और किसी क्रिकेटर को ये रिकॉर्ड तोड़ने में 35 साल लग गए जब 1994 में ब्रायन लारा ने 501 रन बनाए। रोजनामा 'दुनिया' ने पाकिस्तानी संसद में विपक्ष के विरोध के बावजूद साइबर बिल के पास होने को बेहद अहम बताया है।
अखबार कहता है कि ये कानून भड़काऊ, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और चरमपंथ को बढ़ावा देने वाली सामग्री को फैलने से रोकने में मदद करेगा। लेकिन अखबार ने ये भी लिखा है कि दूसरे मामलों में इसे लागू करने पर सवाल भी उठेंगे।
अखबार के मुताबिक ये विचारों पर पाबंदी का दौर नहीं बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी का जमाना है। रुख भारत का करें तो 'जदीद खबर' ने तथाकथित गौरक्षकों पर जारी बहस को अपने संपादकीय का विषय बनाया है।
मोदी इसलिए चुप थे कि मुसलमान उनका वोट बैंक नहीं हैं
अखबार कहता है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकारों को भेजी अपनी एडवायजरी में लिखा है कि गौरक्षा के नाम पर किसी भी हिंसक घटना को बर्दाश्त न करें।
प्रधानमंत्री के बयानों के बाद आई इस एडवायजरी पर अखबार लिखता है कि दो साल से मुसलमानों के खिलाफ देश में गौरक्षकों ने जो बर्बरियत का बाजार गर्म कर रखा था, उस पर मोदी इसलिए चुप थे कि मुसलमान उनका वोट बैंक नहीं हैं।
अखबार की राय है कि जब प्रधानमंत्री ने महसूस किया कि गौरक्षा की ये मुहिम अब मुसलमानों से आगे बढ़ कर दलितों की गर्दन तक पहुंच गई है तो उन्होंने 80 फीसदी गौरक्षकों को फर्जी करार दे दिया है।
वहीं भारत प्रशासित कश्मीर के हालात पर 'राष्ट्रीय सहारा' का संपादकीय है- कश्मीर मसले पर संजीदगी की जरूरत। अखबार लिखता है कि कश्मीर के सभी ग्रुपों के साथ बातचीत करनी होगी, लेकिन ये शर्त जरूरी है कि पाकिस्तान के समर्थन वाले संगठन पहले हथियार डालें।
अखबार कहता है कि आज कश्मीर में कुछ गुमराह लोग 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें भी ये विश्वास दिलाना होगा कि भारत उन्हें वो सब सुविधाएं मुहैया कराएगा जो अन्य राज्यों में लोगों के पास हैं।
वहीं 'रोजनामा खबरें' ने भी यही लिखा है कि जब तक वहां की जनता को भरोसे में नहीं लिया जाएगा, वहां ऐसे ही हालात बने रहेंगे। साथ ही अखबार ने सुरक्षा व्यवस्था को चाकचौबंद करने पर जोर दिया है ताकि सीमापार से कथित 'घुसपैठ और दखलंदाजी' को रोका जा सके।