UP Politics: मथुरा से सेट होगा BJP का एजेंडा! फिर जयंत को कैसे मिलेगी यह सीट, कुछ ऐसे बन रहे हैं सियासी समीकरण
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विस्तार
भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में अयोध्या और बनारस की तरह मथुरा भी मायने रखता है। यह तीनों लोकसभा सीटें भी हैं। चूंकि भाजपा का अयोध्या और काशी के बाद अब बड़ा सियासी एजेंडा मथुरा से सेट होने की बात कही जा रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या मथुरा जैसी महत्वपूर्ण सीट भाजपा अपने गठबंधन के किसी सहयोगी दल को दे सकती है। दरसल भाजपा और राष्ट्रीय लोकदल के बीच हो रहे समझौते के कयासों में मथुरा की सीट जयंत चौधरी के हिस्से में दिए जाने की बात चल रही है। सियासी जानकारों की मानें तो अगले पांच साल में भाजपा के लिए मथुरा न सिर्फ सियासी रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि धार्मिक आस्था के बड़े केंद्र के तौर पर भाजपा सरकार यहीं फोकस कर रही है। सियासी जानकारों का मानना है कि ऐसे में मथुरा सीट आरएलडी के लिए छोड़ना भाजपा के लिए सियासी रूप से संभव नहीं दिख रहा है। हालांकि सीटों का फैसला निश्चित तौर पर बड़े मंथन के बाद ही होगा।
सियासी गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि 16 फरवरी से पहले जयंत चौधरी भाजपा के खेमे में आ सकते हैं। राष्ट्रीय लोक दल से ताल्लुक रखने वाले नेताओं की मानें तो उनकी पार्टी का यह फैसला न सिर्फ राजनीतिक रूप से फायदेमंद होगा। बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना वजूद बचाने के लिए भी यह फैसला दीर्घकालिक रूप से मुफीद होगा। सियासी जानकार भी मानते हैं, अगर राष्ट्रीय लोकदल एनडीए में शामिल होता है, तो यह एक समझदारी भरा फैसला होगा। राजनैतिक विश्लेषक सीबी मोहन कहते हैं कि 2009 में राष्ट्रीय लोकदल ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन सरकार न बनने की दशा में यूपीए के साथ शामिल हो गए। अब बीते एक दशक से राष्ट्रीय लोकदल केंद्र में सत्ता से बाहर है। वह कहते हैं जिस तरीके का माहौल है उस लिहाज से अगर राष्ट्रीय लोक दल एक बार फिर से भाजपा के साथ मिलकर सियासत में साथ जाते हैं, तो निश्चित तौर पर आरएलडी इसमें अपना सियासी नफा देख रही होगी।
हालांकि इस दौरान सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि आखिर मथुरा सीट पर क्या जयंत चौधरी की दावेदारी होगी या नहीं। वरिष्ठ पत्रकार बृजेंद्र शुक्ला कहते हैं कि आने वाले सालों में भाजपा के लिए मथुरा उतना ही महत्वपूर्ण है जैसे अयोध्या और काशी हुए। वह कहते हैं कि हिंदुत्व के लिहाज से भाजपा मथुरा को आने वाले वर्षों में सियासी कसौटी पर भी कसने जा रही है। भाजपा के बड़े रणनीतिकार अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद अब मथुरा पर पूरा फोकस कर रहे हैं। बृजेंद्र कहते हैं कि अगले कुछ वर्षों तक भाजपा की सियासी धुरी में मथुरा एक महत्वपूर्ण केंद्र होने वाला है। उस दशा में अगर मथुरा जैसी महत्वपूर्ण सीट राष्ट्रीय लोकदल को देने से पहले सियासी नफा नुकसान का आकलन भाजपा हर हालत में करेगी। उनका मानना है कि इस लोकसभा चुनाव में जितनी महत्वपूर्ण सीट बनारस और अयोध्या है, उतनी ही महत्वपूर्ण सीट भाजपा के लिए मथुरा है।
बृजेंद्र शुक्ल कहते हैं कि बीते दो लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा है। 1991 से लेकर 2019 के सिर्फ एक चुनाव 2004 का छोड़ दिया जाए, तो यह सीट भाजपा या उसके गठबंधन ने जीती है। इसमें 2009 का चुनाव जयंत चौधरी ने राष्ट्रीय लोकदल और भाजपा के साथ मिलकर लड़ा था, जिसमें जयंत चौधरी ने जीत हासिल की थी। शुक्ल कहते हैं कि मथुरा लोकसभा सीट पर तकरीबन 19 लाख मतदाता हैं। इनमें करीब साढ़े तीन लाख जाट, करीब तीन लाख ब्राह्मण-ठाकुर, करीब डेढ़ लाख एससी और इतने ही वैश्य हैं। इसके अलावा करीब सवा लाख मुस्लिम और 70 हजार के आसपास यादव मतदाता हैं। जबकि अन्य जातियों के करीब चार लाख वोटर हैं।
इन जातिगत समीकरणों के बाद भी मथुरा में लगातार 2014 और 2019 में भाजपा चुनाव जीतती आई है। वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु वाजपेई का मानना है कि अब जब सियासी गलियारों में काशी और अयोध्या के बाद मथुरा की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है, तो भाजपा इस सीट को किसी सहयोगी दल को कैसे दे सकती है। वह भी तब जब भाजपा का पूरा सियासी एजेंडा अब मथुरा से तय होने वाला है। इसलिए मथुरा की सीट राष्ट्रीय लोकदल के हिस्से में आएगी, इसकी संभावना बहुत ज्यादा नहीं दिख रही है। उनका मानना है बागपत, कैराना, सहारनपुर और बिजनौर जैसी सीटों पर सहमति बनने पर भी राष्ट्रीय लोकदल को कोई नुकसान होता नहीं दिख रहा है। सियासी जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय लोकदल एनडीए के साथ जुड़ती है, तो न सिर्फ उत्तर प्रदेश में भी सियासी हिस्सेदार बन कर अपने गठबंधन को मजबूत कर सकती है। बल्कि केंद्र में अगर दोबारा मोदी सरकार वापसी होती है, तो दिल्ली की सियासत में भी राष्ट्रीय लोकदल का बड़ा दखल हो सकता है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक इन्हीं सभी सियासी संभावनाओं को देखते हुए राष्ट्रीय लोकदल की एनडीए के साथ जाने की चर्चाएं हो रही हैं।