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...तो हस्तिनापुर का 'सिंहासन' तय करता है यूपी में सत्ता की बागडोर

Wed, 25 Jan 2017 03:28 PM IST
Updated Wed, 25 Jan 2017 03:28 PM IST
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UP election: Magic of Hastinapur constituency
महाभारत काल में सत्ता का केंद्र रहा हस्तिनापुर वर्तमान काल में भी प्रदेश की सत्ता की बागडोर तय करता है। सीधे शब्दों में कहें तो हस्तिनापुर की विधानसभा सीट ही तय करती है कि यूपी की सत्ता किसके हाथों में रहेगी और कौन सी पार्टी प्रदेश की जनता पर राज करेगी।
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आजादी के बाद हुए विधानसभा चुनावों में एकआध अपवादों को छोड़ दें तो साफ नजर आता है कि हस्तिनापुर से जिस पार्टी का नुमाइंदा जीता उसी पार्टी ने राज्य में सरकार बनाई। बीते चुनावों तक भी यह सिलसिला कायम रहा।
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हालांकि सुनने में बेशक यह बात अविश्वसनीय नजर आ रही हो लेकिन हकीकत यही है कि हस्तिनापुर से जीतने वाली पार्टी के हाथों में ही यूपी की सत्ता की बागडोर भी रहती है। सत्ता के गलियारों में इसलिए हस्तिनापुर की इस सुरक्षित सीट की काफी अहमियत मानी जाती है और सभी पार्टियां पूरी जांच परख और मोल तौल के बाद ही यहां अपने उम्‍मीदवार तय करती हैं।
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आजादी के बाद शुरूआती लंबे समय तक रहा कांग्रेस का कब्जा

UP election: Magic of Hastinapur constituency

आजादी के बाद साल 1957 में हस्तिनापुर सीट पर पहली बार विधानसभा चुनाव हुए। जिसमें कांग्रेस के बिशंभर सिंह ने सीपीआई के पीतम सिंह को 15 हजार के करीब वोटों से हराकर जीत हासिल की। इसके साथ ही कांग्रेस ने यूपी में अपनी सरकार बनाई।

साल 1962 के चुनावों में एक बार फिर कांग्रेस पार्टी के पीतम सिंह ने विपक्षी पार्टी के उम्‍मीदवार को 15 हजार से ज्यादा वोटों से हराते हुए शानदार जीत दर्ज की। इसके साथ ही कांग्रेस एक बार फिर यूपी की सत्ता पर काबिज हुई।

पांच साल बाद साल 1967 में हुए विधानसभा चुनावों में हस्तिनापुर की सीट सुरक्षित हो गई। इसके बाद कांग्रेस ने यहां से आरएल शयाक को टिकट दिया। उन्होंने भी यहां कांग्रेस का परचम बरकरार रखा और तीन हजार से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज करते हुए पहली बार विधानसभा पहुंचे। लखनऊ के सा‌थ हस्तिनापुर की जुगलबंदी इस बार भी बरकरार रही और यूपी में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार बनी।

साल 1969 में पहली बार यहां कांग्रेस का वर्चस्व टूटा और चरण सिंह के नेतृत्व वाले भारतीय क्रांति दल यानि बीकेडी ने पहली बार इस सीट पर जीत दर्ज की। बीकेडी के आशा राम इंदू ने कांग्रेस के भगवान दास को हराकर विजय हासिल की।

पहली बार बीकेडी ने तोड़ा कांग्रेस का वर्चस्व, प्रदेश में भी बनी सरकार

UP election: Magic of Hastinapur constituency

खास बात ये रही कि पहली बार कांग्रेस को भी यूपी की सत्ता से बेदखल होना पड़ा। कुछ दिन बीकेडी के चरण सिंह राज्य के मुख्यमंत्री रहे इसके बाद राज्य में सत्ता संघर्ष के बीच राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। 

1974 के चुनावों में एक बार फिर कांग्रेस ने हस्तिनापुर सीट पर वापसी की और रेवती शरण मौर्या यहां से विधायक चुने गए। इसके साथ ही यूपी की सत्ता में भी कांग्रेस की वापसी हुई और हेमवती नंदन बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस ने राज्य में अपनी सरकार बनाई। 

इमरजेंसी के बाद जेपी लहर के बीच हुए 1977 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को अपनी इस परंपरागत सीट पर भी मुंह की खानी पड़ी। खास बात ये रही कि पिछले चुनावों में इस सीट पर कांग्रेस की वापसी कराने वाले रेवती शरण मौर्या ने पाला बदलकर जनता पार्टी का दामन थाम लिया। 

पार्टी ने उन्हें उम्‍मीदवार बनाया और उन्होंने कांग्रेस उम्‍मीदवार को हराकर शानदार जीत दर्ज की। इसके साथ ही लखनऊ की सत्ता में भी बदलाव हुआ और कांग्रेस की बजाय रामनरेश यादव के नेतृत्व में जनता पार्टी ने अपनी सरकार बनाई। 

1980 में कांग्रेस ने हस्तिनापुर में वापसी की तो प्रदेश में भी बनी सरकार

UP election: Magic of Hastinapur constituency

1980 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने एक बार फिर इस सीट पर वापसी की और झग्गड़ सिंह ने जनता पार्टी के सूरनमल को चार हजार से ज्यादा वोटों से हराकर जीत दर्ज की। इसके साथ ही सूबे में कुछ दिन के राष्ट्रपति शासन के बाद एक बार फिर वीपी सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। 

1985 के चुनावों में कांग्रेस के ही हरशरण सिंह यहां से चुनाव जीते और लखनऊ की सत्ता पर भी कांग्रेस का कब्जा बरकरार रहा। हालांकि इस दौरान सूबे ने कांग्रेस की ओर से पांच से ज्यादा चेहरों ने मुख्यमंत्री के रूप में सूबे की कमान संभाली। 

1989 के चुनावों में झग्गड़ सिंह ने पाला बदलकर जनता दल का दामन थाम लिया। पार्टी ने उन्हें यहां से टिकट दिया और उन्होंने कांग्रेस के रेवती शरण मौर्या को हराकर जीत हासिल की। 

हस्तिनापुर के साथ ही लखनऊ की सत्ता में बदलाव हुआ और जनता दल के मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस को हटकार पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। 1991 और 1993 में हस्तिनापुर में विधानसभा चुनाव नहीं हुए। 

2012 में सपा के प्रभुदयाल जीते तो यूपी में भी बनी सपा सरकार

UP election: Magic of Hastinapur constituency

इसके बाद 1996 में हुए विधानसभा चुनावों में निर्दलीय के रूप में अतुल कुमार खटीक ने यहां से जीत हासिल की और यूपी की सत्ता भी निर्दलीय से हो गई। एक बार फिर राज्य को राष्ट्रपति शासन का मुंह देखना पड़ा। 

इसके बाद 2002 में राज्य में एक बार फिर विधानसभा चुनाव हुए तो हस्तिनापुर सीट पर समाजवादी पार्टी के प्रभुदयाल वाल्मिकी ने पार्टी का खाता खोलते हुए जीत दर्ज की। हालांकि अपवाद के रूप में इस बार सूबे में बसपा-भाजपा गठजोड़ के बाद मायावती के नेतृत्व में राज्य में गठबंधन की सरकार बनी। 

लेकिन एक साल बाद ही मायावती ने इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह ने जोड़ तोड़ करते हुए यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार बनाई। जिसके बाद हस्तिनापुर के साथ लखनऊ की सत्ता की जुगलबंदी एक बार फिर चरितार्थ हो गई। 

साल 2007 के चुनावों में मायावती के नेतृत्व में बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई तो हस्तिनापुर से भी बसपा के योगेश वर्मा कांग्रेस के गोपाल काली को हराकर पहली बार विधायक बने। साल 2012 में भी हस्तिनापुर का जलवा कायम रहा और यहां से सपा के प्रभुदयाल वाल्मिकी एक बार फिर जीते तो प्रदेश में भी अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा की सरकार बनी। 

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