राजकिशोरः अब भी जिन्हें पढ़ सकते हैं
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राजकिशोर जी मुझ जैसे लोगों के लिए ‘ओपन स्कूल’ थे। हिंदुत्व, भारतीय इस्लाम, जाति की राजनीति और इस देश के इतिहास की तार्किक समझ जैसी उनमें थी, बहुत कम लोगों में मैंने देखी है। साथ ही वे इस गहन समझ को आसान भाषा में लिखकर बांटने के हुनर में भी माहिर थे।
ज्यादा दिन नहीं बीते जब मैंने अपने सहकर्मी रहे उनके दिवंगत बेटे विवेक से उनका नंबर मांगा था, राजकिशोर जी से परिचय रहा था लेकिन कोई घनिष्ठता नहीं थी, ये जरूर देखा था कि वे किसी तरह की लगावट-बनावट में यकीन नहीं रखते थे। लोग उनके ज्ञान से या फिर बेलौस अंदाज से खौफ खाते थे। हम तो ख़ैर बच्चे थे उनके आगे लेकिन मुझे लगा कि उनकी मेधा और लेखनी के दोबारा इस्तेमाल का ये सही समय है और उनके पास भी वक्त होगा।
मैंने फोन किया, परिचय दिया तो उन्होंने कहा कि “तुम्हारे कुछ लेख पढ़े हैं, कुछ लोगों ने कहा था कि अच्छा लिखते हो” लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि उनकी राय क्या थी मगर पता चला कि आज भी बौद्धक सक्रियता कम नहीं हुई है, इतना पढ़ते हैं कि मेरा नंबर भी आ गया।
हर बात की तह में जाना और उसकी सचाई समझने की कोशिश करना उनकी आदत थी। जब मैंने कहा कि आपको पढ़कर बड़ा हुआ हूं तो तपाक से पूछा- ‘क्या पढ़ा? क्या याद है? क्यों अच्छा लगा?’ जितना याद आया बता दिया, मैंने पिछली मुलाकातों का हवाला दिया तो बोले- ‘याद है’। फिर सजग राजकिशोर जी ने पूछा- ‘फोन कैसे किया?’ मैंने कहा कि मैं चाहता हूं कि आप बीबीसी हिन्दी के लिए लिखें। फौरन जवाब मिला- ‘मैं अपनी मर्जी से लिखता हूं, किसी के कहने पर नहीं’, उनके लहजे में अहंकार नहीं, सोच की स्पष्टता थी जो उनकी बेहद सादा लेकिन गजब पैनी लेखनी में बार-बार दिखती है। हर बार हर विषय पर।
सबसे बढ़कर जो उन्होंने लिखा-समझा और कहा, उसे जिया भी। आज उनका अंतिम संस्कार बिना किसी आडंबर के निगम बोध घाट पर सीएनजी क्रीमेटोरियम में कर दिया गया।
उनके बेटे और हमारे पूर्व युवा सहकर्मी विवेक की अचानक मौत के बाद मैं और राजेश जोशी उनके घर पहुंचे तो वे अपने इकलौते जवान बेटे का अंतिम संस्कार करके लौटे थे, गहरे दुख का माहौल था लेकिन सब शांत थे, कोई रोना धोना तो क्या आंसू के निशान भी नहीं थे। राजकिशोर जी ने अपने बेटे के जर्नलिस्टिक कामों को याद किया, उसकी सजगता और मेहनत की सहज तारीफ की। फिर देश समाज की बातें करने लगे, उनकी ये सहजता हमें असहज कर रही थी।
हम उनके संयम और मौत की अनिवार्यता-अपरिहार्यता को स्वीकार पाने के उनके सामर्थ्य को दुखी लेकिन चकित भाव से देख रहे थे। एक बार फिर लगा कि वे बड़े आदमी हैं, आदर और शोक का भाव था लेकिन फिर सीखा कि अपना दुख अपने लिए होता है, दुख दिखाने से दुख की गरिमा नष्ट होती है। लेकिन दुख प्रकट न करना, रो न पाना, गहरे सदमे को अकेले बहादुरी से झेलने की कोशिश ने उन्हें भीतर से खोद दिया।
कुछ ही हफ्तो के भीतर विवेक और राजकिशोर जी को खो देने का दुख विमला जी और अस्मिता को झेलना है। दो-तीन बार की बात और एकमात्र मुलाकात में लगा कि अस्मिता समझदार और बहादुर है। लेकिन ये दोहरा सदमा किसी समझदारी-बहादुरी से परे है।
जिन्होंने राजकिशोर को नहीं पढ़ा है जरूर पढ़ें जिन्होंने पढ़ा है, दोबारा पढ़ें। राजकिशोर काफी दर्ज कर गए हैं जिससे उन्हें और इस देश को समझा जा सके।
सादर श्रद्धांजलि