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शेल्टर होम मामले में सीबीआई की लापरवाही पर सुनवाई करेगी शीर्ष अदालत
Fri, 29 Mar 2019 03:18 AM IST
Avdhesh Kumar
एजेंसी, नई दिल्ली
एजेंसी, नई दिल्ली
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Fri, 29 Mar 2019 03:18 AM IST
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Muzaffarpur Shelter home case
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सुप्रीम कोर्ट बृहस्पतिवार को उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया, जिसमें मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के चर्चित कांड की जांच के दौरान सीबीआई पर लापरवाही बरतने और असली आरोपियों को बचाने की कोशिश का आरोप लगाया गया है। शीर्ष अदालत इस मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद करेगी।
बता दें कि बिहार के मुजफ्फरपुर में एक एनजीओ की तरफ से चलाए जा रहे शेल्टर होम में कई लड़कियों के साथ दुष्कर्म और यौन शोषण का मामला सामने आया था। यह मामला टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की रिपोर्ट के बाद चर्चित हुआ था। हंगामा बढ़ने पर इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई थी, जिसने मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर समेत 21 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी।
इस मामले में बृहस्पतिवार को तत्काल सुनवाई की अपील वाली एक और याचिका बृहस्पतिवार को जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एसए नजीर की पीठ के सामने पेश की गई। एडवोकेट फौजिया शकील के जरिए दाखिल याचिका में सीबीआई को इस मामले की गहन, उचित और वैज्ञानिक तरीके से जांच करने के निर्देश देने की मांग की गई। याचिका में कहा गया कि पीड़िताओं के बयानों से स्पष्ट है कि ब्रजेश ठाकुर की तरफ से बड़े पैमाने पर वेश्यावृत्ति गिरोह चलाया जा रहा था।
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याचिका में आगे आरोप लगाया गया कि चार्जशीट की कमियों से यह स्पष्ट है कि सीबीआई असली दोषियों को बचाने की कोशिश कर रही है और इस अपराध में शामिल बाहरी लोगों व ठाकुर के दोस्तों के बारे में पीड़िताओं की तरफ से दिए गए सुरागों की जानबूझकर जांच करने से बच रही है।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि सीबीआई को दिए बयानों में पीड़िताओं ने कहा था कि उन्हें होटलों में भेजा जाता था और उनके साथ शेल्टर होम में आने वाले ठाकुर के दोस्तों व बाहरी लोगों ने भी दुष्कर्म किया था। इतने सारे गंभीर आरोपों के खुलासे के बावजूद सीबीआई ने चार्जशीट में आरोपियों पर दुष्कर्म, हत्या, गैंगरेप, वेश्यावृत्ति गिरोह और मानव तस्करी जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ी उचित धाराएं नहीं लगाई गई हैं।
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बता दें कि बिहार के मुजफ्फरपुर में एक एनजीओ की तरफ से चलाए जा रहे शेल्टर होम में कई लड़कियों के साथ दुष्कर्म और यौन शोषण का मामला सामने आया था। यह मामला टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की रिपोर्ट के बाद चर्चित हुआ था। हंगामा बढ़ने पर इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई थी, जिसने मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर समेत 21 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी।
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इस मामले में बृहस्पतिवार को तत्काल सुनवाई की अपील वाली एक और याचिका बृहस्पतिवार को जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एसए नजीर की पीठ के सामने पेश की गई। एडवोकेट फौजिया शकील के जरिए दाखिल याचिका में सीबीआई को इस मामले की गहन, उचित और वैज्ञानिक तरीके से जांच करने के निर्देश देने की मांग की गई। याचिका में कहा गया कि पीड़िताओं के बयानों से स्पष्ट है कि ब्रजेश ठाकुर की तरफ से बड़े पैमाने पर वेश्यावृत्ति गिरोह चलाया जा रहा था।
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याचिका में आगे आरोप लगाया गया कि चार्जशीट की कमियों से यह स्पष्ट है कि सीबीआई असली दोषियों को बचाने की कोशिश कर रही है और इस अपराध में शामिल बाहरी लोगों व ठाकुर के दोस्तों के बारे में पीड़िताओं की तरफ से दिए गए सुरागों की जानबूझकर जांच करने से बच रही है।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि सीबीआई को दिए बयानों में पीड़िताओं ने कहा था कि उन्हें होटलों में भेजा जाता था और उनके साथ शेल्टर होम में आने वाले ठाकुर के दोस्तों व बाहरी लोगों ने भी दुष्कर्म किया था। इतने सारे गंभीर आरोपों के खुलासे के बावजूद सीबीआई ने चार्जशीट में आरोपियों पर दुष्कर्म, हत्या, गैंगरेप, वेश्यावृत्ति गिरोह और मानव तस्करी जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ी उचित धाराएं नहीं लगाई गई हैं।
वित्त विधेयक में हस्तक्षेप नहीं कर सकती सुप्रीम कोर्ट : केंद्र सरकार
केंद्र सरकार ने बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वित्त विधेयक, 2017 को लोकसभा स्पीकर की तरफ से धन विधेयक के तौर पर स्वीकार किया गया था और अदालत इस निर्णय का न्यायिक पुनरीक्षण नहीं कर सकती है। केंद्र सरकार की तरफ से चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सामने पेश अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि स्पीकर की तरफ से किसी विधेयक को धन विधेयक की मान्यता देने को लेकर अदालत सवाल नहीं कर सकती और यह एक सुव्यवस्थित कानून है।
अटार्नी जनरल ने कहा कि वित्त विधेयक, 2017 पर राज्यसभा की आपत्तियों के बावजूद लोकसभा ने इसे धन विधेयक के तौर पर पारित किया था और स्पीकर ने इसके धन विधेयक होने को प्रमाणित किया था, जिस पर अदालत सवाल नहीं उठा सकता। अटार्नी जनरल ने कहा, यह पहलू संविधान में न्यायपालिका और विधायिका की शक्तियों के बंटवारे के व्यापक मानक के अनुरूप है। ऐसे ही संसद भी न्यायपालिका के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। संविधान पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को तय की है।
अटार्नी जनरल ने कहा कि वित्त विधेयक, 2017 पर राज्यसभा की आपत्तियों के बावजूद लोकसभा ने इसे धन विधेयक के तौर पर पारित किया था और स्पीकर ने इसके धन विधेयक होने को प्रमाणित किया था, जिस पर अदालत सवाल नहीं उठा सकता। अटार्नी जनरल ने कहा, यह पहलू संविधान में न्यायपालिका और विधायिका की शक्तियों के बंटवारे के व्यापक मानक के अनुरूप है। ऐसे ही संसद भी न्यायपालिका के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। संविधान पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को तय की है।
असम में विदेशी घोषित करने के मुद्दे पर फैसला सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि असम के विदेशी ट्रिब्यूनल के निर्णय को चुनौती देने के लिए लोगों को अपील का अधिकार देने पर विधायिका को निर्णय लेना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के लिए ट्रिब्यूनल का निर्णय एक तरह से कार्यकारी आदेश है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में दाखिल करीब 16 याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित कर लिया, जिनमें दावा किया गया था कि अपील के अधिकार की अनुपस्थिति संविधान के तहत दिए गए मूल अधिकारों का उल्लंघन है।
शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील संजय हेगडे को कहा कि विदेशी घोषित व्यक्ति अनुच्छेद 226 के तहत भारतीय नागरिक घोषित करने के लिए वाद दाखिल कर राहत पा सकता है। चीफ जस्टिस के साथ जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की मौजूदगी वाली पीठ ने कहा, आप सुप्रीम कोर्ट को उनके लिए अपीलीय मंच की भूमिका निभाने के लिए नहीं कह सकते।
शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील संजय हेगडे को कहा कि विदेशी घोषित व्यक्ति अनुच्छेद 226 के तहत भारतीय नागरिक घोषित करने के लिए वाद दाखिल कर राहत पा सकता है। चीफ जस्टिस के साथ जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की मौजूदगी वाली पीठ ने कहा, आप सुप्रीम कोर्ट को उनके लिए अपीलीय मंच की भूमिका निभाने के लिए नहीं कह सकते।