आपातकाल जी आये हैं! तुमसे मिले क्या?
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बहुचर्चित फिल्म मिस्टर इंडिया में जो जादुई किरदार ‘मिस्टर इंडिया’ था, 2014 के बाद उसी किरदार में अपना ‘आपातकाल’ है। सच पूछिये तो आज आजादी का सबसे ज्यादा फायदा ‘आपातकाल’ उठा रहा है। जब मन हुआ आता-जाता रहता है, लेकिन सबको दिखता नहीं है। चुपके से आता है, एकदम चुपके से...कोई देख न ले।
यूं समझिये कि आया, एकाध दिन रुका, चैनलों के स्टूडियो में बैठा, चाय-साय पिया और चलता बना। ऐसा लगता है कि इस देश उसका कोई सगा है, जिसका हाल-खबर लेने आता है। मुझे तो कभी मिलता नहीं, वरना मैं जरुर पूछता कि ‘भई, ये क्या आना हुआ कि दिखते ही नहीं! बात भी नहीं करते, चले जाते हो? वो तो भला हो इन दिव्यदृष्टि धारी तथाकथित बुद्धिजीवियों का जो तुम्हें देख लेते हैं, तुमसे बतिया लेते हैं, फिर अखबार और चैनल के माध्यम से देश की हम जैसी अनपढ़ जनता को समझाते हैं कि तुम आये थे और उनसे मिले थे!'
तुम एकबार मुझसे मिलते न ‘आपातकाल भाई’, तो मैं ये जरुर पूछता कि किससे डरते हो, जो इतना छुप-छुप के आते हो? क्या मोदी से डरते हो, डरपोक हो? शायद मोदी से ही डरते हो, तभी तो केवल मोदी विरोधियों से मिलकर चले जाते हो! कभी देश जनता से भी मिल लिया करो यार, वो भी अपने ही लोग हैं।
पिछली बार जब तुम आये थे न, तब तुम्हारे टीवी और अखबार वाले दोस्त लोग खूब जलसा जमाए तुम्हारे आने का। चारों तरफ शोर किये कि ‘आपातकाल आ गया, आपातकाल आ गया’। जनता ने जब लबालब भरे जिज्ञासा से पूछना शुरू किया, 'कहां है, कहां है......? तुम फिर भाग गये! ऐसे भी क्या भागना भाई? जब आते हो तो थोड़े दिन रुक जाया करो। जरा याद तो करो, सन 1975 में कैसे आये थे और क्या खूब रुके थे! छक के खाए, अघाए और जेल-जेल जाकर सबसे मिले-जुले भी। जो नहीं मिलना चाह रहा था, उससे भी जबरन मिले। क्या अपनापन था उसबार तुम्हारे आने में? देश का बच्चा-बच्चा, पढ़ाकू-अनपढ़ सभी जान गये थे कि ‘भाई आपातकाल जी’ आये हैं! उसबार जो आये थे, वैसा फिर कभी नहीं आये।
लगता है तुम भी बुढा गये हो आपातकाल भाई, अब वो सन् पचहत्तर वाले तेवर तो बिलकुल न रहे! कब आते हो, कब जाते हो, किधर से आते हो, किधर गुजर जाते हो....कुछ पता नहीं चलता। अपने नाम की तो इज्जत रख लो यार...थोड़ा ढंग से आया करो। कम से कम दिखा तो करो। एकदम दिखते ही नहीं! अब देखो न, अगस्त की इस उतरती गर्मी में आने की क्या जरूरत थी? थोड़ा रुककर आ जाते, हल्की ठंड का इंतजार भी न कर सकते थे? मुंह उठाये और चले आये! हमें कैसे पता चलता कि आप आये हो! वो तो शुकर हो आपके टीवी और अखबार वाले साथियों का, जो बता रहे हैं कि आप फिर आये हो।
टीवी वाले दोस्तों को झूठा कहते फिरते हैं
‘आपातकाल महराज’ आप जबसे दिखना बंद किये न, कोई नहीं मानता है कि आप आये हो। सब आपके अखबार और टीवी वाले दोस्तों को झूठा कहते फिरते हैं। कहें भी क्यों न, ऐसे लंज-पंज, अस्त-पस्त ढंग से आओगे तो लोग और क्या सोचेंगे? इंदिरा गांधी के टाइम तो बहुत जोर से आते थे!
अब और क्या कहूं, जब आपके टीवी और अखबार वाले कुछ दोस्त ही आपकी इज्जत पर बट्टा लगा रहे हैं। ढ़ोल बजा-बजाकर बताते हैं कि ‘आपातकाल आ गया, आपातकाल आ गया’....लेकिन जब जनता कहती है कि एकबार मिलाओ......तो नहीं मिलाते! खुद मिल लेते हैं और लोगों को नहीं मिलने देते हैं। ईमानदारी से बताना भाई, ये तुम्हारे अखबार और टीवी वाले साथी जो समय-समय पर तुम्हारे आने की मुनादी करते हैं, कहीं तुम्हारे नाम की दलाली तो नहीं कर रहे?
मेरी बात मान लो, ये सब आपको बदनाम कर देंगे। कोई नहीं डरेगा आपसे। वो कहावत सुनी हैं न, भेड़िया आया, भेड़िया आया.....यही हाल बना रखा है आपका। तुम जानते भी हो कि ये लोग तुम्हारा नाम लेकर क्या-क्या कहते रहते हैं? दूकान लगा रखे हैं तुम्हारे नाम की। बेच डालेंगे तुम्हारी आंख, नाक, कान, अंतड़ी-बतड़ी सब, फिर न कहना कि बताया नहीं। तुम बेखबर हो इन सब बातों से, बिलकुल बेपरवाह....
यहां अखबारों में एक-एक पेज का लेख लिखकर बताया जा रहा है कि 'आपातकाल आ गया है।' पर कोई मानने को तैयार नहीं, इसलिए कई लोग मिलकर लिख रहे हैं कि 'आपातकाल आ गया है।' कुछ लोग टीवी पर बैठकर ही घण्टों यही समझाने में पसीने बहा रहे हैं कि 'आपातकाल आ गया है।' फिर भी कोई मानने को तैयार नहीं! सब अनपढ़ लोग हैं! जरा 'पढ़-लिख लेते' तो महसूस कर पाते कि 'आपातकाल आ गया है'!
हमने तो सुना था कि जब इंदिरा जी ने तुम्हे बुलाया था तब अखबारों की जुबान पर भी ताला लगा था? यहां तो अखबार और टीवी ही चीख-चीखकर समझाने में लगा है कि 'आपातकाल आ गया है।' इतना कंफर्टेबल आपातकाल? अब इससे ज्यादा बेइज्जती तुम्हारी और क्या होगी, जब तुम्हारा नाम सुनते ही लोग पहले लंबी सांस लेते हैं। फिर अलसाए मन से कहते हैं, 'जरा एक बढ़िया कटिंग चाय लाना और एक सैंडविच भी हो सके तो! एक कप चाय पीकर फिर चेक करते हैं कहां आया है आपातकाल!