फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   'The Yogi Sarkar treats meat shops as bad, give a another job'

'योगी सरकार मीट की दुकानों को बुरा मानती है, तो दूसरा काम दे दे'

Thu, 30 Mar 2017 12:22 PM IST
विकास पांडे बीबीसी संवाददाता, इलाहाबाद से,
विकास पांडे बीबीसी संवाददाता, इलाहाबाद से, Updated Thu, 30 Mar 2017 12:22 PM IST
विज्ञापन
'The Yogi Sarkar treats meat shops as bad, give a another job'
उत्तर प्रदेश में प्रशासन के अवैध बूचड़खानों को बंद करने की कोशिश के बाद अब मांस व्यवसायियों और कसाइयों के पास ना तो काम है ना ही पैसा। 52 साल के शकील अहमद कहते हैं, "मेरी दुकान दो हफ्ते पहले बंद हो गई और मेरे पास तब से ही पैसा नहीं है। मैं नहीं जानता कि मैं अपने बच्चों और बूढ़े मां-पिता के कहां से खाना लाउंगा।"
विज्ञापन


शकील पूछते हैं, "क्या ये इसलिए कि मैं मुसलमान हूं या फिर इसलिए कि मैं मांस का काम करता हूं?" वो प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से नाराज हैं। वैसे योगी अवैध बूचड़खानों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि हिंदू धर्म में पवित्र माने जाने वाली गाय की हत्या और गोमांस का भी विरोध करते हैं।
विज्ञापन



बीते महीने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में योगी की पार्टी बीजेपी के जीतने के बाद राज्य में प्रशासन ने मीट की कई दुकानें बंद की हैं। मटन और चिकन बेचने वाली छोटी दुकानों को भी बंद किया जा रहा है। शकील कहते हैं कि वो बीफ बेचने वाले दुकानों को राज्य सरकार बंद करना चाहती है क्योंकि "ये बीजेपी के चुनावी वायदों में से एक था।"
विज्ञापन
विज्ञापन

नगर निगम कर्मचारी नहीं कर रहे लाइसेंस रिन्यू

'The Yogi Sarkar treats meat shops as bad, give a another job'
वो पूछते हैं, "लेकिन बकरे और भेड़ का मांस बेचने वाले छोटे दुकानदारों को क्यों परेशान किया जा रहा है? मेरे जैसे कई कसाई इस काम में दशकों से हैं और इसी से अपना घर चलाते हैं। हमें कुछ और आता ही नहीं।" वो कहते हैं कि हाल में नगर निगम के कर्मचारियों ने उनका लाइसेंस रिन्यू करने से मना कर दिया। वो बताते हैं, "वो चाहते थे कि कचरा फेंकने के लिए एक वेस्ट डिस्पोजल यूनिट बनाऊं, लेकिन मेरे पास इसके लिए पैसा नहीं है।"


अहमद के परिवार में कुल 10 सदस्य हैं और वो शहर के घनी आबादी वाली जगह पर रहते हैं जहां मुसलमान कुरैशी समुदाय के काफी लोग हैं। शकील की मां फातिमा बेगम बताती हैं कि इस इलाके में रहले वाले समुदाय के लोग पारंपरिक तौर पर मीट व्यवसाय करते हैं। वो कहती है, "इस इलाके में रहने वाले पुरुषों को कोई दूसरी काम नहीं आता। हम पहले से ही गरीब हैं और अब हमें ये भी नहीं पता कि खाना कहां से आएगा।

वो लोग हमें मार ही डालें तो अच्छा।" फातिमा कहती हैं कि वो अब बूढ़ी हो गई हैं और उन्हें इस वजह से दवाईयां लेनी पड़ती हैं। वो कहती है, "मेरी दवाईयां भी खत्म हो रही हैं और मैंने अभी ये बात अपने बेटे को नहीं बताई है। वो पहले ही परेशान है, मैं उसकी परेशानी बढ़ाना नहीं चाहती।"


शकील की पत्नी हुस्ना बेगम को अपने बच्चों की चिंता सता रही है, "मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चों को अच्छी तालीम मिले और वो गरीब बन कर ना रहें। अगर सरकार को लगता है की मीट की दुकानें बुरी हैं तो वो हमें कोई दूसरा काम दे दें।" वो पूछती हैं, "क्या अपने बच्चों की पढ़ाई के बारे में सोचना गलत हैं? "

'मैं डरा हुआ हूं'

'The Yogi Sarkar treats meat shops as bad, give a another job'
शकील के घर से थोड़ी दूरी पर रहते हैं मोहम्मद शरीक जिन्होंने अपनी दुकान बंद कर दी है। वो कहते हैं, "मेरे पास दुकान चलाने के लिए जरूरी लाइसेंस है लेकिन मुझे डर है कि दक्षिणपंथी समूह हमला कर सकते हैं।" शरीक का डरना बेबुनियाद नहीं है। मीडिया में छपी खबरों के अनुसार बीते दो हफ्तों में राज्य में कई मीट की दुकानों पर हमले हुए हैं। शरीक मुझे अपने घर ले गए और उन्होंने मुझसे पूछा, "जरा मेरे घर पर नजर डालिए। मेरा घर पहले ही टूटा-फूटा है।


मुझे दस लोगों का पेट पालना है। हमारी कमाई का एकमात्र जरिया था मीट बेचना, इसे बंद करना क्या सही है?" उनके भाई पी कुरैशी और घर के अन्य सदस्य भी बातचीत में हिस्सा लेने के लिए आगे आने लगे। सभी को अपने भविष्य की चिंता है। कुरैशी कहते हैं, "मैं उम्मीद करता हूं और प्रार्थना करता हूं कि हमारे मुख्यमंत्री हमारी समस्याओं को समझें और लोगों को अपने नाम का गलत इस्तेमाल ना करने दें। हमें पता कि आधिकारिक तौर पर बकरे और भेड़ का मीट बेचना गैर-कानूनी नहीं है, लेकिन फिर भी हम डरे हुए हैं। " इस इलाके के हर घर की कहानी कुछ ऐसी ही है।

अब्दुल कुरैशी अपने साइकिल रिक्शा में जानवरों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं। वो कहते हैं, "मीट पर बैन लगाना कहां तक सही है, हिंदू भी तो मीट खाते हैं?" अब्दुल कुरैशी कहते हैं, "इस बाजार में आने वाले अधिकतर ग्राहक हिंदू हैं। भारतीय सेना के लोग भी हमारी दुकानों से मीट खरीदने आते हैं। मुझे नहीं समझ आता कि खाने के एक सामान पर बैन लगाने से कैसे साबित होता है कि कोई कम तो कोई ज्यादा धार्मिक है।"

'केवल मुसलमान नहीं हैं प्रभावित''

'The Yogi Sarkar treats meat shops as bad, give a another job'
यहां के समुदाय के नेता गुलजार कुरैशी बताते हैं, "लोग ये नहीं समझते कि ये कोई मुसलमानों की समस्या नहीं है। अधिकतर लोग जो बकरे या भेड़ पालते हैं वो हिंदू हैं।" वो कहते हैं, "मैं ऐसे कई हिंदुओं को जानता हूं जो अपने जानवर बेचने के लिए अपने गांवों से यहां आए थे और अब फंस गए हैं।" ऐसे ही एक व्यक्ति हैं चुन्नी लाल। चुन्नी लाल कहते हैं, "मेरे पास अपनी पांच बकरियों को चारा खिलाने के लिए पैसा नहीं हैं।

लेकिन अब कोई इन्हें खरीदना नहीं चाहता।" गुलजार कुरैशी कहते हैं जो लोग समझते हैं कि मीट व्यवसाय पर उग्र रवैए से केवल कसाई और बूचड़खानों के मालिकों पर ही असर हुआ है, वो गलत हैं। वो कहते हैं, "पशु पालने वाले, जानवर खरीदने वाले मिडलमैन और कसाई सभी इससे प्रभावित हैं।


जानवरों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाले रिक्शा और चमड़े के काम में लगे लोगों के पास भी आज काम नहीं है।" वो कहते हैं, "हम वो चकमती सड़कें और स्कूल नहीं मांग रहे। हमें वो थोड़ी ही कमाई करने दें जो हम अपने बच्चों के लिए करते हैं। मुझे लगता है एक नागरिक के तौर पर अपनी सरकार से इतने की उम्मीद तो की जा सकती है।"
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed