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राम मंदिर पर नरम हुए संघ व विहिप के सुर, कानून बनाने से हाथ खींचे

Sat, 22 Dec 2018 05:21 AM IST
गौरव द्विवेदी शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली
शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव द्विवेदी Updated Sat, 22 Dec 2018 05:21 AM IST
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The RSS and the VHP tunes were soft on Ram Mandir
फाइल फोटो

साल के अंत तक राम जन्मभूमि मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश लाने की डेडलाइन सरकार को देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस मुद्दे पर अपने सुर नरम कर लिए हैं। अब संघ परिवार के सदस्य कानून बनाने की जगह अदालत के फैसले की प्रतीक्षा करने पर जोर दे रहे हैं। संघ के वरिष्ठ अधिकारी इंद्रेश कुमार ने शुक्रवार को कहा कि अभी हमने राम मंदिर निर्माण के लिए कोई टाइम टेबल तय नहीं किया है। पहले न्याय की प्रक्रिया तो तय हो जाए, टाइम टेबल भी तय हो जाएगा।

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सुप्रीम कोर्ट को इस मामले की सुनवाई शुरू करने और फैसला देने में देरी नहीं करनी चाहिए। इससे पहले संघ और विश्व हिंदू परिषद ने सरकार के लिए 2018 के अंत तक की समय सीमा तय की थी जिससे पहले ही उसे अध्यादेश लाकर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करना था। विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने 18 नवंबर को दिल्ली में आयोजित धर्म संसद के बाद यह चेतावनी दी थी।
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यही नहीं, 25 नवंबर को देश भर में आयोजित रैलियों के जरिए संघ के शीर्ष नेतृत्व ने भी मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की मांग सरकार से की थी। भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा था कि मंदिर निर्माण ‘किसी भी कीमत पर होगा।’ वहीं, एक और भाजपा सांसद राकेश सिन्हा ने कानून बनाने के लिए राज्य सभा में प्राइवेट मेंबर बिल लाने की घोषणा की थी। लेकिन सरकार ने अध्यादेश लाने या कानून बनाने से साफ इनकार कर दिया है। यही वजह है राकेश सिन्हा भी प्राइवेट मेंबर बिल नहीं ला रहे हैं।
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वहीं, संघ के सुर भी बदल गए हैं। 27 दिसंबर को आंतरिक सुरक्षा पर आयोजित एक कांग्रेस पर बात करते हुए इंद्रेश कुमार ने कहा कि मंदिर निर्माण पर अभी कुछ भी तय नहीं हुआ है। कुछ होते ही आपको बता देंगे। संघ और विहिप के शीर्ष नेतृत्व की डेडलाइन के बावजूद कानून बनाने पर सरकार के इनकार पर पूछने पर उन्होंने कहा कि सरकार ठीक कह रही है और विहिप भी।


कदम पीछे खींचने की वजह 

पांच राज्यों में भाजपा के विधान सभा चुनाव हारने की वजह का विश्लेषण करने पर संघ ने पाया कि राम मंदिर मुद्दा वोट पाने के लिए मुफीद नहीं है। 35 साल से कम उम्र के मतदाताओं ने 1990-92 वाला राम मंदिर आंदोलन नहीं देखा है। इसीलिए, उनके बीच इस मुद्दे का असर नहीं है। 

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