टेल्गो ट्रेन में सफर करने का सपना रह गया अधूरा, रेलवे को नहीं भायी स्पेन की यह रेलगाड़ी
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भारतीय रेलवे को स्पेन की टेल्गो ट्रेन रास नहीं आयी। देश में इस ट्रेन का पिछले तीन महीने से ट्रायल रन चल रहा था। रेल मंत्रालय के मुताबिक ये ट्रायल रन सफल भी रहा। इसके साथ ही इसका रखरखाव महंगा है और इसके लिए यहां स्टेशनों में बदलाव करने पड़ेंगे।
कुल मिलाकर ये महंगा सौदा ही साबित होने वाला है। इस गाड़ी के सभी सात कोच वापस स्पेन रवाना करा दिए गए हैं। रेलवे की एक्सपर्ट टीम ने इस ट्रेन की स्पीड तो अधिक मानी है लेकिन भारत के लिए इसका संचालन इकनॉमिकली सही नहीं माना है।
यहां बता दें कि टेल्गो ट्रेन के तीन फेज में ट्रायल हुए थे। पहला ट्रायल रन बरेली-मुरादाबाद सेक्शन में हुआ। दूसरा मथुरा-पलवल सेक्शन में और आखिरी दिल्ली-मुंबई के बीच। रेल अधिकारियों की मानें तो 150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार पर टेल्गो ट्रेन चली तो दिल्ली-मुंबई के बीच चार घंटे की बचत हुई थी।
जब यह ट्रेन 130 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार पर चली तो तीन घंटे की बचत हुई थी। रेलवे के मौजूदा आधारभूत सुविधाओं के हिसाब से इससे अच्छे नतीजे कोई और ट्रेन नहीं दे सकती थी, लेकिन इसे सफल मानने के बाद भी टेल्गो मौजूदा फॉर्म में नहीं चल सकती है।
रेलवे अधिकारियों ने इसके पीछे कई वजहें गिनाई हैं
रेलवे अधिकारियों ने इसके पीछे कई वजहें गिनाई हैं। ट्रेन की फ्लोर हाइट नीचे है जिसकी वजह से प्लेटफार्म पर चढ़ते-उतरते समय यात्रियों को परेशानी हो सकती है। इसकी चौड़ाई भी भारतीय ट्रेनों के मुकाबले कम है।
लंबाई भी रेलवे की राजधानी ट्रेन के मुकाबले कम बताई गई है। इसके अलावा छोटे और एल्मुनियम के डिब्बे, जिनको भारतीय रेलवे ने व्यवहारिक नहीं माना है। इन डिब्बों में बैठने की क्षमता 32, स्लीपर सीट 22 है, जबकि भारतीय ट्रेनों में बैठने की क्षमता 75 सीट और स्लीपर सीट 72।
टेल्गो के एक डिब्बे की (जो काफी छोटा है) लागत सात से 10 करोड़ रुपये, जबकि भारतीय डिब्बे की लागत भी 10 करोड़ रुपये ही है। रेलवे के टेल्गो वापसी के फैसले से उन लोगों को आघात पहुंचा है, जिन्होंने इसमें सफर करने का सपना संजोया था।