BJP का साथ छोड़कर TDP को होगा ये फायदा, बढ़ सकती है अब पीएम मोदी की मुश्किलें
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शिवसेना के बाद आंध्र प्रदेश की तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) ने भी एनडीए को सियासी झटका दे दिया है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू भाजपा से अलग हटकर राष्ट्रीय स्तर पर उसकी मुश्किलें बढ़ाने के लिए दोबारा से तीसरे मोर्चे के गठन में भूमिका निभा सकते हैं।
आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा ना देने पर भाजपा से अलग नायडू लोकसभा और विधानसभा का अगला चुनाव अकेले अपने दम पर लड़ेंगे। अपनी आगे की रणनीति को अंजाम देने के लिए नायडू ने इससे पहले आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में अपने सांसदों की अहम बैठक बुलाई थी।
टीडीपी सांसद टीजी वेंकटेश ने भाजपा के खिलाफ युद्ध का ऐलान करते हुए पहले ही अमर उजाला से कहा था कि रविवार को होने वाली सांसदों की बैठक में चंद्र बाबू नायडू को केंद्र सरकार में शामिल टीडीपी मंत्रियों के त्यागपत्र, सांसदों के इस्तीफे और राजग से टीडीपी के अलग होने सरीखे तीन मुद्दों में से एक पर फैसला करना है। जिसके बाद बृहस्पतिवार को टीडीपी के दोनों मंत्री अशोक गजपति राजू और वाईएस चौधरी ने अपना इस्तीफा दे दिया है।
इससे यह साफ है कि भाजपा आलाकमान टीडीपी को ज्यादा भाव देने के मूड में नहीं दिखी। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चंद्रबाबू की बयानबाजी भी रास नहीं आई।
हालांकि भाजपा ने आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी से भी अंदर खाने हाथ मिला रखा है। वह अगला चुनाव टीडीपी के बजाय जगन के साथ मिलकर लड़ने के मूड में है।
टीडीपी की भाजपा से दूरी बनाने के लिए शायद यह भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। वैसे तेदपा ने केंद्र पर राज्य की अनदेखी का आरोप लगाया है। तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पहले ही आंध्र भाजपा नेताओं की बैठक कर उन्हें जमीन पर पार्टी को मजबूत बनाने का निर्देश दिया था।
आंध्र सरकार से भाजपा विधायकों के इस्तीफे के बाद दोनों पार्टियों की रणनीति से स्पष्ट है कि चंद्र बाबू भी जल्द ही नई राह पकड़ सकते हैं। क्योंकि दोनों दलों की ओर से तल्लख बयानबाजी का दौर तेज है। टीडीपी के एक शीर्ष नेता के मुताबिक भाजपा की ओर से किसी नेता ने भी वर्तमान सियासी हालातों पर मोदी की मुलाकात से पहले नायडू से चर्चा नहीं की थी।
राष्ट्रीय स्तर पर पहले भी बड़ी भूमिका निभा चुके हैं नायडू
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू वैसे तो खांटी रूप से गैर कांग्रेस की राजनीति करते हैं। यूनाईटेड फ्रंट की सरकार से लेकर केंद्र की अटल बिहारी वाजपेई की सरकार तक में वे अहम भूमिका निभा चुके हैं।
उनके करीबियों के अनुसार मुस्लिम के रूप में अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाने की सलाह नायडू की ही थी। परदे के पिछे नायडू भाजपा के अन्य सहयोगी दलों के संपर्क में भी थे। भाजपा से अलग होते ही अब उनकी तैयारी भगवा परिवार को बड़ी चोट देने की है।
उनके सामने मजबूरी बस एक ही है कि वे कांग्रेस विरोध की राजनीति भी करते हैं। यही वजह है कि उन्होंने एनडीए में आकर मोदी सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया था।
मगर एनडीए के जरिए भाव न दिए जाने से नायडू के मन में नाराजगी है। जबकि देवगौड़ा से लेकर अटल बिहारी वाजपेई तक की सरकार में नायडू की तूती बोलती थी।
यही वजह है कि केंद्र पर आंध्र की उपेक्ष का आरोप लगाते हुए टीडीपी की रणनीति भाजपा से रिश्ते खत्म करने के बने। ताकि अगले चुनाव के लिए सूबे में वह अपनी जमीन बचा सकें। ऐसा करके टीडीपी जगन को भी सियासी नुकसान देना चाहती है।
यदि भाजपा से वे जुड़ते भी हैं तो केंद्र की सत्ता विरोधी रुझान की चपेट उन पर पड़े। टीडीपी को जगन-भाजपा की दोस्ती में भी फायदा नजर आ रहा है।
एक वरिष्ठ टीडीपी नेता के अनुसार अगर जगन और भाजपा का मिलन आंध्र प्रदेश में होता है तो टीडीपी के खाते में बैठे-बिठाए मुस्लिम और ईसाई समुदाय का वोट जुड़ जाएगा। जोकि मुख्य रूप से जगन के समर्थक माने जाते हैं।
टीडीपी नेता के अनुसार आंध्र की राजनीति में कांग्रेस पार्टी अब भी शून्य है। इसलिए उनका मुकाबला जगन की पार्टी से होगा। ऐसे में भाजपा से अलग होकर टीडीपी राज्य में दोबारा से परचम लहरा सकती है। वरना केंद्र के सत्ता विरोधी रुझान का असर टीडीपी के मंसूबों पर पानी फेर सकते हैं।